भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंज्ञानस्वरोदयवर्णन । '११५
बरस एक को फल कहै, तत मत जानै सोय ।
काल समौ सोई लखै, बुरो भलो जग होय ॥
संक्रायत पुनि मेष विचारै । तादिन लगै सु घड़ी निहारै ॥
तबहीं स्वर में करै विचारा । चलै कौन सो तत्त्व नियारा ॥
जो बायें स्वर पिरथी होई । नीको तत्त्व कहावै सोई ॥
देश वृद्धि अरु समै बतावै । परजा सुखी मेह बरसावै ॥
चारा बहुत ढोर को उपजै । नरदेही कों अन्न बहु निपजै ॥
जल चालै बायें स्वर माहीं । धरती फलै मेह बरसाहीं ॥
आनँद मंगल सों जग रहै । आपतत्त्व चन्दामें बहै ॥
जल धरती दोनों शुभ भाई । चरणदास शुकदेव बताई ॥
तीन तत्त्वका कहौं विचारा । स्वर में जाको भेद निहारा ॥
लगै मेष संक्रायत तबहीं । लगती घड़ी विचारै जबहीं ॥
अग्नितत्त्व स्वरमें जब चालै । रोग दोषमें परजा हालै ॥
काल पड़ै थोड़ोसो बरसै । देश भंग जो पावक दरसै ॥
वायु तत्त्व चालै स्वर संगा । जग भयमान होय कछु दंगा ॥
अर्द्ध काल थोड़ो सो बरसे । वायु तत्त्व जो स्वरमें दरसे ॥
तत्त्व आकाश स्वर चालै दोई । मेह न बरसै अन्न न होई ॥
काल पड़ै तृण¹ उपजै नाहीं । तत अकाश जोहो स्वर माहीं ॥
दो० चैत महीना मध्य में, जबहीं परिवा होय ।
शुक्लपक्ष ता दिन लगै, प्रातस्वास² में जोय ॥
भोरहि परिवा को लखै, पृथ्वी होय सुथांन ।
होय समौ परजा सुखी, राजा सुखी निदान ॥
नीर चलै जो चन्द में, यही समै की जीत ।
मेह बरसै परजा सुखी, संबत नीको मीत ॥
१ घास २ पहिला श्वासा ॥