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औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

२. कारिका ११-२५: पद, वाक्य, प्रबन्धार्थ, गुण, अलङ्कार, रस एवं क्रिया-औचित्य

उपर्युक्तपद्ये, विप्रलम्भस्य वियोगस्य, भरेणातिशयेन, भग्नं विनष्टं,
धैर्यं यस्यास्तथाभूतायाः कादम्बर्याः, विरहव्यथाया विप्रयोगाधेर्वर्णना,
माधुर्यसौकुमार्यादिगुणयोगेन माधुर्यसौकुमार्यादिगुणसम्बन्धेन, प्रियंवदत्वेन
प्रियवादितया, पूर्णेन्दुवदना पूर्णचन्द्रानना कामिनीव, हृदयानन्ददायिनीं
मनोल्हादकारिणीं, दयिततमतामतिप्रेमास्पदत्वमातनोति । अर्थात्-यथा
कमनीयाकृतिः कामिनी प्रियवादितया हृदयानन्ददायिनी प्रियतमा
च सम्पद्यते तथैव काव्यमपि समुचितगुणयोगेनातिशयस्पृहणीयताम-
वाप्नोति ।
उपर्युक्त पद्य में विरहविधुरा कादम्बरी की विरहव्यथा का वर्णन माधुर्य-
सौकुमार्य आदि समुचित गुणों के सहयोग से वैसी ही लोकप्रियता को प्राप्त कर
रहा है जैसे विधुवदना सुन्दरी अपने प्रियवचनों के द्वारा प्रियतमा और हृदय-
हारिणी आदि विशेषणों से विभूषित होता है ।
ननु यथा चन्द्रकस्य--
युद्धेषु भाग्यचपलेषु न मे प्रतिज्ञा दैवं नियच्छति जयञ्च पराजयञ्च ।
एषैव मे रणगतस्य सदा प्रतिज्ञा पश्यन्ति यन्न रिपवो जघनं हयानाम् ॥
गुणगतानौचित्यं प्रदर्शयितुमाह--नतु तथा चन्द्रकस्येति । युद्धे-
ष्विति । भाग्यचपलेषु नियतिचञ्चलेषु युद्धेष्वाहवेषु मे मम, प्रतिज्ञा,
जयविषयकः पणो न, ( यतो हि ) तत्र, जयं पराजयं च, दैवं भाग्यमेव
नियच्छति वितरति, रणगतस्य संग्रामोपगतस्य, मे, सदा एषैव प्रतिज्ञास्ति
यत्, रिपवः शत्रवो हयानाम् घोटकानां युद्धात्पराङ्मुखीभूतानामिति
भावः, जघनं पश्चाद्भागं, न पश्यन्ति ।
गुणगत अनौचित्य को प्रदर्शित करने के लिये कहा गया है—नतु यथेति ।
युद्धेष्विवित्ति-युद्ध की स्थिति विचित्र होती है, वहाँ जीत या हार के बारे में प्रतिज्ञा-
पूर्वक पहले ही कुछ कह देना मेरे वश की बात नहीं है, वह तो पूर्णतः भाग्य पर
ही अवलंबित रहती है, परन्तु हाँ यह मेरी दृढ़ प्रतिज्ञा है कि युद्ध से जी चुरा
कर मोड़े गये घोड़े की जांघ शत्रु कभी नहीं देख सकते । तात्पर्य यह है कि
वीरतापूर्वक लड़ना ही मेरा काम है जीत-हार की चिन्ता करना नहीं ।

३२ औचित्यविचारचर्चा
अत्र क्षात्रवृत्तिरिवौजसा काव्यगुणेनास्पृष्टा सुभटोक्तिरुचितार्थापि
तेजोजीवितविरहिता दुर्गंतगृहदीपशिखेव मन्दायमाना न विद्योतते ।
उपर्युक्तपद्ये ओजसा तेजसा, अस्पृष्टाऽशतोऽपि रहिता, क्षात्रवृत्तिः
क्षत्रियजात्युत्पन्नजनाचरणमिव, ओजोनामकेन काव्यगुणेनास्पृष्टो-
चितार्थाऽथौचित्ययुक्तापि, सुभटोक्तिर्विशिष्टवीरजनकथन, तथैव न
विद्योतते प्रकाशते । यथा दुगंतानां दरिद्राणां, गृहे वाताघातादिसङ्कुले
आवासे, स्थितस्य दीपस्य शिखा, तेजोजीवितविरहिता तेजोविकिरणा-
त्मकनिजस्वभावशून्या, अत एव मन्दायमाना मन्दतामवलम्बमाना, न
विद्योतते इति भावः ।
पूर्वोक्त पद्य एक सुन्दर योद्धा का उक्तिरूप है । उसका अर्थ यद्यपि उचित है
अर्थात् उसका आशय वीरतोचित है, तथापि यह सुभटोक्ति चमकती नहीं । कारण
यह है कि जिस तरह क्षत्रियों के आचरण में नैसर्गिक तेजस्विता का रहना आवश्यक
है उसी तरह वीरों की उक्ति में भी ओजोगुण का रहना उचित है । ऐसी स्थिति
में ओजोनामक काव्यगुण से सर्वथा रहित यह उक्ति उस दीपशिखा के समान
दीप्तिविहीन है जो दरिद्रों के समुचित आवरणरहित घर में रहने के कारण प्राण-
तुल्य प्रकाशात्मक निजनैसर्गिक स्वभाव से हीन होकर मन्द पड़ जाती है ।
तात्पर्य यह है कि काव्य में प्रतिपाद्य अर्थ के उपयुक्त ही शैली और भाषा का
रहना भी अत्यावश्यक है, अन्यथा कवि का अभिप्रेत सिद्ध नहीं हो पाता । इन्हीं
गुणों के अभाव में यहाँ की सुभटोक्ति भी प्राणहीन सी प्रतीत होती है ।
यथा वा राजशेखरस्य-
एतस्याः स्मरसंज्वरः करतलस्पर्शैः परीक्ष्यो न यः,
स्निग्धेनापि जनेन दाहभयतः प्रस्थम्पचः पाथसाम्
निर्वीर्याकृतचन्दनौषधिविधौ तस्मिंस्तदत्कारिणो,
लाजस्फोटममी स्फुटन्ति मणयः सर्वेऽपि हारस्रजाम् ॥
गुणगतानौचित्यस्य द्वितीयमुदाहरणमुपस्थापयितुमुपक्रमते-यथा
वा राजशेखरस्येति । एतस्या इति । पाथसां जलानां, प्रस्थं द्रोणप्रमाणं
पचति शोषयति उष्णं विधत्ते एवंभूतः, अत एव स्निग्धेनापि प्रियेणापि,
सरसेनापीति व्यज्यते ( शुष्कापेक्षया सरसा अधिकतापसहा भवन्तीति

