भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंज्ञानस्वरोदयवर्णन । ११६
सोलहदिननिशिदिन चलै, श्वास भानु की ओर ।
आयु जान इकमासकी, जीव जाय तन छोर ॥
नौ भृकुटी ससै श्रवण, पांच तारका जान ।
तीन नाक जिह्वा इकैकै, काल भेद पहिंचान ॥
भेद गुरू सों पाइये, गुरु बिनु लहै न जान ।
चरणदास यों कहत है, गुरुपर वारौं प्रान ॥
एक मास जो रैनि दिन, भानु दाहिनो होय ।
चरणदास यों कहत है, नर जीवै दिन दोय ॥
नाड़ी जो सुषमन चलै, पांच घड़ी ठहराय ।
पांच घड़ी सुषमन बहै, तवहीं नर मरि जाय ॥
नहीं चन्द्र नहिं सूर है, नहीं सुषमना बाल ।
मुख सेती श्वासा चलै, घड़ी चार में काल ॥
चारि दिना कै आठ दिन, बारह कै दिन बीश ।
ऐसे जो चंदा चलै, आंव जान बड़ ईश ॥
तीन रात अरु तीन दिन, चालै तत्त्व अकाश ।
एक बरस काया रहै, फेर काल बिसवाश ॥
दिन को तौ चंदा चलै, चलै रात को सूर ।
यह निहंचै करि जानिये, प्राण गमन बहदूर ॥
रात चलै स्वर चन्द में, दिन को सूरज बाल ।
एक महीना यों चलै, छठे महीने काल॑ ॥
जब साधू ऐसी लखै, छठे महीने काल ।
आगे ही साधन करै, बैठि गुफा ततकाल ॥
ऊपर खैंचि अपान को, प्राण अपान मिलाय ।
उत्तम करै समाधि को, ताको काल न खाय ॥
१ मृत्यु ॥
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