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सर्वकोश
औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ३९
हुए भी अत्यन्त अनुचित है, क्योंकि हार्दिक तृप्ति प्रदान करने वाले नवोढाकोप
की समता दाहक अग्नि के साथ दिखायी जाय—यह कविसंप्रदायविरुद्ध बात है ।
यहाँ इसकी उपेक्षा कर वैसी ही योजना की गयी है। इसलिए हठात् (अनौचित्य-
वश) सहृदयों के हृदय में एक ग्लानि सी उपस्थित हो जाती है, अतः इसे
अलंकार का दुरुपयोग ही कहा जा सकता है, सदुपयोग नहीं ।
यथा वा राजशेखरस्य--
चिताचक्रं चन्द्रः कुसुमधनुषो दग्धवपुषः,
कलङ्कस्तत्यः स्पृशति मलिनाङ्गारकलनाम् ।
यदेतत्सज्योतिर्दरदलितकर्पूरधवलं,
मरुद्भिर्भस्मैतत्प्रसरति विकीर्णं दिशि दिशि ॥
अलङ्कारगतानौचित्यस्य तृतीयमुदाहरणमुपस्थापयति--यथा वा राज-
शेखरस्येति । चिताचक्रमिति । चन्द्र इन्दुर्दग्धवपुषो हरशराग्निदग्धशरी-
रस्य, कुसुमधनुषः पुष्पबाणस्य कामदेवस्य, चिताचक्रं चितिगोलकमस्तीति
भावः, तत्रत्यश्चन्द्रस्थः, कलङ्को लाञ्छनं, मलिनस्य निस्तेजसोऽङ्गार-
स्याग्निकणस्य, कलनां तुलां, स्पृशति श्यामलाङ्गाररूपतामासादयतीति
भावः, दरदलितमीषच्चूर्णीकृतं यत्कर्पूरं तद्वत् धवलं स्वच्छं, यदेतत्स-
ज्योतिः दिङ्मण्डलमिति शेषः, (तत्) मरुद्भिः पवनैर्विकीर्णमितस्ततः
प्रक्षिप्तम्, एतद्दृशम् एतच्चिताभसितं, दिशि दिशि प्रत्याशं, प्रसर्पत्युड्डीयते ।
अलंकारगत औचित्य का तृतीय उदाहरण उपस्थित करने के लिए कहा
गया है—यथा वा राजेति । चिताचक्रमिति । महाकवि राजशेखर चन्द्रोपालंभ के
प्रसंग में कह रहे हैं कि यह चन्द्रमा क्या है ? हरकोप से दग्ध कामदेव की
चिता है और उसमें विद्यमान कलंक उसी चिता के बुझे हुए अंगारे हैं, कर्पूरचूर्ण
के समान धवल जो यह ज्योति फैल रही है वह और कुछ नहीं अपितु हवा के
द्वारा चारों ओर उड़ाये गये उसी चिता के भस्म हैं ।
अत्राप्यानन्दिसुधावस्यन्दसुन्दरस्येन्दोश्चिताचक्रत्वमनुचिततया कर्णक-
टुकमातङ्कमिवातनोति ।
अत्र पद्येऽप्यानन्दिना प्रमोदिना, सुधावस्यन्देनामृतवर्षणेन, सुन्द-
रस्य चारुतरस्येन्दोश्चन्द्रमसश्चिताचक्रत्वं चन्द्रे चिताचक्रत्वारोपो रूपक-