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ३३
भावः ), जनेन मानवेन, दाहभयतो दाहभीतेः, करतलस्पर्शः पाणिस्पर्शनं
परीक्ष्यः, परीक्षितुमशक्य इत्यर्थः, एतस्या विरहज्वालावलीढायाः
कामिन्या यः स्मरसंज्वरः कामज्वरतापः, अस्तीति शेषः, तस्मिन् ज्वरे
अनिर्वीर्यो निर्वीर्यः कृतः इति निर्वीर्यीकृतः ( अभूततद्भावेच्चिः, )
निष्प्रभावीकृत इति यावत्, चन्दनरूपस्य श्रोखण्डद्रवात्मकस्यौषधेर्भेषजस्य,
चन्दनस्येतरतापशामकौषधिविशेषाणां वा विधिविधानं प्रयोग इति यावत्,
येन तादृशम्, अर्थात् विफलितसकलप्रतिकारे सति, तडत्कारिणस्तडत-
डायमानाः, हारस्रजां माल्यानाम्, अमी पुरोवर्तमानाः, मणयो रत्नविशेषाः,
लाजस्फोटं लाजानां स्फोटमिवेति भावः, स्फुटन्ति। यथाग्निसंयोगेन
धान्यादिकं लाजादिरूपेण परिणमत् तडदित्यव्यक्तध्वनिं विधत्ते तथैवैतस्या
विरहज्वालावलीढायाः कामज्वरतापेन माल्यगुम्फिता मण्यस्तड-
तडायमाना लाजा इव द्विधा भवन्ति।
गुणगत अनौचित्य का द्वितीय उदाहरण दिखाने के लिए कहा गया है—नतु
यथेति। एतस्या इति। द्रोण (दस सेर) प्रमाण पानी को भी शुष्क कर देनेवाला
इस वियोगिनी का कामज्वर जो कि अनुरक्त जनों के द्वारा भी जल जाने के भय
से हाथ से छूकर परीक्षा करने योग्य नहीं है, चन्दन या अन्य शीतलताजनक
ओषधियों को भी विफल कर देनेवाली इस कामज्वर की दशा में इसके हार के
सभी मणि तड़तड़ाहट के साथ लावा के समान फूट रहे हैं।
अत्र विरहविधुररमणीमनोभवावस्थानुरूपं माधुर्यमुत्सृज्य तडत्का-
रिणो लाजस्फोटं स्फुटन्तीत्योजःस्फूर्जितोर्जितस्वभावाधिवासिता
सूक्तिर्लावण्यपेशलतनुर्ललितललनेव परुषभाषिणी झटित्यनौचित्यं चेतसि
सञ्चारयति ॥ १४ ॥
उपर्युक्तमेव विवृणुते—अत्रेति। अत्र पद्ये विरहविधुराया वियोग-
पीडितायाः, रमण्याः कामिन्याः, मनोभवावस्थायाः कामदशायाः, अनुरूप-
मनुकूलं, माधुर्यं मधुरिमाणमुत्सृज्य परित्यज्य, “तडत्कारिणो लाजस्फोटं
स्फुटन्ति” इत्याकारकपदविन्यासेनौजस ओजोगुणस्य, स्फूर्जितोर्जितस्व-
भावेन स्फूर्जदूर्जस्वलप्रकृत्याधिवासिता सुरभिता सुयुक्तेति यावत्, सूक्तिः
सुभाषित, लावण्यपेशलतनुः सौन्दर्यमसृणदेहा, परुषभाषिणी कटुभाषिणी,
३ औ०

३४ औचित्यविचारचर्चा
ललितललनेव सुन्दरीयोषिदिव, झटिति शीघ्रमेव, चेतसि हृदये, अनौचित्यं
विरसतां, सञ्चारयति प्रसर्पयति ।
उपर्युक्त श्लोक में विरहविधुररमणीजनोचित माधुर्य गुण का अतिक्रमण
करके “तड़तड़ा के लावा के समान फूट रहे हैं" इस प्रयोग से ऊर्जितस्वभाव
वाले ओजोगुण का समावेश कर देने के कारण समूची सूक्ति ही कटुभाषिणी
सुन्दरी के समान सहृदयों के हृदय में हठात् औचित्य का संचार कर देती है ।
अर्थात् विप्रलंभ शृङ्गार में माधुर्य गुण की स्थिति आवश्यक होती है ओजो
गुण की नहीं, फिर माधुर्य के बदले ओजोगुणप्रतिपादक शब्दों का प्रयोग करना
तो सहृदयों के हृदय में विरसता की सृष्टि कर देता है । अतः यह अत्यन्त ही
अनुचित है ॥ १४ ॥
अलङ्कारौचित्यं दर्शयितुमाह—
अर्थौचित्यवता सूक्तिरलङ्कारेण शोभते ।
पीनस्तनस्थितेनेव हारेण हरिणेक्षणा ॥ १५ ॥
गुणगतौचित्योदाहरण-प्रत्युदाहरणादिकं प्रतिपाद्य सम्प्रति पञ्चमम-
लङ्कारगतौचित्यं विवृणुते—अर्थौचित्येति । अर्थौचित्यवता वर्णनीयार्थानु-
रूपेणालङ्कारेण रूपकोपमादिना, सूक्तिः सुभाषितं, पीनस्तनस्थितेन
स्थूलपयोधरोपरि लोलता, हारेण मौक्तिकेन, हरिणेक्षणा मृगाक्षीव,
शोभते विभासते ।
अलंकारगत औचित्य की विवेचना की जा रही है—अर्थौचित्येति । अर्थगत
औचित्य से अनुप्राणित अलंकार से सूक्ति उसी तरह सुशोभित होती है जैसे
उत्तुङ्ग पयोधर पर स्थित हार से मृगलोचना सुन्दरी ।
प्रस्तुतार्थस्यौचित्येनोपमोत्प्रेक्षादिनालङ्कारेण सूक्तिश्चकास्ति
कामिनीवोच्चकुचचुम्बिना रुचिरमुक्ताकलापेन ।
विवृणुते- प्रस्तुतेति । प्रस्तुतार्थस्य प्रकृतार्थस्य, औचित्येनानुरूपतया
निबद्ध्यमानेनेति शेषः, उपमोत्प्रेक्षादिनालङ्कारेण, सूक्तिः सुभाषितम्,
उच्चकुचचुम्बिनोत्तुङ्गस्तनस्पर्शशालिना, रुचिरमुक्ताकलापेन मनोहर-
हारेण, कामिनी सुन्दरीव, चकास्ति सुशोभते ।
प्रस्तुत अर्थ के औचित्य से युक्त उपमा-उत्प्रेक्षा आदि अलंकार के द्वारा

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ३५
सूक्ति कुचकुंभ के ऊपर हिलते हुए मुक्ताहार की शोभा से सुन्दरी के समान
सुशोभित होती है ।
यथा श्रीहर्षस्य—
विश्रान्तविग्रहकथो रतिमाञ्जनस्य
चित्ते वसन् प्रियवसन्तक एव साक्षात् ।
पर्युत्सुको निजमहोत्सवदर्शनाय
वत्सेश्वरः कुसुमचाप इवाभ्युपैति ॥
अलङ्कारगतौचित्यमुदाहर्तुमाह—यथा श्रीहर्षस्येति । विश्रान्तेति ।
विश्रान्ता विराममधिगता, विग्रहस्य संग्रामस्य, कथा चर्चा—यस्य सः
( विजितसकलशत्रुकतयेत्थमुक्तिः ), कामपक्षे विश्रान्ता नष्टा, विग्रहकथा
शरीरचर्चा--यस्य सः, ( अनङ्गत्वादेवमुक्तिः ) रतिमान् आनन्दमयः,
पक्षान्तरे रतिः कामपत्नी-तद्वान्, जनस्य लोकस्य, चित्ते हृदये, वसन्
स्पृहणीयत्वाद्वर्त्तमानः, पक्षान्तरे मनोभवत्वाल्लोकहृदयसञ्चारीति भावः,
प्रियो वसन्तकस्तन्नामा विदूषको यस्य सः, पक्षान्तरे प्रियो वसन्त-
कस्तन्नामकर्तुर्विशेषो यस्य सः, वत्सेश्वर उदयनराजः, निजमहोत्सव-
दर्शनाय स्वायोजितमहोद्भवविलोकनाय, पक्षान्तरे स्वविषयकमहोत्सव-
दर्शनाय, पर्युत्सुको नितरां स्पृहाशोलः, साक्षात्कुसुमचापः पुष्पबाणः काम
इवाभ्युपैति समायाति ।
अलंकारगत औचित्य का उदाहरण दिखलाने के लिये कहा गया है—यथा
श्रीहर्षस्येति । विश्रान्तेति । वत्सराज उदयन अपने द्वारा आयोजित वसन्त-
महोत्सव का अवलोकन करने के लिये बड़ी उत्कंठा से पधार रहे हैं । उन्हें
देखकर ज्ञात होता है कि साक्षात् कामदेव ही जैसे स्वविषयक उत्सव को देखने
के लिये आ रहे हों । ऐसी प्रतीति क्यों नहीं हो, जब कि दोनों में अनेक तरह
की समतायें वर्तमान हैं । जैसे राजा यदि विश्रान्तविग्रहकथ अर्थात् सर्वविजयी
होने के कारण अब युद्धकथा से रहित हैं तो कामदेव भी अनंग होने के
कारण विग्रहकथा—शरीरकथा से रहित है । राजा यदि रतिमान्—आनन्द
वाले हैं तो काम भी रति—निजपत्नीवाले हैं । राजा यदि सुशासक होने के
कारण जन-मानस में बसते हैं तो काम भी मनोभव होने के कारण जनमनोवासी
हैं । राजा को यदि "वसन्तक" एतन्नामक विदूषकप्रिय है तो कामदेव को भी

