औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
पृष्ठ 97, कुल 256 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ३७
गया है जहाँ अभी अभी युद्ध समाप्त हुआ है । एक ओर युद्ध में मरे हुए जीवों
की आँतड़ियाँ उड़ते हुए गीध, चोल, कौवे आदि के चंगुलों से गिरकर वृक्ष की
डाल पर झूले के समान लटक रही हैं, दूसरी ओर आहार से तृप्त होकर गीदड़ियाँ
संभोग-श्रान्त कामिनियों की तरह बेहोश पड़ी हैं, तीसरी ओर सियार खून से
लथपथ तलवारों को बार-बार चाट रहे हैं, तथा यत्र-कुत्र मृत पड़े हुए
हाथियों के सूँड़ में बिल खोजते हुए साँप घुस रहे हैं ।
अत्रानुचितस्थानस्थितायाः पुरुषपिशिततृप्तसुप्तायाः शिवायाः सुरत-
केलिक्लान्तकान्तया विच्छायैवोपमा परं वैपरीत्यं प्रकाशयति ।
अत्रोपर्य्युक्तपद्ये, अनुचितस्थानस्थिताया रतिकेलिप्रतिकूलरणाङ्गणे
वर्तमानायाः, पुरुषपिशिततृप्तसुप्ताया नरासृग्घाद्यशनसन्तुष्टसुप्तायाः, शिवाया
जम्बुक्याः, सुरतकेलिक्लान्तकान्तया रतिकर्मश्रमखिन्नाङ्गनया सह,
दीयमानोपमा, विच्छाया सौन्दर्यहीना एव, अतः परमत्यन्तं, वैपरीत्यं
प्रकृतबीभत्सरसप्रतिकूलतां प्रकाशयति ।
इस पद्य में सुरतकेलिक्लान्तकामिनी के साथ नरमांसभक्षणतृप्त जम्बुकी
की समता दिखाकर जो उपमालङ्कार की सृष्टि की गयी है वह अत्यन्त अनुचित
है, क्योंकि स्थान और कर्म की सृष्टि से दोनों में महान् अन्तर है । जैसे कामिनी
का स्थान यदि रम्यकेलिमंदिर है तो शिवा का भयानक रणांगण । यदि कामिनी
मनुष्य को लोकोत्तर आनन्द प्रदान कर स्वयं तृप्त होती है तो शिवा उसके भक्षण
से तृप्त होती है । इस तरह यह उपमा सर्वथा अप्रासंगिक और प्रकृत बीभत्सरस-
प्रतिकूल है । इसलिए सहृदयों के हृदय में इससे एक अरुचि ही उत्पन्न होती
है, आनन्द नहीं मिल पाता । अतः यह अलंकारानौचित्य का व्यञ्जक सिद्ध हो
रहा है ।
यथा वा मालवरुद्रस्य —
अभिनववधूरोषास्वादः करीषतनूनपा-
दसरलजनाश्लेषक्रूरस्तुषारसमीरणः ।
गलितविभवस्याज्ञेवाद्य द्युतिर्मसृणा रवे-
र्विरहिवनितावक्त्रौपम्यं बिभर्ति निशाकरः ॥
अलङ्कारगतानौचित्यस्य द्वितीयमुदाहरणमुपस्थापयितुमाह—यथा वा