सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 144, कुल 690 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 144

योगसन्देहसागर वर्णन । १०६
काया महलके जो तुम भेदी । ठौर ठौर कहु घटमें जेती ॥
पाँचंतत्त्व की इन्द्री दश । यही बतावो आगे बश ॥
चरणदासका गुरु शुकदेव । सोतौ जानै सबही भेद ॥
दो० चारदूध चौदह चौवारे, भेदी होय सो जानै ।
चरणदास शुकदेवका, बालक सो यह भेद बखानै ॥
छप्पय ॥
चंदकला कित छिपै बढ़ जब कितसों आवै ।
बादर कितसों होय फटै जब कहाँ समावै ॥
दीपलोय बुझिजाय जाय कित मोहिं बतावो ।
राति दिना कित जाय ध्रुवा केहि ठौर लखावो ॥
चरणदास शुकदेव सों पूँछतहौं शिरनाय के ।
तन छूटै जीजाय कित आवतहै किहि ठाँयते ॥
कवित्त ॥
देखो है तमाशा देह समझिकै विचारिलेहु, मूरुखनरहोय जो या बातमें हँसैगो ।
चीतेको मारि मृग नखशिख सुखायगयो, बाघनीको मारिवोकसिंहको ग्रसैगो ॥
बिल्लीको मारि चूहे प्रेमको नगारोदियो, दादुरहू पांच सर्प मारिकै बसैगो ।
कहै चरणदास ऐसे खेलसों लगाई आश, चिरिया के शीश तोरी बाजको लसैगो ॥
दो० पगलागूं शुकदेव के, और वारने जावं ।
गुप्तभेद मोसों कह्यो, सबवै नावं अरु ठावं ॥
सो तुमसों पूंछन करौं, हौं परषन के दाय ।
या सागर संदेह को, दीजै अर्थ बताय ॥
इति श्रीमन्महाराजसाहिबश्रीचरणदासकृतसंदेहसागरसंपूर्णम् ॥
०००००००००
१ पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश ॥