३६ औचित्यविचारचर्चा
वसन्त ऋतु प्रिय है। इस तरह यहाँ पर वत्सेश्वर में कामदेव की उपमा बहुत
ही स्पृहणीय है।
अत्र वत्सेश्वरस्य कुसुमचापेनोपमा शृङ्गारावसरसरसचारुतरतामौ-
चित्येन कामपि चेतश्चमत्कारिणीमाविष्करोति।
विवृणोति-अत्रेति। अत्र पद्ये, वत्सेश्वरस्योदयनराजस्य, कुसुमचापेन
कामेन सहोपमा, कामप्यपूर्वां, चेतश्चमत्कारिणीं हृदयाह्लाददायिनीम्,
औचित्येनानुरूपतया, शृङ्गारावसरसरसचारुतां शृङ्गारकालोपयुक्तस्निग्ध-
सुन्दरतामाविष्करोति प्रकटयति।
इस पद्य में वत्सराज उदयन की कामदेव के साथ दी गयी उपमा शृङ्गार-
रस के अनुकूल होने के कारण हृदय को चमत्कृत कर देनेवाली किसी अपूर्व ही
चारुताको प्रगट करती है। अतः यह अलंकारौचित्य का बड़ा ही सुन्दर उदाहरण
कहा जा सकता है।
नतु यथा चन्द्रकस्य-
खगोत्क्षिप्तैरन्त्रैस्तरुशिरसि दोलेव रचिता,
शिवा तृप्ताहारा स्वपिति रतिखिन्नेव वनिता।
तृषार्तो गोमायुः सरुधिरमसिं लेढि बहुशो,
बिलान्वेषी सर्पो हतगजकराग्रं विशति ॥
अलङ्कारानौचित्यमुदाहर्तुमाह-नतु यथा चन्द्रकस्येति। स
समाप्तसंग्रामस्य कस्यचिद्रणाङ्गणस्य वर्णनं करोति कविः-खगेति। खगैः
काकादिभिर्मांसभोजिभिः पक्षिविशेषैरुत्क्षिप्तैरूर्ध्वं नीतैरन्त्रैः-संग्र
मृतानां मानवाश्वादीनां क्षुद्रान्त्रैस्तरुशिरसि शाखिशाखायां, दोला
हिन्दोलकमिव रचिता निर्मिता, वृक्षशाखायां लम्बितानि रज्ज्रवाका-
राण्यन्त्राणि दोलाभ्रममुत्पादयन्तीति भावः। शिवा जम्बुकी, तृप्ताहारा
परिपूर्णभोजना, रतिखिन्ना सुरतश्रममन्थरा, वनिताङ्गनेव, स्वपिति शेते।
तृषार्तः पिपासापीडितो गोमायुः शृगालः, सरुधिरं सरक्तमसिं कृपाणं,
बहुशोऽनेकवारं, लेढि जिह्वया स्वादयति, बिलान्वेषी स्वावासछि-
द्रान्वेषणशीलः, सर्पः पन्नगः, हतगजकराग्रं मृतगजशुण्डाग्रं प्रविशति।
अलंकारगत अनौचित्य को प्रदर्शित करने के लिए कहा गया है-नतु यथा
चन्द्रकस्येति। खगेति। इस पद्य के द्वारा किसी ऐसे स्थान का चित्रण है

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ३७
गया है जहाँ अभी अभी युद्ध समाप्त हुआ है । एक ओर युद्ध में मरे हुए जीवों
की आँतड़ियाँ उड़ते हुए गीध, चोल, कौवे आदि के चंगुलों से गिरकर वृक्ष की
डाल पर झूले के समान लटक रही हैं, दूसरी ओर आहार से तृप्त होकर गीदड़ियाँ
संभोग-श्रान्त कामिनियों की तरह बेहोश पड़ी हैं, तीसरी ओर सियार खून से
लथपथ तलवारों को बार-बार चाट रहे हैं, तथा यत्र-कुत्र मृत पड़े हुए
हाथियों के सूँड़ में बिल खोजते हुए साँप घुस रहे हैं ।
अत्रानुचितस्थानस्थितायाः पुरुषपिशिततृप्तसुप्तायाः शिवायाः सुरत-
केलिक्लान्तकान्तया विच्छायैवोपमा परं वैपरीत्यं प्रकाशयति ।
अत्रोपर्य्युक्तपद्ये, अनुचितस्थानस्थिताया रतिकेलिप्रतिकूलरणाङ्गणे
वर्तमानायाः, पुरुषपिशिततृप्तसुप्ताया नरासृग्घाद्यशनसन्तुष्टसुप्तायाः, शिवाया
जम्बुक्याः, सुरतकेलिक्लान्तकान्तया रतिकर्मश्रमखिन्नाङ्गनया सह,
दीयमानोपमा, विच्छाया सौन्दर्यहीना एव, अतः परमत्यन्तं, वैपरीत्यं
प्रकृतबीभत्सरसप्रतिकूलतां प्रकाशयति ।
इस पद्य में सुरतकेलिक्लान्तकामिनी के साथ नरमांसभक्षणतृप्त जम्बुकी
की समता दिखाकर जो उपमालङ्कार की सृष्टि की गयी है वह अत्यन्त अनुचित
है, क्योंकि स्थान और कर्म की सृष्टि से दोनों में महान् अन्तर है । जैसे कामिनी
का स्थान यदि रम्यकेलिमंदिर है तो शिवा का भयानक रणांगण । यदि कामिनी
मनुष्य को लोकोत्तर आनन्द प्रदान कर स्वयं तृप्त होती है तो शिवा उसके भक्षण
से तृप्त होती है । इस तरह यह उपमा सर्वथा अप्रासंगिक और प्रकृत बीभत्सरस-
प्रतिकूल है । इसलिए सहृदयों के हृदय में इससे एक अरुचि ही उत्पन्न होती
है, आनन्द नहीं मिल पाता । अतः यह अलंकारानौचित्य का व्यञ्जक सिद्ध हो
रहा है ।
यथा वा मालवरुद्रस्य —
अभिनववधूरोषास्वादः करीषतनूनपा-
दसरलजनाश्लेषक्रूरस्तुषारसमीरणः ।
गलितविभवस्याज्ञेवाद्य द्युतिर्मसृणा रवे-
र्विरहिवनितावक्त्रौपम्यं बिभर्ति निशाकरः ॥
अलङ्कारगतानौचित्यस्य द्वितीयमुदाहरणमुपस्थापयितुमाह—यथा वा

