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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 159, कुल 690 में से

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पृष्ठ 159

१२४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
इक्कीस हजार छः सौ चलै, रात दिना जो श्वास ।
बीसा सौ जीवै बरष, होय अघन को नास ॥
अकाल मृत्यु कोई मरै, होय करि भुक्तै भूत ।
श्वास जहां बीतै सभी, जब आवै यमदूत ॥
चारौ संजम साधिकरि, श्वासा जुक्ति चलाय ।
अकाल मृत्यु आवै नहीं, जीवै पूरी आय ॥
सूक्ष्म भोजन कीजिये, रहिये ना पड़ि सोय ।
जल थोरो सो पीजिये, बहुत बोल मत खोय ॥
कुं० मोक्ष मुक्ति तुम चहत हौ तजौ कामना काम ।
मनकी इच्छा मेटिकरि भजो निरञ्जन नाम ॥
भजो निरञ्जन नाम तत्व देह अध्यास मिटावो ।
पञ्चन के तजि स्वाद आप में आप समावो ॥
जब छूटै झूठी देह जैसे के तैसे रहिया ।
चरणदास यहि मुक्ति गुरूने हमसों कहिया ॥
दो० देह मरै तू है अमर, पारब्रह्म है सोय ।
अज्ञानी भटकत फिरै, लखै सो ज्ञानी होय ॥
देह नहीं तू ब्रह्म है, अविनाशी निर्बान ।
नित न्यारो तू देह सों, देह कर्म सब जान ॥
डोलन बोलन सोवनो, भक्षण करन अहार ।
दुख सुख मैथुनरोग सब, गरमी शीत निहार ॥
जाति वरण कुल देहकी, सूरति मूरति नाम ।
उपजै विनशै देह सो, पांच तत्त्व को गाम ॥
पावक पानी वायु है, धरती और अकास ।
पांच तत्त्व के कोट में, आय कियो तैं वास ॥
पांच पचीसौ देह सँग, गुन तीनों हैं साथ ।