भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयोगसन्देहसागर वर्णन । १०६
काया महलके जो तुम भेदी । ठौर ठौर कहु घटमें जेती ॥
पाँचंतत्त्व की इन्द्री दश । यही बतावो आगे बश ॥
चरणदासका गुरु शुकदेव । सोतौ जानै सबही भेद ॥
दो० चारदूध चौदह चौवारे, भेदी होय सो जानै ।
चरणदास शुकदेवका, बालक सो यह भेद बखानै ॥
छप्पय ॥
चंदकला कित छिपै बढ़ जब कितसों आवै ।
बादर कितसों होय फटै जब कहाँ समावै ॥
दीपलोय बुझिजाय जाय कित मोहिं बतावो ।
राति दिना कित जाय ध्रुवा केहि ठौर लखावो ॥
चरणदास शुकदेव सों पूँछतहौं शिरनाय के ।
तन छूटै जीजाय कित आवतहै किहि ठाँयते ॥
कवित्त ॥
देखो है तमाशा देह समझिकै विचारिलेहु, मूरुखनरहोय जो या बातमें हँसैगो ।
चीतेको मारि मृग नखशिख सुखायगयो, बाघनीको मारिवोकसिंहको ग्रसैगो ॥
बिल्लीको मारि चूहे प्रेमको नगारोदियो, दादुरहू पांच सर्प मारिकै बसैगो ।
कहै चरणदास ऐसे खेलसों लगाई आश, चिरिया के शीश तोरी बाजको लसैगो ॥
दो० पगलागूं शुकदेव के, और वारने जावं ।
गुप्तभेद मोसों कह्यो, सबवै नावं अरु ठावं ॥
सो तुमसों पूंछन करौं, हौं परषन के दाय ।
या सागर संदेह को, दीजै अर्थ बताय ॥
इति श्रीमन्महाराजसाहिबश्रीचरणदासकृतसंदेहसागरसंपूर्णम् ॥
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१ पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश ॥