३८ औचित्यविचारचर्चा
मालवेति । शीतकालिकवर्णनमिदम्-अभिनवेति । शीतकाले करीषतनू-
नपात् शुष्कगोमयाग्निरभिनववधूरोषास्वादो नवोढाकृत्रिमक्रोधवद्रुचिर-
इति भावः, (एवमेव) तुषारसमीरणो हिमवायुः, असरलस्य कपटमय-
प्रकृतेर्जनस्याश्लेषः परिष्वङ्ग इव, क्रूरश्चण्डोऽप्रिय इति यावत्, भवती-
ति शेषः, (तथा) रवेर्दिनकरस्य, द्युतिः प्रभा, गलितविभवस्य नष्टसम्पत्ते-
र्जनस्याज्ञाऽऽदेश इव मसृणा कोमला प्रभावानुत्पादिनीति यावत्, (एवं)
निशाकरश्चन्द्रोविरहिण्याः प्रोषितभर्तृकायाः कामिन्याः, वक्त्रस्य
परिपाण्डुरवदनस्यौपम्यं साम्यं, बिभर्ति धारयति । अर्थाच्छीतकाले-
ऽग्निर्जनप्रियः, समीरः कष्टप्रदो रविर्नष्टभावश्चन्द्रः परिपाण्डुरश्च भवति ।
अलंकारगत अनौचित्य का दूसरा उदाहरण दिखाने के लिए कहा गया
है — यथा वेति । अभिनवेति । शीतकाल में आकर सूखे गोबर (करसी) की
आग नवेली के कृत्रिम क्रोध के समान स्पृहणीय लगने लगती है, तथा ठंडी हवा
कपटी मनुष्यों के आलिंगन के समान अप्रिय हो जाती है, साथ ही प्रभाकर
(सूर्य) का तेज धनिक से गरीब बने हुए मनुष्य की आज्ञा के समान कोमल
हो जाता है और चन्द्रमा विरहिणी नायिका के मुख के समान निष्प्रभ हो
जाते हैं ।
अत्र कोमलकामिनीकोपेन करीषकृशानोः सादृश्यं शीतसमयस्वादु-
तया हृदयसंवादसुन्दरमप्यनुचितत्वेन सहसैव चेतसः सङ्कोचमिवादधाति ।
अत्र पद्ये, कोमलकामिनीकोपेन सुकुमारसुन्दरीक्रोधेन (सह),
करीषकृशानोः शुष्कगोमयाग्नेः, सादृश्यं साम्यप्रतिपादनं, शीतसमय-
स्वादुतया शिशिरसमये रुचिकारकतया, हृदयसंवादसुन्दरमपि हृद्यमपि,
अनुचितत्वेनायुक्तत्वेन, सहसैव हठादेव, चेतसश्चित्तस्य, सङ्कोचमिव
ग्लानिमिवादधात्युपस्थापयति । नवोढवधूकरीषाग्न्योः स्वादुत्वांशे साम्यं
यद्यपि हृदयसंवादि तथापि नोचितं तादृशसाम्यनिबन्धनं, संतर्पक-
कोमलकामिनीकोपेन दाहकाग्नेः साम्यस्य कविसम्प्रदायविरुद्धत्वादिति
भावः ।
इस पद्य में सुकुमार सुन्दरी के क्रोध के साथ शुष्क गोमय (करसी) की
आग का साम्यप्रतिपादन शीत समय में रुचिकर होने के कारण परम हृद्य होते

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ३९
हुए भी अत्यन्त अनुचित है, क्योंकि हार्दिक तृप्ति प्रदान करने वाले नवोढाकोप
की समता दाहक अग्नि के साथ दिखायी जाय—यह कविसंप्रदायविरुद्ध बात है ।
यहाँ इसकी उपेक्षा कर वैसी ही योजना की गयी है। इसलिए हठात् (अनौचित्य-
वश) सहृदयों के हृदय में एक ग्लानि सी उपस्थित हो जाती है, अतः इसे
अलंकार का दुरुपयोग ही कहा जा सकता है, सदुपयोग नहीं ।
यथा वा राजशेखरस्य--
चिताचक्रं चन्द्रः कुसुमधनुषो दग्धवपुषः,
कलङ्कस्तत्यः स्पृशति मलिनाङ्गारकलनाम् ।
यदेतत्सज्योतिर्दरदलितकर्पूरधवलं,
मरुद्भिर्भस्मैतत्प्रसरति विकीर्णं दिशि दिशि ॥
अलङ्कारगतानौचित्यस्य तृतीयमुदाहरणमुपस्थापयति--यथा वा राज-
शेखरस्येति । चिताचक्रमिति । चन्द्र इन्दुर्दग्धवपुषो हरशराग्निदग्धशरी-
रस्य, कुसुमधनुषः पुष्पबाणस्य कामदेवस्य, चिताचक्रं चितिगोलकमस्तीति
भावः, तत्रत्यश्चन्द्रस्थः, कलङ्को लाञ्छनं, मलिनस्य निस्तेजसोऽङ्गार-
स्याग्निकणस्य, कलनां तुलां, स्पृशति श्यामलाङ्गाररूपतामासादयतीति
भावः, दरदलितमीषच्चूर्णीकृतं यत्कर्पूरं तद्वत् धवलं स्वच्छं, यदेतत्स-
ज्योतिः दिङ्मण्डलमिति शेषः, (तत्) मरुद्भिः पवनैर्विकीर्णमितस्ततः
प्रक्षिप्तम्, एतद्दृशम् एतच्चिताभसितं, दिशि दिशि प्रत्याशं, प्रसर्पत्युड्डीयते ।
अलंकारगत औचित्य का तृतीय उदाहरण उपस्थित करने के लिए कहा
गया है—यथा वा राजेति । चिताचक्रमिति । महाकवि राजशेखर चन्द्रोपालंभ के
प्रसंग में कह रहे हैं कि यह चन्द्रमा क्या है ? हरकोप से दग्ध कामदेव की
चिता है और उसमें विद्यमान कलंक उसी चिता के बुझे हुए अंगारे हैं, कर्पूरचूर्ण
के समान धवल जो यह ज्योति फैल रही है वह और कुछ नहीं अपितु हवा के
द्वारा चारों ओर उड़ाये गये उसी चिता के भस्म हैं ।
अत्राप्यानन्दिसुधावस्यन्दसुन्दरस्येन्दोश्चिताचक्रत्वमनुचिततया कर्णक-
टुकमातङ्कमिवातनोति ।
अत्र पद्येऽप्यानन्दिना प्रमोदिना, सुधावस्यन्देनामृतवर्षणेन, सुन्द-
रस्य चारुतरस्येन्दोश्चन्द्रमसश्चिताचक्रत्वं चन्द्रे चिताचक्रत्वारोपो रूपक-

मिति यावत्, अनुचिततयाऽयुक्ततया, कर्णकटुकं श्रवणापिधायकमातङ्क-
त्रासमिवातनोति विस्तारयति ।
इस पद्य में भी आनन्ददायक एवं सुधाशीकर को बरसानेवाले परमाह्लादकारी
चन्द्र में चिताचक्रत्व का आरोपण करना अर्थात् इस तरह का रूपकालङ्कार अत्यन्त
अनुचित है, इससे पाठकों के हृदय में बड़ी विरसता उत्पन्न हो जाती है ।
योऽर्थस्तु हृदयसंवादी स यद्यनौचित्यस्पर्शलेशरहितस्तदाऽधिकतरा-
मलङ्कारशोभां पुष्णाति । यथा कार्पटिकस्य--
शीतेनोद्घृषितस्य माषशिमिवच्चिन्ताणर्वे मज्जतः,
शान्ताग्नि स्फुटिताधरस्य धमतः क्षुत्क्षामकण्ठस्य मे ।
निद्रा क्वापि विमानितेव दयिता संत्यज्य दूरं गता,
सत्पात्रप्रतिपादितेव वसुधा न क्षीयते शर्वरी ॥
हृदयसंवादिनोऽप्यर्थस्यानौचित्यलेशराहित्येनैव चारुतरत्वमित्युदाह-
रणद्वारा स्पष्टयितुमाह--योऽर्थस्त्विति । तु पुनर्येोऽर्थो हृदयसंवादी सहृदय-
मनोज्ञुमतः सोऽपि यदि अनौचित्यलेशरहितो विषमताकणसंपर्कविर-
हितो भवतीति शेषस्तदैवाधिकतरामत्यन्तम्, अलङ्कारशोभां, पुष्णाति
परिपुष्टीकरोति । औचित्यलक्षणलक्षिता सूक्तिः कथमिवानन्दसंदोहदायि-
केति प्रकटयितुमाह--यथा कार्पटिकस्येति । शीतेनेति । शीतेन तुषारपाते-
नातिशैत्येनेति भावः, माषशिमिवन्माषफलदण्डवदुद्घृषितस्यातितरामर्दि-
तस्यार्थात् माषशिमयो यथा शीतार्दितत्वेनातितरां संकोचमासादयन्ति
तथैवाहमपि जाड्यातिशयेन जानुभ्यां चिबुकं संनियोज्य ग्रन्थिरिवाभव-
मिति । चिन्तार्णवे चिन्तासमुद्रे, मज्जतो लयमिवाकलयतः, क्षुत्क्षाम-
कण्ठस्य बुभुक्षार्दितगलस्य, शान्ताग्नि निर्वाणमुपगतं वह्निं, धमतः फूत्कृत्य
वर्द्धयतोऽत एव स्फुरिताधरस्य विदीर्णरदच्छदस्य, मे मम, निद्रा सुषुप्सा,
विमानिता नादृता, दयिता प्रेयसीव, सन्त्यज्य त्यक्त्वा, दूरं गता पलायिता,
तथा शर्वरी रात्रिः, सत्पात्रप्रतिपादिता सज्जनसात्कृता, मेदिनीव, न
क्षीयते व्यत्येति ।
हृद्य अर्थ भी अनौचित्यसंपर्कशून्य होने पर ही चमत्कारी हुआ करता है
इसको उदाहरण द्वारा सिद्ध करने के लिए कहा गया है योऽर्थस्त्विति । शीते-
नेति । अर्थसंकटग्रस्त किसी की उक्ति है कि कड़ाके की सर्दी में उचित वस्त्र के

