सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 148, कुल 690 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 148

ज्ञानस्वरोदयवर्णन । ११३
जो सूरज में स्वर चलै, कहै दाहिने आय ।
७ लग्नवार अरु तिथिमिलै, कहु कारज होइ जाय ॥
जो चन्दा में स्वर चलै, वायें पूंछै काज ।
तिथि अरु अक्षरवारमिलि, शुभकारज को साज ॥
७सात पांच नव तीन गिन, पन्द्रह ओर पचीश ।
काज बचन अक्षर गिनै, भानु जोग को ईश ॥
चार आठ द्वादश गिनै, चौदह सोलह मीत ।
चन्दजोग के संग हैं, चरणदास रणजीत ॥
कर्क मेष तुला मकर, चारौ चरती राश ।
सूरज सों चारौ मिलत, चरकारज परकाश ॥
मीन मिथुन कन्या कही, चौथी ओर धन मीत ।
'द्विस्वभाव' की सुषमना, मुरलीसूत रणजीत ॥
वृश्चिकसिंहवृषकुम्भ पुनि, बायें स्वरके संग ।
चन्द जोगको मिलत हैं, थिरकारज परसंग ॥
चित अपनो रिथर करै, नासा आगे नैन ।
श्वासा देखै दृष्टि सों, जब पावै स्वर बैन ॥
पांचघड़ी पांचो चलैं, फिरि वा चारहि बार ।
पांचतत्व चालै मिले, स्वरबिच लेह निहार ॥
धरती अरु आकाश है, और तीसरी पौन ।
पानी पावक पांच यों, करत श्वासमें गौन ॥
धरती तौ सोहीं चलै, अरु पीरौ रँग देख ।
बारह अंगुल श्वास में, सुरत निरतकर पेख ॥
ऊपर को पावक चलै, लाल बरण है भेष ।
चारि सु अंगुल श्वास में, चरणदास औ रेष ॥
नीचे को पानी चलै, श्वेत रंग है तासु ।