भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
नाग धनंजय देवदत, दशवाईं रणजांत ॥
नवों द्वार को बन्ध करि, उत्तम नाड़ी तीन ।
इड़ा पिंगला सुषमना, केलि करैं परवीन ॥
करते प्राणायाम के, तिरगये पतित¹ अनेक ।
अनहद ध्वनि के बीचमें, देखै शब्द अलेख ॥
पूरक करि कुम्भक करै, रेचक पवन उतार ।
ऐसे प्राणायाम करि, सूक्ष्म करै अहार ॥
धरती बन्ध लगायकर, दशौ वायु को रोक ।
मस्तक प्राण चढ़ायकरि, करै अमरपुर भोग ॥
पांचौ मुद्रा साधि करि, पावै घट को भेद ।
नाड़ी शक्ति चढ़ाइये, षट चक्कर को छेद ॥
जोग जुक्तिकै कीजिये, कै अजपा को ध्यान ।
आपा आप विचारिये, परम तत्त्व को ज्ञान ॥
शूद्र वैश्य शरीर है, ब्राह्मण और राजपूत ।
बूढ़ा बाला तू नहीं, चरणदास औधूत ॥
काया माया जानिये, जीव ब्रह्म है मित्त ।
काया छुटि सूरत मिटे, तू परमातम नित्त ॥
पाप पुण्य आशा तजौ, तजौ मान और थाप ।
काया मोह विकार तजि, जपै सु अजपा जाप ॥
आप भुलानौ आपमें, बँधो आपही आप ।
जाको ढूंढ़त फिरत है, सो तू आपहि आप ॥
इच्छा दुई विसारिकर, होय न क्यों निर्वास ।
तूतौ जीवनमुक्त है, तजो मुक्ति की आस ॥
पवन भई आकाश सों, अग्नि वायुसों होय ।
१ पापी ॥