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ४१
अभाव से मेरी स्थिति उर्द की छोमी के समान हो गयी है, भूख से बुरी हालत
हो रही है, कंठ सूख गया है, बुझी हुई आग को प्रज्वलित करने के लिए बार-
बार फूँक लगाने से ओठ फट गये हैं, अनादृत प्रेयसी के समान नींद भी मुझसे
भागी-भागी फिर रही है और रात पहाड़ के समान मालूम पड़ रही है, बीतने
का नाम ही नहीं लेती । जैसे सत्पात्र को दान की गयी पृथ्वी के समान वह भी
अक्षय होने पर तुली हो ।
अत्रानौचित्यस्पर्शपरिहारेण केवलं हृदयसंवादसौन्दर्यमेव स्वादुता-
मादधाति ॥ १५ ॥
अत्र पद्ये, अनौचित्यस्पर्शपरिहारेणोपमालङ्कारस्य पूर्णौचित्येन, केवल
निष्प्रतिद्वन्दि, हृदयसंवादसौन्दर्यमेवार्थेन सह यो हृदयसंवादः समता,
तत्प्रयुक्तं सौन्दर्यमेव, स्वादुतामाह्लादकतामादधाति उत्पादयति ।
उक्त पद्य में “सत्पात्रप्रतिपादितेव वसुधा” “विमानितेव दयिता” इत्यादि
पदों के द्वारा प्रतिपादित उपमालंकार अनौचित्य के लेश से भी रहित है अर्थात्
सर्वथा समुचित है, अतः यहाँ का वर्णनीय अर्थ ( व्यक्तिविशेष की दीनता )
सहृदय-हृदयसमर्थित होकर आस्वाद्यता को उत्पन्न करता है ॥ १५ ॥
रसौचित्यं दर्शयितुमाह—
कुर्वन्सर्वाशये व्याप्तिमौचित्यरुचिरो रसः ।
मधुमास इवाशोकं करोत्यङ्कुरितं मनः ॥ १६ ॥
अलङ्कारगतौचित्यस्योदाहरण-प्रत्युदाहरणानि प्रदर्श्य सम्प्रति क्रमानु-
सारं षष्ठं रसौचित्यं विवेचयितुमाह- कुर्वन्निति । सर्वाशये सर्वेषां तत्त्व-
ज्ञानामाशये, वासनायां लक्षणया हृदये इति यावत्, व्याप्तिं व्यापकतां
सम्बन्धमिति यावत् कुर्वन्विदधानः, औचित्यरुचिर औचित्यचमत्कृतो
रसः शृङ्गारादिः, मधुमासो वसन्तर्तुः, अशोकं वञ्जुलमिव, मनश्चित्त-
मङ्कुरितं प्रफुल्लं करोति सम्पादयति ।
अलंकारगत औचित्यानौचित्य का प्रतिपादन करके अभी छठे रसगत
औचित्य की विवेचना करने के लिए कहा गया है—कुर्वन्निति । समस्त सहृदयों
के हृदय में व्यापक रूप से अपनी स्थिति बनाता हुआ औचित्य से युक्त रस
सज्जनों के चित्त को उसी तरह अंकुरित कर देता है जिस तरह अशोकतरु
को मधुमास ।

४२ औचित्यविचारचर्चा
औचित्येन भ्राजिष्णुः शृङ्गारादिलक्षणो रसः सकलजनहृदयव्यापी
वसन्त इवाशोकमङ्कुरितं मनः करोति ।
औचित्येनानुरूप्येण भ्राजिष्णुः रोचिष्णुः, शृङ्गारादिलक्षणो रसः
शृङ्गारवीरकरुणादिनामधेयो रसः, सकलजनहृदयव्यापी निःशेषमान-
वान्तःसञ्चारी, वसन्तः सुरभिरशोकं वञ्जुलमिवाङ्कुरितं प्रफुल्लं, मन-
श्चित्तं, करोति विदधाति ।
अनुरूप कथन से सुशोभित, सम्पूर्ण जनमानसव्यापी शृङ्गार, वीर आदि रस
सहृदयों के चित्त में उसी तरह नवनवोन्मेष उत्पन्न कर देता है जैसे वसन्त ऋतु
अशोक की टहनियों में नये नये अंकुर प्रस्फुटित करता है ।
यथा श्रीहर्षस्य—
उद्दामोत्कलिकां विपाण्डुरुचं प्रारब्धजृम्भां क्षणा-
दायासं श्वसनोद्गमैरविरलैरातन्वतीमात्मनः ।
अद्योद्यानलतामिमां समदनां नारीमिवान्यां ध्रुवं
पश्यन्कोपविपाटलद्युति मुखं देव्याः करिष्याम्यहम् ॥
रसौचित्यमुदाहर्तुमाह—यथा श्रीहर्षस्येति । उद्दामेति । उद्दामोत्क-
लिकां प्रादुर्भूतासंख्यकुड्मलां, पक्षान्तरे उत्कटोत्कण्ठाशालिनीम्, विपाण्डु-
रुचं विशेषतो धवलकान्ति, पक्षद्वयेऽपि समानमेतदेकत्र धवलपुष्पावृतत्वा-
दपरत्र प्रियवियोगेन वर्णव्यत्यासात्, प्रारब्धजृम्भां प्रारब्धा जृम्भावि-
कासो यस्यास्तां, पक्षान्तरे प्रारब्धा जृम्भा ( जम्हाई इति भाषा ) यया
ताम्, अविरलैः सततवृत्तैः, श्वसनोपगमैः पवनोदयैः, अन्यपक्षे निःश्वास-
निःसरणैः, आयासमान्दोलनं, पक्षान्तरे कामव्यथामातन्वतीं विस्तारयन्तीं,
समदनां मदनाख्यवृक्षालिङ्गितां, पक्षान्तरे कामशरजर्जरितामन्यां परां,
नारीं सुन्दरीमिव, इमां पुरोवर्तिनीम्, उद्यानलतां लीलोद्यानलतिकां,
पश्यन्नवलोकयन्नहमद्य, देव्या वासवदत्तायाः, मुखमाननं, कोपेन, क्रोधेन
विपाटला रक्तवर्णा, द्युतिः कान्तिर्यस्य तादृशं नायकस्य परकीयासम्पर्क-
सम्भावनापि नायिकां क्रोधान्वितां करोतीति नायिकास्वभावः, ध्रुवं निश्चयं,
करिष्यामि विधास्यामि । प्रेयस्--- क्रोधः प्रेयांसं नितरामानन्दयतीति
परिहासपटवो नायकाः कृत्रिमोपकरणेन कामिनीं कोपयन्तीति कामशास्-
विदां सम्मतिरिति भावः ।

