भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
सोलह अंगुल श्वास में, चरणदास कहै भासु ॥
हरो रंग है वायु को, तिरछी चालै सोय ।
आठ सुअंगुल श्वास में, रणजीत मीतकरिजोय ॥
स्वर दोनों पूरण चलैं, बाहर ना परकाश ।
श्याम रंग है तासु को, सोई तत्त्व आकाश ॥
जल पृथ्वी के जोग में, जो कोइ पूँछै बात ।
शशियर में जो स्वर चलै, कहु कारज होयजातं ॥
पावकऔर आकाश पुनि, वायु कभी जो होय ।
जो कोइ पूंछै आयकरि, शुभकारज नहिं होय ॥
जल पृथ्वी थिरकाज को, चरकारज को नाहिं ।
अग्नि वायु चरकाज को, दहिने स्वरके माहिं ॥
रोगी को पूंछै कोऊ, बैठि चन्द की ओर ।
धरती बायें स्वर चलै, मरै नहीं विधि क्रोर ॥
रोगी को परसंग जो, बायें पूँछै आन ।
चन्द बंध सूरज चलै, जीवै ना वह जान ॥
बहते स्वरसों आयकरि, शून्य ओर जो जाय ।
जो पूंछै परसंग वह, रोगी ना ठहराय ॥
शून्य ओर सों आयकर, पूंछै बहते श्वास ।
यह निश्चय करि जानिये, रोगी को नहिं नास ॥
शून्य ओर सों आय कै, पूंछै बहते पक्ष ।
जेते कारज जगत के, सुफल होयँ यों सब ॥
बहते स्वर से आय करि, जो पूंछै सुन और ।
जेते कारज जगत के, उलटे हों विधि क्रोर ॥
कै बायें कै दाहिने, जो कोइ पूरण होय ।
पूंछै पूरण होरही, कारज पूरण सोय ॥