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सर्वकोश
औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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पृष्ठ 95

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ३५
सूक्ति कुचकुंभ के ऊपर हिलते हुए मुक्ताहार की शोभा से सुन्दरी के समान
सुशोभित होती है ।
यथा श्रीहर्षस्य—
विश्रान्तविग्रहकथो रतिमाञ्जनस्य
चित्ते वसन् प्रियवसन्तक एव साक्षात् ।
पर्युत्सुको निजमहोत्सवदर्शनाय
वत्सेश्वरः कुसुमचाप इवाभ्युपैति ॥
अलङ्कारगतौचित्यमुदाहर्तुमाह—यथा श्रीहर्षस्येति । विश्रान्तेति ।
विश्रान्ता विराममधिगता, विग्रहस्य संग्रामस्य, कथा चर्चा—यस्य सः
( विजितसकलशत्रुकतयेत्थमुक्तिः ), कामपक्षे विश्रान्ता नष्टा, विग्रहकथा
शरीरचर्चा--यस्य सः, ( अनङ्गत्वादेवमुक्तिः ) रतिमान् आनन्दमयः,
पक्षान्तरे रतिः कामपत्नी-तद्वान्, जनस्य लोकस्य, चित्ते हृदये, वसन्
स्पृहणीयत्वाद्वर्त्तमानः, पक्षान्तरे मनोभवत्वाल्लोकहृदयसञ्चारीति भावः,
प्रियो वसन्तकस्तन्नामा विदूषको यस्य सः, पक्षान्तरे प्रियो वसन्त-
कस्तन्नामकर्तुर्विशेषो यस्य सः, वत्सेश्वर उदयनराजः, निजमहोत्सव-
दर्शनाय स्वायोजितमहोद्भवविलोकनाय, पक्षान्तरे स्वविषयकमहोत्सव-
दर्शनाय, पर्युत्सुको नितरां स्पृहाशोलः, साक्षात्कुसुमचापः पुष्पबाणः काम
इवाभ्युपैति समायाति ।
अलंकारगत औचित्य का उदाहरण दिखलाने के लिये कहा गया है—यथा
श्रीहर्षस्येति । विश्रान्तेति । वत्सराज उदयन अपने द्वारा आयोजित वसन्त-
महोत्सव का अवलोकन करने के लिये बड़ी उत्कंठा से पधार रहे हैं । उन्हें
देखकर ज्ञात होता है कि साक्षात् कामदेव ही जैसे स्वविषयक उत्सव को देखने
के लिये आ रहे हों । ऐसी प्रतीति क्यों नहीं हो, जब कि दोनों में अनेक तरह
की समतायें वर्तमान हैं । जैसे राजा यदि विश्रान्तविग्रहकथ अर्थात् सर्वविजयी
होने के कारण अब युद्धकथा से रहित हैं तो कामदेव भी अनंग होने के
कारण विग्रहकथा—शरीरकथा से रहित है । राजा यदि रतिमान्—आनन्द
वाले हैं तो काम भी रति—निजपत्नीवाले हैं । राजा यदि सुशासक होने के
कारण जन-मानस में बसते हैं तो काम भी मनोभव होने के कारण जनमनोवासी
हैं । राजा को यदि "वसन्तक" एतन्नामक विदूषकप्रिय है तो कामदेव को भी