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ४३
रसगतौचित्य का उदाहरण दिखाने के लिये कहा गया है-यथा श्रीहर्षस्येति ।
उद्दामेति—वाटिका की यह लता वस्तुतः दूसरी विरहिणी कामिनी सी है । चूंकि
कामिनी यदि उद्दाम ( उत्कट ) उत्कलिका ( उत्कंठा ) से युक्त रहती है तो यह
उद्दाम ( अजस्र ) उत्कलिका ( कलियों ) से युक्त है । कामिनी यदि विरह से
विपाण्डुर ( विशेषतः धवल ) रुचि ( कान्ति ) वाली हो जाती है तो यह भी
उजले उजले फूलों से ढंकी होने के कारण वैसी ही है। कामिनी यदि विरहावस्था
में प्रारब्धजृम्भा ( बारबार जमुहाई ) लेती है तो यह भी जृम्भा ( विकास ) का
आरंभ कर चुकी है । कामिनी यदि अविरल ( सतत होनेवाले ) श्वसनोद्गमों
( श्वासनिःसरणों ) से अपने आयास ( कामपीड़ा ) को विस्तृत करती रहती है
तो यह भी अविरल ( अत्यधिक ) श्वसनोद्गमों ( पवन के झँकोरों ) से अपना
आयास ( आन्दोलन ) व्यक्त कर रही है । कामिनी यदि समदना ( सकामा )
होती है तो यह भी समदना ( मदनात्मक तरु से युक्त = आलिंगित ) है । अतः
इस लता को देखता हुआ मैं आज निश्चितरूप से देवी वासवदत्ता के मुख को
क्रोध के कारण आरक्त बना दूँगा । अर्थात् देवी वासवदत्ता जब किसी कामिनी
की ओर देखते हुए मुझको देखकर क्रुद्ध हो उठती है तब इस लता को
देखकर भी वह अवश्य ही क्रुद्ध होगी । कारण यह लता भी किसी कामिनी
से कम नहीं है ।
अत्रेष्र्याविप्रलम्भरूपस्य शृङ्गाररसस्य वासवदत्तायामवेक्ष्यमाणस्य
नवमालिकालताया ललितवनितासुल्यतया विरहावस्थारोपेण नितरा-
मौचित्यरुचिरचमत्कारकारिणी दीप्तिरुपपादिता ॥
अत्र पद्ये वासवदत्तायां तन्नामकनायिकायां स्वपत्न्याम्, अवेक्ष्यमाणस्य
दृश्यमानस्य प्रतीयमानस्येति यावत्, ईर्ष्याविप्रलम्भरूपस्येर्ष्याजन्यवियो-
गात्मकस्य शृङ्गाररसस्य शृङ्गाराख्यरसविशेषस्य, नवमालिकालताया
अभिनवपुष्पसम्भारक्षमतामासादयन्त्या मालिकालतिकाया ललितवनि-
तातुल्यतया कमनीयकामिनीसमतया, विरहावस्थारोपेण विरहदशाध्या-
हारेण, नितरामत्यन्तमौचित्यरुचिरचमत्कारकारिणी औचित्यरुचिरस्य
चमत्कारस्य विधायिनी, दीप्तिः कान्तिरूपपादिता प्रतिपादिता ।
उक्त पद्य में वासवदत्तानिष्ठ ईर्ष्याविप्रलंभात्मक शृङ्गाररस, सुन्दर कामिनी
के समान होने के कारण नवीन मालिका नामक लता में विरहिणी की दशा का

४४ औचित्यविचारचर्चा

आरोप कर देने से अत्यधिक औचित्य के चलते सुन्दरतम चमत्कार को करने
वाला हो गया है ।
यथा वा कालिदासस्य—
बालेन्दुवक्राण्यविकासभावाद्वभुः पलाशान्यतिलोहितानि ।
सद्यो वसन्तेन समागतानां नखक्षतानीव वनस्थलीनाम् ॥
रसगतौचित्यस्य द्वितीयमुदाहरणमुपस्थापयति--यथा वा कालिदास-
स्येति । बालेति । अविकासभावाद्विकसितत्वाद्धेतोः, बालेन्दुवद् द्वितीया-
चन्द्रवद्, वक्राणि कुटिलान्यतिलोहितान्यत्यन्तरक्तानि, पलाशानि किशु-
कानि, वसन्तेन सुरभिणा ( नायकेन कर्त्रा ), सद्यस्तत्कालमेव, समा-
गतानां सम्पादितसंगमानां, वनस्थलीनामकृत्रिमवनभूमीनां ( नायिका-
नाम् ), नखक्षतानि कामक्रीडाविहितनखचिह्नानीव बभुः शुशुभिरे ।
रसगत औचित्य का दूसरा उदाहरण उपस्थित किया जा रहा है—यथा
वेति । बालेति । अविकसित होने के कारण द्वितीया के चन्द्र के समान टेढ़े टेढ़े
और लाल लाल पलाश के फूल ठीक उसी तरह शोभित हुए जैसे वसंतरूप
नायक के साथ अभी अभी समागम करके आयी हुयी वनस्थलीरूप नायिका के
कपोलगत नखक्षत हों ।
अत्र पार्वत्यां परमेश्वरस्याभिलाषशृङ्गारे वक्ष्यमाणे प्रथममुद्दीपन-
विभावभूतस्य वसन्तस्य वर्णनायां कामुकाध्यारोपेण वनस्थलीललनानां
कुटिललोहितपलाशकलिकाभिर्नवसंगमयोग्यनखतान्युत्प्रेक्षितानि पर-
मामौचित्यचारुतां प्रतिपादयन्ति ।
अत्रोक्तपद्ये, पार्वत्यामुमायां, परमेश्वरस्य शंकरस्याभिलाषशृङ्गारे-
ऽभिलाषात्मके शृङ्गारे, वक्ष्यमाणेऽग्रे कथयिष्यमाणे, प्रथमं पूर्वमुद्दी-
पनविभावभूतस्योद्दीपनकारणरूपस्य, वसन्तस्य सुरभेर्वर्णनायां, कामु-
काध्यारोपेण कामुकाभेदारोपेण, वनस्थलीललनानामकृत्रिमवनभूमिरू-
पाणां नायिकानां, कुटिललोहितपलाशकलिकाभिर्वक्ररक्तकिंशुकाङ्कुरैर्हेतु-
भूतैरित्यर्थः, उत्प्रेक्षितानि, सम्भावितानि नवसंगमयोग्यनखक्षतानि नूतन-
प्रसङ्गोचितनखचिह्नानि, परमौचित्यचारुतामत्यन्तौचित्यप्रयुक्तसौन्दर्यं,
प्रतिपादयन्ति विबोधयन्ति ।

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ४५
पार्वती में शिव के अभिलाषात्मक श्रृंगाररस का वर्णन आगे करना है
इसलिए पहले उद्दीपन विभाव ( कारण ) रूप वसन्त वर्णन के प्रसंग में यह
पद्य लिखा गया है, इसमें वसन्त का नायक रूप में और वनस्थली की नायिका
के रूप में वर्णन है अर्थात् वसन्त में नायक का अभेद और वनस्थलियों में
नायिकाओं के अभेद आरोपित हुए हैं, एवम् नूतन अथच रक्तपलाश मुकुलों की
नायककृत नूतन नखक्षत की संभावना की गयी है। ये आरोप और यह संभावना
अग्रिम वर्णनीय अभिलाष श्रृंगार के पोषक होने के नाते अत्यन्त उचित हैं। अतः
इस औचित्यपूर्ण वर्णन से काव्य का सौन्दर्य निखर उठा है।
नतु यथास्यैव—
वर्णप्रकर्षे सति कर्णिकारं दुनोति निर्गन्धतया स्म चेतः।
प्रायेण सामग्र्यविधौ गुणानां पराङ्मुखी विश्वसृजः प्रवृत्तिः॥
रसगतानौचित्यप्रदर्शनार्थमाह—नतु यथास्यैवेति। वर्णेति। वर्णप्रकर्षे
सति रूपोत्कृष्टतायां सत्यामपि, कर्णिकारं तन्नामकपुष्पविशेषो, निर्गन्ध-
तया गन्धराहित्येन हेतुना, चेतश्चित्तं दुनोति खेदयति स्म। प्रायेण सम्भ-
वतो, गुणानां वैशिष्ट्यानां सामग्र्यविधौ साङ्गोपाङ्गतायां, विश्वसृजो
विधातुः, प्रवृत्तिराचरणं, पराङ्मुखी विमुखीभवति।
रसगत अनौचित्य को प्रदर्शित करने के लिये कहा गया है—नतु यथेति।
वर्णप्रकर्षे इति। रूप संपन्न अर्थात् देखने में सुन्दर होने पर भी कर्णिकार के
फूल सुगन्धरहित होने के कारण हृदय को एक मार्मिक पीड़ा प्रदान करते हैं।
गुणों की परिपूर्णता में विधाता की प्रवृत्ति प्रायः प्रतिकूल ही हुआ करती है।
अत्र केवलकर्णिकारकुसुमवर्णनमात्रेण विधातृवाच्यतागर्भेणैव प्रस्तुत-
शृङ्गारानुपयोगिना तदुद्दीपनविभावोचितं न किञ्चिदभिहितम्।
अत्र पद्ये प्रस्तुतशृङ्गारानुपयोगिना प्रकृतशृङ्गाररसापोषकेण, विधातु-
र्ब्रह्मणो, वाच्यता निन्दा, गर्भे मध्ये यस्य तेन, क्रोडीकृतविधिनिन्दने-

