भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंज्ञानस्वरोदयवर्णन । ११३
जो सूरज में स्वर चलै, कहै दाहिने आय ।
७ लग्नवार अरु तिथिमिलै, कहु कारज होइ जाय ॥
जो चन्दा में स्वर चलै, वायें पूंछै काज ।
तिथि अरु अक्षरवारमिलि, शुभकारज को साज ॥
७सात पांच नव तीन गिन, पन्द्रह ओर पचीश ।
काज बचन अक्षर गिनै, भानु जोग को ईश ॥
चार आठ द्वादश गिनै, चौदह सोलह मीत ।
चन्दजोग के संग हैं, चरणदास रणजीत ॥
कर्क मेष तुला मकर, चारौ चरती राश ।
सूरज सों चारौ मिलत, चरकारज परकाश ॥
मीन मिथुन कन्या कही, चौथी ओर धन मीत ।
'द्विस्वभाव' की सुषमना, मुरलीसूत रणजीत ॥
वृश्चिकसिंहवृषकुम्भ पुनि, बायें स्वरके संग ।
चन्द जोगको मिलत हैं, थिरकारज परसंग ॥
चित अपनो रिथर करै, नासा आगे नैन ।
श्वासा देखै दृष्टि सों, जब पावै स्वर बैन ॥
पांचघड़ी पांचो चलैं, फिरि वा चारहि बार ।
पांचतत्व चालै मिले, स्वरबिच लेह निहार ॥
धरती अरु आकाश है, और तीसरी पौन ।
पानी पावक पांच यों, करत श्वासमें गौन ॥
धरती तौ सोहीं चलै, अरु पीरौ रँग देख ।
बारह अंगुल श्वास में, सुरत निरतकर पेख ॥
ऊपर को पावक चलै, लाल बरण है भेष ।
चारि सु अंगुल श्वास में, चरणदास औ रेष ॥
नीचे को पानी चलै, श्वेत रंग है तासु ।