भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 153, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें११८. श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दहिने सेती आय करि, बायें पूछै कोय ।
जो बावों स्वर बंध है, सुफलकाज नहिहोय ॥
बायें सेती आय करि, दहिने पूछै धाम ।
जो दहिनों स्वर बंध है, कारज अफल बताय ॥
जब स्वर भीतरको चलै, कारज पूछै कोय ।
पैज¹ बांधि वासों कहौ, मनसा पूरण होय ॥
जब स्वर बाहर कूं चलै, तब कोइ पूछै तोर ।
वाको ऐसे भाषिये, नहिंकाजविधिकरोर ॥
बाईं करवँट सोइये, जल बायें स्वर पीव ।
दहिने स्वर भोजन करै, तौ सुख पावै जीव ॥
बायें स्वर भोजन करै, दहिने पीवै नीर ।
दश दिन भूलो यों करै, आवै रोग शरीर ॥
दहिने स्वर झाड़े फिरै, बायें लघुशंकायं² ।
जुक्ती ऐसे साधिये, दीन्हों भेद बताय ॥
चन्द चलावै द्योस को, रात चलावै सूर ।
नित साधन ऐसे करै, होय उमर भरपूर ॥
जितनोहीं बावों चलै, सोई दहिनो होय ।
दशश्वासा सुषमनचलै, ताहि विचारौ लोय ॥
आठ पहर दहिनो चलै, बदलै नहीं जु पौन ।
तीन बरस काया रहै, जीव करै फिरि गौन ॥
सोलह पहर चलै जभी, श्वास पिंगला माहिं ।
जुगल बरष काया रहै, पीछे रहनो नाहिं ॥
तीनरात अरु तीनदिन, चलै दाहिनो श्वास ।
संवत भर काया रहै, पाछे फिर होवै नास ॥
१ प्रण २ पेशाब करना ॥