४६ औचित्यविचारचर्चा
स्त्यर्थः, केवलकर्णिकारकुसुमवर्णनेन निर्गन्धकर्णिकारपुष्पवर्णनमात्रेण,
तदुद्दीपनविभावोचितं शृङ्गारोद्दीपनविभावानुरूपं, न किञ्चित्,
अभिहितमुक्तम् ।
इस पद्य में कर्णिकारपुष्प का वर्णन ऐसा किया गया है । जिससे प्रकृत
शृङ्गाररस का कुछ भी उद्दीपन नहीं हो रहा है केवल विधाता की निन्दा ही
व्यक्त होती है । अतः शृंगाररस के उद्दीपन विभावों के प्रसंग में ऐसा वर्णन कुछ
भी औचित्य नहीं रखता, इसलिए यह पद्य रसानौचित्य का उदाहरण कहा जा
सकता है ।
हास्यरसे यथा मम लावण्यवतीनाम्नि काव्ये—
सीधुस्पर्शभयान्न चुम्बसि मुखं किं नासिकां गूहसे,
रे रे श्रोत्रियतां तनोषि विषमां मन्दोऽसि वेश्यां विना ।
इत्युक्त्वा मदघूर्णमाननयना वासन्तिका मालती-
लीनस्यात्रिवसोः करोति वकुलस्येवासवासेचनम् ॥
शृङ्गाररसौचित्ययोरुदाहरणे प्रतिपाद्य सम्प्रति हास्यरसौचित्यं
प्रदर्शयितुमाह—हास्यरसे यथा ममेति । सीधुस्पर्शेति । रे रे अत्रिवसो ?
सीधुस्पर्शभयान्मद्यसंसर्गभीतेः, मुखमाननं, मदीयमिति भावः, न
चुम्बसि, नासिकां नासापुटं, किं किमर्थं, गूहसे मुद्रयसि, मद्यगन्धा-
घ्राणवारणाय रुद्धश्वासां विदधासीति स्पष्टोऽर्थः, एवंविधाचरणेन, विष-
मामनुचितां, श्रोत्रियतां वेदविहितकर्मानुष्ठायितां, तनोषि विस्तारयसि,
परमेतत्सर्वं व्यर्थम् यतो वेश्यां वारनारीं, तदासक्तिमितिलक्षणयार्थ
इति पूर्वोपस्थितामुक्त्वा, मदेन घूर्णमाने नयने यस्यास्तादृशी, वासन्तिका
तन्नामिका कापि वेश्या, मालतीलीनस्य मालतीनामिकायां स्वपत्न्यां,
लीनस्य परमासक्तस्यात एव वेश्यानुरागमुपेक्षमाणस्येति भावः, अत्रिव-
सोस्तन्नाम्नः कस्यचिद्ब्राह्मणस्य, बकुलस्य—बकुलनामख्यातपुष्पतरु
विशेषस्येव, आसवासेचनं मद्यकरणकं सेकं करोतीत्यर्थः । “विकसित
बकुलं योषितामाद्यमद्यै—” रितिकविप्रसिद्धिरीत्या यथा कामिनी शुष्कप्रायं
बकुलतरुं सरसं विधातुं मद्यगण्डूषेण सिञ्चति तथैव नीरसमत्रिवसुं सरसं

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ४७

कर्तुं मुखमद्येन सिञ्चतीति भावः। धार्मिकं निजपत्नी-प्रीति-परितुष्टं
कथञ्चित्त्वेश्यासम्पर्कमवाप्तवन्तमत्रिवसुनामानं ब्राह्मणं प्रति वासन्तिका-
नामिकाया वेश्याया आचरणं कविरत्र वर्णयतीति बोध्यम्।
शृंगाररस के औचित्य तथा अनौचित्य के उदाहरण दिखलाने के बाद
अब हास्य रसौचित्य का उदाहरण दिखलाने के लिये कहते हैं हास्यरसे यथा
ममेति। सीधु-स्पर्शेति-यह पद्य क्षेमेन्द्र रचित हास्यरसप्रधान लावण्यवती
नामक काव्य का है। कवि ने इस पद्य में एक धार्मिक (जो अपनी पत्नी के प्रेम
में लीन है पर किसी तरह वेश्या के संपर्क में आ गया है) के प्रति वेश्या के
द्वारा किये गये आचरण का वर्णन किया है। कवि का कथन है कि मद से घूमते
हुए आँखों वाली वासन्तिका नाम की कोई वेश्या-"अपवित्र मद्य के स्पर्श हो
जाने के भय से मेरे मुख को नहीं चूम रहे हो, नाम मूंद रहे हो, अनुचित
श्रोत्रियता (वैदिक ब्राह्मणता) को विस्तृत कर रहे हो, क्यों ? अरे मूढ़ ब्राह्मण !
वेश्या के बिना ही तो तुम में यह शिथिलता आ गयी है, वेश्या के संपर्क में बरा-
बर आते रहते तो यह शिथिलता कभी नहीं होती", ऐसा कहकर मालती नामक
निज पत्नी के प्रेम में लीन अत्रिवसु नामक किसी ब्राह्मण को अपने मुखमद्य
(मद्य की कुल्ली) से उसी तरह सिक्त कर रही है जैसे बकुल वृक्ष को कोई
नारी मद्य की कुल्ली से सींचती है।
अत्र श्रोत्रियस्यात्रिवसोरपवित्रसीधुस्पर्शशङ्कासङ्कोचनीलिनस्य
शुष्कबकुलवृक्षस्येव सरसतापादनाय वेश्याविलासिन्या यदासवासेचनं
तदङ्गभूतशृङ्गाररसाभासस्पर्शेन हास्यरसस्य वरासवस्येव सहकाररस-
वेधेन सचमत्कारमौचित्यमाचिनोति।
उपपादयत्यत्रेति। अत्र सीधुस्पर्शेतिपद्ये, श्रोत्रियस्य वेदाविहिताचार-
निष्ठास्यात्रिवसोस्तन्नामकब्राह्मणस्यापवित्रस्य सीधोर्मद्यस्य स्पर्शे तद्विषय
इति यावत्, या शङ्का, तया यः सङ्कोचः शैथिल्यं तत्र निलीनस्य,
शुष्कबकुलवृक्षस्य नीरसबकुलाख्यपुष्पतरोः, सरसतापादनाय रसमयता-
सम्पादनाय, वेशविलासिन्या वेश्यया, यदासवासेचनं मद्यसेकः, तथा-
सवासेचनमाचिनोति पदबोध्यक्रियाकर्तृ, अङ्गभूतशृङ्गाररसाभासस्पर्शेन,

