औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
पृष्ठ 103, कुल 256 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ४३
रसगतौचित्य का उदाहरण दिखाने के लिये कहा गया है-यथा श्रीहर्षस्येति ।
उद्दामेति—वाटिका की यह लता वस्तुतः दूसरी विरहिणी कामिनी सी है । चूंकि
कामिनी यदि उद्दाम ( उत्कट ) उत्कलिका ( उत्कंठा ) से युक्त रहती है तो यह
उद्दाम ( अजस्र ) उत्कलिका ( कलियों ) से युक्त है । कामिनी यदि विरह से
विपाण्डुर ( विशेषतः धवल ) रुचि ( कान्ति ) वाली हो जाती है तो यह भी
उजले उजले फूलों से ढंकी होने के कारण वैसी ही है। कामिनी यदि विरहावस्था
में प्रारब्धजृम्भा ( बारबार जमुहाई ) लेती है तो यह भी जृम्भा ( विकास ) का
आरंभ कर चुकी है । कामिनी यदि अविरल ( सतत होनेवाले ) श्वसनोद्गमों
( श्वासनिःसरणों ) से अपने आयास ( कामपीड़ा ) को विस्तृत करती रहती है
तो यह भी अविरल ( अत्यधिक ) श्वसनोद्गमों ( पवन के झँकोरों ) से अपना
आयास ( आन्दोलन ) व्यक्त कर रही है । कामिनी यदि समदना ( सकामा )
होती है तो यह भी समदना ( मदनात्मक तरु से युक्त = आलिंगित ) है । अतः
इस लता को देखता हुआ मैं आज निश्चितरूप से देवी वासवदत्ता के मुख को
क्रोध के कारण आरक्त बना दूँगा । अर्थात् देवी वासवदत्ता जब किसी कामिनी
की ओर देखते हुए मुझको देखकर क्रुद्ध हो उठती है तब इस लता को
देखकर भी वह अवश्य ही क्रुद्ध होगी । कारण यह लता भी किसी कामिनी
से कम नहीं है ।
अत्रेष्र्याविप्रलम्भरूपस्य शृङ्गाररसस्य वासवदत्तायामवेक्ष्यमाणस्य
नवमालिकालताया ललितवनितासुल्यतया विरहावस्थारोपेण नितरा-
मौचित्यरुचिरचमत्कारकारिणी दीप्तिरुपपादिता ॥
अत्र पद्ये वासवदत्तायां तन्नामकनायिकायां स्वपत्न्याम्, अवेक्ष्यमाणस्य
दृश्यमानस्य प्रतीयमानस्येति यावत्, ईर्ष्याविप्रलम्भरूपस्येर्ष्याजन्यवियो-
गात्मकस्य शृङ्गाररसस्य शृङ्गाराख्यरसविशेषस्य, नवमालिकालताया
अभिनवपुष्पसम्भारक्षमतामासादयन्त्या मालिकालतिकाया ललितवनि-
तातुल्यतया कमनीयकामिनीसमतया, विरहावस्थारोपेण विरहदशाध्या-
हारेण, नितरामत्यन्तमौचित्यरुचिरचमत्कारकारिणी औचित्यरुचिरस्य
चमत्कारस्य विधायिनी, दीप्तिः कान्तिरूपपादिता प्रतिपादिता ।
उक्त पद्य में वासवदत्तानिष्ठ ईर्ष्याविप्रलंभात्मक शृङ्गाररस, सुन्दर कामिनी
के समान होने के कारण नवीन मालिका नामक लता में विरहिणी की दशा का