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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 157, कुल 690 में से

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पृष्ठ 157

१२२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
भेद स्वरोदय पायकरि, तब काहू सों भाखि ॥
जो रण ऊपर जाइये, दहिने स्वर परकाश ।
जीति होय हारै नहीं, करै शत्रु को नाश ॥
दुर्जन को स्वर दाहिनो, तेरो दहिनो होय ।
जो कोई पहिले चढै, खेत जीति है सोय ॥
सुषमन चलत न चालिये, जुद्ध करन सुन मीत ।
शीश कटावै कै फँसै, दुर्जन की होय जीत ॥
जो बायें पृथ्वो चलै, चढ़ि आवै कोइ भूप ।
आप बैठि दल पेलिये, बात कहत हौं गूप ॥
जल पृथ्वी स्वर में चलै, सुनै कान दै वीर ।
सुफल काज दोनों करै, कै धरती कै नीर ॥
पावकअरु आकाश तत, वायु तत्त्व जो होहिं ।
कछू काज नहिं कीजिये, इन में बरजौं तोहिं ॥
दहिनों स्वर जब चलतहै, कहीं जाय जो कोय ।
तीन पाँव आगे धरै, सूरज को दिन होय ॥
बायें स्वर में जाइये, बायें पग धरि चार ।
बावों डग पहिले धरै, होय चन्द्र को बार ॥
दहिने स्वर में जो चले, दहिने डग धरि तीन ।
बायें स्वर में चारि डग, बावीं कर परबीन ॥
गर्भवती के गर्भ को, जो कोइ पूँछै आय ।
बालक होय कै बालकी, जीवै कै मरि जाय ॥
प्रद्यं १ बालक होनकी, जो कोउ पूँछै तोहिं ।
बायें कहिये छोकरी, दहिने बेटा होहिं ॥
दहिने स्वर के चलतही, जो वह पूँछै आय ।
१ प्रश्न ॥