४८ औचित्यविचारचर्चा
हास्यरसाङ्गभूतो यः शृङ्गाररसाभासो, वेश्यागतत्वेन शृङ्गारस्याभासत्वं
बोध्यम् तस्य सम्बन्धेन, हास्यरसस्य प्रकृतपद्यव्यङ्गनीयस्याङ्गित्वस्येति
भावः, अस्यौचित्यमित्यग्रिमेणान्वयः, वरासवस्य श्रेष्ठमद्यस्य, सहकाररस-
वेधेन सुगन्धिरसालरसमिश्रणेन, सचमत्कारं विच्छित्तिविशेषसहित-
मौचित्यमाचिनोत्याविष्करोति । अयं भावः—प्रधानतया हास्यरसाभिव्यञ्ज-
केऽस्मिन्पद्ये वेश्याकर्तृक-मद्यस्पर्शभयसङ्कुचितश्रोत्रियात्रिवसुकर्मकमुख-
मद्यकरणकसेकवर्णनेन यः शृङ्गाररसाभासोऽङ्गतया व्यञ्जितस्तेन प्रधान-
तयाऽभिव्यज्यमानस्य हास्यरसस्य पुष्टिर्भवतीति रसौचित्योदाहरणतां
प्रतिपद्यते पद्यमेतदिति ।
इस पद्य से हास्य रस अभिव्यक्त होता है, और साथ ही शुष्क बकुल तरु
के समान अपवित्र मद्य स्पर्श की शंका से संकुचित अत्रिवसु को, सरसता उत्पन्न
करने के लिए वेश्या द्वारा मद्य से सिक्त होने की बात वर्णित रहने से, शृङ्गार
रसाभास भी प्रतीत होता है किन्तु इन दोनों रसों में कोई विरोध (परस्परोपम-
र्द्योपमर्दकभाव) नहीं होता, अपितु अंगभूत शृंगाररसाभास के मिश्रण से हास्य
रस का चमत्कार उसी तरह बढ़ जाता है जिस तरह आम्ररसमिश्रण से उत्कृष्ट
मद्य की उपादेयता बढ़ जाती है। फलतः मानना पड़ेगा कि हास्यरसप्रसंग में
शृंगाररसाभासव्यञ्जक वेश्या द्वारा मुख मद्य से सींचने की बात का वर्णन यहाँ
उचित है।
यथा वा मम लावण्यवत्यामेव—
मार्गे केतकसूचिभिन्नचरणा सीत्कारिणी केरली,
रम्यं रम्यमहो पुनः कुरु विटेनेत्यर्थिता सस्मिता ।
कान्ता दन्तचतुष्कबिम्बितशशिज्योत्स्नापटेन क्षणं
धूर्तालोकनलज्जितेव तनुते मन्ये मुखाच्छादनम् ॥
हास्यरसस्यैव औचित्यस्य द्वितीयमुदाहरणमुपस्थापयति—यथा वा
ममेति । मार्ग इति । मार्गेऽभिसारपथे, केतकस्य “केवड़ेति” ख्यातस्य,
सूचिभिः कण्टकैर्भिन्नं, छिन्नं, चरणं पादो यस्याः सैवंभूता सती, सीत्का-
रिणी कण्टकभेदनव्यथया सीदित्याकारकं ध्वनिविशेषं कुर्वती, विटेन

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ४९
धूर्तेन, "अहोरम्यं रम्य"मरे सुन्दरं सुन्दरं, पुनर्भूयः, कुरु सीत्काररवं
विधेहीत्येवमर्थिता प्रार्थिता, केरली केरलदेशीया, कान्ता सुन्दरी
सस्मिता स्मेराननाऽतएव दन्तानां रदानां चतुष्केन, बिम्बिता चित्रिता या
शशिनश्चन्द्रमसो, ज्योत्स्ना द्युतिस्तद्रूपेण पटेन वस्त्रेण, धूर्तस्य विटस्या-
लोकनेन संदर्शनेन, लज्जिता प्राप्तलज्जेव, क्षणं क्षणमात्रं, मुखाच्छादन-
माननपिधानं, तनुते करोतीति मन्ये सम्भावयामि ।
हास्यरसौचित्य के द्वितीय उदाहरण में यह पद्य उपस्थित किया जा रहा
है—मार्गे इति । विट के साथ अभिसार के लिये जाती हुई केरली नायिका के
पैर में केवड़े का कांटा गड़ गया, जिससे वह सीत्कार कर उठी, यह सुनकर
विट ने—बहुत अच्छा, बहुत अच्छा जरा फिर ऐसा ही करना—यह कह कर
पुनः वैसा ही करने का आग्रह किया, जिससे वह हँसने लगी, अतः उसका मुख
खुल गया ओठों पर दन्तमुक्ता की चमक चन्द्रमा की चान्दनी की तरह झलकने
लग गयी । मुखपर प्रकाश का एक आवरण सा छा गया । इस स्थिति में वह
ऐसी प्रतीत हुई मानो धूर्त के देख लेने से लज्जित सी होकर आगे के चार दाँतों
के द्वारा प्रतिबिम्बित चन्द्रज्योत्स्नारूप वस्त्र से मुख को ढँक रही हो ।
अत्रापि हास्यरसस्य कुटिलविटनर्मोक्तिवचनौचित्येन शृङ्गाररसा-
भासाधिवासितस्य सचमत्कारः परः परिपोषः समुन्मिषति ।
अत्राप्युपर्युक्तपद्येऽपि, कुटिलविटनर्मोक्तिवचनौचित्येन वक्रविटपरि-
हासवचनौचित्येन, शृंगाररसाभासेन पराङ्गनाविषयकतायाऽऽभास-
रूपेण शृंगारेण, अधिवासितस्यानुप्राणितस्य, हास्यरसस्य, सचमत्कारो
विच्छित्तिविशेषमयः, पर उत्कृष्टः परिपोषः, पुष्टिः समुन्मिषति उल्लसति ।
इस पद्य में भी धूर्तशिरोमणि विट के द्वारा कहे गये वचनों के औचित्य से
शृङ्गाररसाभास के द्वारा अनुप्राणित हास्यरस का बहुत हो अच्छा परिपोष प्रस्तुत
हो जाता है ।
नतु यथा श्यामलकस्य—
चुम्बनसक्तः सोऽस्या दशनं च्युतमात्मनो वदनात् ।
जिह्वामूलप्राप्तं खादिति कृत्वा निरष्ठीवत् ॥
४ औ०

५० औचित्यविचारचर्चा
हास्यरसानौचित्यस्योदाहरणमुपस्थापयितुमाह- नतु यथा श्यामेति ।
चुम्बनेति । चुम्बने सक्तः संलग्नः कश्चिदधमो नायको, ऽस्याश्चुम्ब्यमानाया
वृद्धाया नायिकाया, श्च्युतं मूलमादिर्यस्यैवंभूतं त्रुटितमिति यावत् ।
जिह्वामूले कण्ठे, प्राप्तमुपस्थितं, दशनं दन्तं, खाडिति कृत्वा, निष्ठीवन-
कालिकमुद्रोच्चरितखाडितिशब्दविशेषं विधायात्मनः स्वस्य, वदनान्मुखात्,
निरष्ठीवत्ष्ठीवनमकार्षीत् ।
हास्यरसानौचित्य का उदाहरण दिखाने के लिए कहा जा रहा है—नतु
यथेति । चुम्बनेति । कोई अधम नायक किसी बूढ़ी को चूम रहा था, बूढ़ी का
एक दाँत टूट कर उस नायक के कण्ठ में चला गया जिसको खखार कर उसने
थूक दिया ।
अत्र हास्यरसस्य बीभत्सरसाधिवासितस्य लसुनलिप्तस्येव कुसुम-
शेखरस्यातिजुगुप्सितत्वादनीप्सितस्य परमानौचित्येन चमत्कारस्ति-
रोहितः । वृद्धापरिचुम्बने जिह्वामूलप्राप्तस्य च्युतदशनस्य कण्ठलोलिनः
ष्ठीवनेन बीभत्सस्यैव प्राधान्यम्, नतु हास्यरसस्य ।
अत्र पद्ये, लसुनलिप्तस्य रसोनरससम्पृक्तस्य, कुसुमशेखरस्य पुष्प-
माल्यस्य, अर्थात्स्वसुगन्धापेक्षयाधिकदुर्गन्धेन युक्तपुष्पमाल्यस्येवातिजु-
गुप्सितत्वादतिबीभत्सत्वादनीप्सितस्यानभिलषितस्य, बीभत्सरसाधि-
वासितस्य बीभत्सरसमिश्रितस्य, हास्यरसस्य, परमानौचित्येनात्यन्तम-
नुचितत्वेन, चमत्कारो विच्छित्तिस्तिरोहितो गुणीकृतः । गुणीकृतत्वे
हेतुमाह—वृद्धेति । वृद्धायाः परिचुम्बने, जिह्वामूलप्राप्तस्य, कण्ठलोलिनो
गललुण्ठनशीलस्य, च्युतदशनस्य पतितदन्तस्य वृद्धासम्बन्धिन इति भावः
ष्ठीवनेन थूत्करणेन, बीभत्सस्यैव बीभत्सरसस्यैव, प्राधान्यं मुख्यत्वं, नतु
ह्वास्यरसस्य । अत एवेदृशपरियोजना हास्यरसानौचित्यसूचिकेति भावः ।
जैसे लसुन के रस से लिप्त अतएव स्वकीय सुगंधापेक्षया अधिक दुर्गन्ध
युक्त पुष्पमाला घृणास्पद हो जाने से अनीप्सित हो जाती है वैसे ही बीभत्स-
मिश्रित-हास्यरस का वर्णन सर्वथा अनुचित है, क्योंकि एसी स्थिति में हास्य