औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ४५
पार्वती में शिव के अभिलाषात्मक श्रृंगाररस का वर्णन आगे करना है
इसलिए पहले उद्दीपन विभाव ( कारण ) रूप वसन्त वर्णन के प्रसंग में यह
पद्य लिखा गया है, इसमें वसन्त का नायक रूप में और वनस्थली की नायिका
के रूप में वर्णन है अर्थात् वसन्त में नायक का अभेद और वनस्थलियों में
नायिकाओं के अभेद आरोपित हुए हैं, एवम् नूतन अथच रक्तपलाश मुकुलों की
नायककृत नूतन नखक्षत की संभावना की गयी है। ये आरोप और यह संभावना
अग्रिम वर्णनीय अभिलाष श्रृंगार के पोषक होने के नाते अत्यन्त उचित हैं। अतः
इस औचित्यपूर्ण वर्णन से काव्य का सौन्दर्य निखर उठा है।
नतु यथास्यैव—
वर्णप्रकर्षे सति कर्णिकारं दुनोति निर्गन्धतया स्म चेतः।
प्रायेण सामग्र्यविधौ गुणानां पराङ्मुखी विश्वसृजः प्रवृत्तिः॥
रसगतानौचित्यप्रदर्शनार्थमाह—नतु यथास्यैवेति। वर्णेति। वर्णप्रकर्षे
सति रूपोत्कृष्टतायां सत्यामपि, कर्णिकारं तन्नामकपुष्पविशेषो, निर्गन्ध-
तया गन्धराहित्येन हेतुना, चेतश्चित्तं दुनोति खेदयति स्म। प्रायेण सम्भ-
वतो, गुणानां वैशिष्ट्यानां सामग्र्यविधौ साङ्गोपाङ्गतायां, विश्वसृजो
विधातुः, प्रवृत्तिराचरणं, पराङ्मुखी विमुखीभवति।
रसगत अनौचित्य को प्रदर्शित करने के लिये कहा गया है—नतु यथेति।
वर्णप्रकर्षे इति। रूप संपन्न अर्थात् देखने में सुन्दर होने पर भी कर्णिकार के
फूल सुगन्धरहित होने के कारण हृदय को एक मार्मिक पीड़ा प्रदान करते हैं।
गुणों की परिपूर्णता में विधाता की प्रवृत्ति प्रायः प्रतिकूल ही हुआ करती है।
अत्र केवलकर्णिकारकुसुमवर्णनमात्रेण विधातृवाच्यतागर्भेणैव प्रस्तुत-
शृङ्गारानुपयोगिना तदुद्दीपनविभावोचितं न किञ्चिदभिहितम्।
अत्र पद्ये प्रस्तुतशृङ्गारानुपयोगिना प्रकृतशृङ्गाररसापोषकेण, विधातु-
र्ब्रह्मणो, वाच्यता निन्दा, गर्भे मध्ये यस्य तेन, क्रोडीकृतविधिनिन्दने-