भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंज्ञानस्वरोदयवर्णन १२५
घट उपाधि सो जानिये, करत रहैं उतपाथ ॥
जिह्वा इन्द्री नीरकी, नभको इन्द्री कान ।
नासा इन्द्री धरणि की, करि विचार पहिंचान ॥
त्वचा सुइन्द्री वायु की, पावक इन्द्री नैन ।
इनको साधै साधु जो, पद पावै सुख चैन ॥
निद्रा संगम आलकस, भूख प्यास जो होय ।
चरणदास पांचौ कही, अग्नि तत्व सों जोय ॥
रक्त बिन्द कफ तीसरो, मेद मूत्र को जान ।
चरणदास परकिरत ये, पानी सों पहिंचान ॥
चाम हाड़ नाड़ी कहूं, रोम जान और मास ।
पृथ्वी की परकिरत ये, अन्त सबन को नास ॥
बल करना अरु धावना, उठना अरु संकोच ।
देह बढ़ै सो जानिये, वायु तत्त्व है शोच ॥
काम क्रोध मोह लोभ भै, तत अकाश कौ भाग ।
नभकी पांचौ जानिये, नित न्यारो तू जाग ॥
पांच पचीसौ एकही, इनके सकल स्वभाव ।
निर्विकार तू ब्रह्म है, आप आपको पाव ॥
निराकर निर्लिप्त · तू, देही जान अकार ।
आनि देही मान मत, यही ज्ञान ततसार ॥
शस्तर छेदि सकै नहीं, पावक सकै न जारि ।
मरै मिटै सो तू नहीं, गुरुगम भेद निहारि ॥
जलै कटै काया यही, बनै मिटै फिरि होय ।
जीवऽविनाशो नित्य है, जानै बिरला कोय ॥
आंख नाक जिह्वा कहूं, त्वचा जान अरु कान ।
पांचौ इन्द्री ज्ञान ये, जानै जान सुजान ॥