भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
शुभकारज को मिलत हैं, सूरज के दिन तीन ॥
सोमवार शुकर भलो दिन, बृहस्पति को देखि ।
चंदजोग में सुफल हैं, कहैं चरणदास बीशेखि ॥
तिथिऔरवार विचारकरि, दहिनो बाऔं अंग ।
चरणदास कहै स्वर जो मिलै, शुभकारज परसंग ॥
कृष्णपक्ष के आदिहि, तीनि तिथ्य तक भान ।
फिरि चंदा फिरि भान है, फिरि चंदा फिरि भान ॥
शुक्लपक्ष के आदिही, तीनि तिथ्य लग चन्द ।
फिरि सूरज फिरि चन्द है, फिरिसूरज फिरि चन्द ॥
सूरजकी तिथि में चलै, जो सूरज परकास ।
सुख देही को करत हैं, लाहालाभ हुलास ॥
शुक्लपक्ष चन्दा चलै, परिवा लेहि निहार ।
फल आनंद मंगल करै, देही कूं सुखसार ॥
शुक्लपक्ष तिथि में चलै, जो परिवा को भान ।
होय क्लेश पीड़ा कछू, कै दुख कै कुछ हान ॥
सूरज की तिथि में चलै, जो परिवा को चन्द ।
कलह करै पीड़ा करै, हानि ताप कै द्वन्द ॥
ऊपर बायें सामने, स्वर बायें के संग ।
जो पूंछै शशि जोगमें, तौ नीको परसंग ॥
नीचे पीछे दाहिने, स्वर सूरज को राज ।
जो कोइ पूंछै आयकरि, तौ समझौ शुभकाज ॥
दहिनो स्वर जब चलत है, पूंछै बायें अंग ।
शुक्लपक्ष नहिं वार है, तौ निर्फल परसंग ॥
जो कोइ पूंछै आयकरि, बैठि दाहिनी ओर ।
चन्द चलै सूरज नहीं, नहिकारज बिधि कोर ॥