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औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 109, कुल 256 में से

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पृष्ठ 109

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ४९
धूर्तेन, "अहोरम्यं रम्य"मरे सुन्दरं सुन्दरं, पुनर्भूयः, कुरु सीत्काररवं
विधेहीत्येवमर्थिता प्रार्थिता, केरली केरलदेशीया, कान्ता सुन्दरी
सस्मिता स्मेराननाऽतएव दन्तानां रदानां चतुष्केन, बिम्बिता चित्रिता या
शशिनश्चन्द्रमसो, ज्योत्स्ना द्युतिस्तद्रूपेण पटेन वस्त्रेण, धूर्तस्य विटस्या-
लोकनेन संदर्शनेन, लज्जिता प्राप्तलज्जेव, क्षणं क्षणमात्रं, मुखाच्छादन-
माननपिधानं, तनुते करोतीति मन्ये सम्भावयामि ।
हास्यरसौचित्य के द्वितीय उदाहरण में यह पद्य उपस्थित किया जा रहा
है—मार्गे इति । विट के साथ अभिसार के लिये जाती हुई केरली नायिका के
पैर में केवड़े का कांटा गड़ गया, जिससे वह सीत्कार कर उठी, यह सुनकर
विट ने—बहुत अच्छा, बहुत अच्छा जरा फिर ऐसा ही करना—यह कह कर
पुनः वैसा ही करने का आग्रह किया, जिससे वह हँसने लगी, अतः उसका मुख
खुल गया ओठों पर दन्तमुक्ता की चमक चन्द्रमा की चान्दनी की तरह झलकने
लग गयी । मुखपर प्रकाश का एक आवरण सा छा गया । इस स्थिति में वह
ऐसी प्रतीत हुई मानो धूर्त के देख लेने से लज्जित सी होकर आगे के चार दाँतों
के द्वारा प्रतिबिम्बित चन्द्रज्योत्स्नारूप वस्त्र से मुख को ढँक रही हो ।
अत्रापि हास्यरसस्य कुटिलविटनर्मोक्तिवचनौचित्येन शृङ्गाररसा-
भासाधिवासितस्य सचमत्कारः परः परिपोषः समुन्मिषति ।
अत्राप्युपर्युक्तपद्येऽपि, कुटिलविटनर्मोक्तिवचनौचित्येन वक्रविटपरि-
हासवचनौचित्येन, शृंगाररसाभासेन पराङ्गनाविषयकतायाऽऽभास-
रूपेण शृंगारेण, अधिवासितस्यानुप्राणितस्य, हास्यरसस्य, सचमत्कारो
विच्छित्तिविशेषमयः, पर उत्कृष्टः परिपोषः, पुष्टिः समुन्मिषति उल्लसति ।
इस पद्य में भी धूर्तशिरोमणि विट के द्वारा कहे गये वचनों के औचित्य से
शृङ्गाररसाभास के द्वारा अनुप्राणित हास्यरस का बहुत हो अच्छा परिपोष प्रस्तुत
हो जाता है ।
नतु यथा श्यामलकस्य—
चुम्बनसक्तः सोऽस्या दशनं च्युतमात्मनो वदनात् ।
जिह्वामूलप्राप्तं खादिति कृत्वा निरष्ठीवत् ॥
४ औ०