भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
पवन पियै ज्वाला पवै, नाभि तले करि राह ।
मेरुदण्ड¹ को फोरिकै, बसै अमरपुर जाय ॥
जहां काल पहुंचे नहीं, जम की होय न त्रास ।
गगनमण्डल²कोजायकरि, करै उनमनी वास ॥
जहां काल नहिंज्वालहै, छूटै सकल सन्तापँ ।
होय उनमनी लीनमन, बिसरै आपा आप ॥
तीनों बन्ध लगाय कै, पांच वायु को साध ।
सुषमन मारग है चलै, देखै खेल अगाध ॥
शक्ति जाय शिवसों मिले, जहां होय मन लीन ।
महा खेचरी जो लगे, जानै जान प्रवीन ॥
आसन पदम लगाय करि, मूलबन्ध को बांधि ।
मेरुदण्ड सीधो करै, सुरति गगन को साधि ॥
चन्द सूर दोउ सम करै, ठोढ़ी³ हिये लगाय ।
षट चक्कर को बेधिकरि, शून्य शिखर को जाय ॥
इड़ा पिंगला साधिकरि, सुषमन में करिवास ।
परमज्योतिझिलमिलतहां, पूजै मन विश्वास ॥
जिन साधन आगे करी, तासों सब कुछ होय ।
जब चाहै जबहीं तभी, काल बचावै सोय ॥
तरुणअवस्थाजोग करि, बैठि रहै मन जीत ।
काल बचावै साध वह, अन्त समय रणजीत ॥
सदा आप में लीन रहु, करिकै जोगाभ्यास ।
आवत देखै काल जब, गगनमण्डल कर वास ॥
शनै शनै साधि करि, राखै प्राण चढ़ाय ।
१ जो नाभि से लेकर मस्तक तक मिली हुई नाड़ी है २ आकाश ३
दाढ़ी का अर्द्धभाग ॥