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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 146, कुल 690 में से

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पृष्ठ 146

ज्ञानस्वरोदयवर्णन । १११
चारि वेद का भेद है, गीता का है जीव ।
चरणदास लखि आपको, तो मैं तेरा पीव ॥
दो० सब जोगन को जोग है, सब ज्ञानन को ज्ञान ।
सर्वसिद्धि को सिद्धि है, तत्त्व स्वरनको ध्यान ॥
ब्रह्मज्ञान को जाप है, अजपा सोहं साध ।
परमहंस कोइ जानि है, ताको मतो अगाध ॥
भेद स्वरोदय सो लहै, समझै श्वास उसास ।
बुरी भली तामें लखै, पवन सुरति मन गांस ॥
शुकदेव गुरू कृपा करी, दियो स्वरोदय ज्ञान ।
जब सों यह जानी परी, लाभ होय कै हान ॥
इड़ा^१ पिंगला^२ सुषमना^३, नाड़ी तीन विचार ।
दहिने बायें स्वरचलैं, लखै धारणा धार ॥
पिंगल दहिने अंग है, इड़ा सो बायें होय ।
सुषमन इनके बीच है, जब स्वर चालैं दोय ॥
जब स्वर चालैं पिंगला, तिहि मधि सूरज वास ।
इड़ा सो बायें अंग है, चन्द्र करत परकास ॥
उदय अस्त तिनकी लखै, निर्गम सुर्गम बिद्धि ।
और पावै तत बरणको, जब वह होवै सिद्धि ॥
शुकदेव कहिचरणदाससों, थिरचर स्वर पहिंचान ।
थिरकारज को चन्द्रमा, चरकारज को भान ॥
कृष्णपक्ष जबहीं लगै, जाय मिलत है भान ।
शुक्लपक्ष है चन्द्र को, यह निहचै करिजान ॥
मंगल अरु इतवार दिन, और शनीचर लीन ।


१ बाईं ओर की नाड़ी को कहते हैं २ दाहिनी ओर की नाड़ी को कहते हैं
३ दोनों के मध्य की नाड़ीको कहते हैं ॥