भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंज्ञानस्वरोदयवर्णन । १२१
पूरो जोगी जानिये, ताको काल न खाय ॥
पहिले साधन ना कियो, गगनमण्डल को जान ।
आवत जानै काल जब, कहा करै अज्ञान ॥
जोग ध्यान कीन्हों नहीं, ज्वान अवस्था मीत ।
आगम देखै काल को, कहा सकै वह जीत ॥
काल जीति हरिसोंमिलै, शून्य महल अस्थान ।
आगे जिन साधन करी, तरुण अवस्था जान ॥
काल अवधि बीतै तभी, जबै बीति सब जाय ।
जोगी प्राण उतारिये, लेहि समाधि जगाय ॥
काल जीति जगमें रहै, मौत न व्यापै ताहि ।
दशौद्वार को फोरिकै, जब चाहै जब जाहि ॥
सूरज मण्डल चीरिकै, जोगी त्यागै प्रान ।
सायुजं मुक्ति सोई लहै, पावै पद निर्वान ॥
कृष्णपक्ष के मध्य में, दक्षिण होय जु भान ।
जोगी वपुं नहिं छांडिये, राजा होय फिरि आन ॥
राज पाय हरिभक्तिकरि, पूरवली पहिचान ।
जोग जुक्ति पावै बहुरि, दूसर मुक्ति निदान ॥
उतरायण सूरज लखै, शुक्ल पक्ष के माहिं ।
जोगी काया त्यागिये, यामें संशय नाहिं ॥
मुक्ति होय बहुरै नहीं, जीव खोज मिटिजाय ।
बुन्द समुन्दर मिलिरहै, दुतिया ना ठहराय ॥
दक्षिणायन सूरज रहै, रहै मास षट जानि ।
फिर उतरायणजाय करि, रहै मास षट मानि ॥
दोनों स्वरको शुद्ध करि, श्वासा में मन राखि ।
१ दशौ इन्द्रिय २ परब्रह्ममें योजित होजाना ३ देह ॥