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औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 107, कुल 256 में से

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पृष्ठ 107

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ४७

कर्तुं मुखमद्येन सिञ्चतीति भावः। धार्मिकं निजपत्नी-प्रीति-परितुष्टं
कथञ्चित्त्वेश्यासम्पर्कमवाप्तवन्तमत्रिवसुनामानं ब्राह्मणं प्रति वासन्तिका-
नामिकाया वेश्याया आचरणं कविरत्र वर्णयतीति बोध्यम्।
शृंगाररस के औचित्य तथा अनौचित्य के उदाहरण दिखलाने के बाद
अब हास्य रसौचित्य का उदाहरण दिखलाने के लिये कहते हैं हास्यरसे यथा
ममेति। सीधु-स्पर्शेति-यह पद्य क्षेमेन्द्र रचित हास्यरसप्रधान लावण्यवती
नामक काव्य का है। कवि ने इस पद्य में एक धार्मिक (जो अपनी पत्नी के प्रेम
में लीन है पर किसी तरह वेश्या के संपर्क में आ गया है) के प्रति वेश्या के
द्वारा किये गये आचरण का वर्णन किया है। कवि का कथन है कि मद से घूमते
हुए आँखों वाली वासन्तिका नाम की कोई वेश्या-"अपवित्र मद्य के स्पर्श हो
जाने के भय से मेरे मुख को नहीं चूम रहे हो, नाम मूंद रहे हो, अनुचित
श्रोत्रियता (वैदिक ब्राह्मणता) को विस्तृत कर रहे हो, क्यों ? अरे मूढ़ ब्राह्मण !
वेश्या के बिना ही तो तुम में यह शिथिलता आ गयी है, वेश्या के संपर्क में बरा-
बर आते रहते तो यह शिथिलता कभी नहीं होती", ऐसा कहकर मालती नामक
निज पत्नी के प्रेम में लीन अत्रिवसु नामक किसी ब्राह्मण को अपने मुखमद्य
(मद्य की कुल्ली) से उसी तरह सिक्त कर रही है जैसे बकुल वृक्ष को कोई
नारी मद्य की कुल्ली से सींचती है।
अत्र श्रोत्रियस्यात्रिवसोरपवित्रसीधुस्पर्शशङ्कासङ्कोचनीलिनस्य
शुष्कबकुलवृक्षस्येव सरसतापादनाय वेश्याविलासिन्या यदासवासेचनं
तदङ्गभूतशृङ्गाररसाभासस्पर्शेन हास्यरसस्य वरासवस्येव सहकाररस-
वेधेन सचमत्कारमौचित्यमाचिनोति।
उपपादयत्यत्रेति। अत्र सीधुस्पर्शेतिपद्ये, श्रोत्रियस्य वेदाविहिताचार-
निष्ठास्यात्रिवसोस्तन्नामकब्राह्मणस्यापवित्रस्य सीधोर्मद्यस्य स्पर्शे तद्विषय
इति यावत्, या शङ्का, तया यः सङ्कोचः शैथिल्यं तत्र निलीनस्य,
शुष्कबकुलवृक्षस्य नीरसबकुलाख्यपुष्पतरोः, सरसतापादनाय रसमयता-
सम्पादनाय, वेशविलासिन्या वेश्यया, यदासवासेचनं मद्यसेकः, तथा-
सवासेचनमाचिनोति पदबोध्यक्रियाकर्तृ, अङ्गभूतशृङ्गाररसाभासस्पर्शेन,