औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपर्युक्तपद्ये, विप्रलम्भस्य वियोगस्य, भरेणातिशयेन, भग्नं विनष्टं,
धैर्यं यस्यास्तथाभूतायाः कादम्बर्याः, विरहव्यथाया विप्रयोगाधेर्वर्णना,
माधुर्यसौकुमार्यादिगुणयोगेन माधुर्यसौकुमार्यादिगुणसम्बन्धेन, प्रियंवदत्वेन
प्रियवादितया, पूर्णेन्दुवदना पूर्णचन्द्रानना कामिनीव, हृदयानन्ददायिनीं
मनोल्हादकारिणीं, दयिततमतामतिप्रेमास्पदत्वमातनोति । अर्थात्-यथा
कमनीयाकृतिः कामिनी प्रियवादितया हृदयानन्ददायिनी प्रियतमा
च सम्पद्यते तथैव काव्यमपि समुचितगुणयोगेनातिशयस्पृहणीयताम-
वाप्नोति ।
उपर्युक्त पद्य में विरहविधुरा कादम्बरी की विरहव्यथा का वर्णन माधुर्य-
सौकुमार्य आदि समुचित गुणों के सहयोग से वैसी ही लोकप्रियता को प्राप्त कर
रहा है जैसे विधुवदना सुन्दरी अपने प्रियवचनों के द्वारा प्रियतमा और हृदय-
हारिणी आदि विशेषणों से विभूषित होता है ।
ननु यथा चन्द्रकस्य--
युद्धेषु भाग्यचपलेषु न मे प्रतिज्ञा दैवं नियच्छति जयञ्च पराजयञ्च ।
एषैव मे रणगतस्य सदा प्रतिज्ञा पश्यन्ति यन्न रिपवो जघनं हयानाम् ॥
गुणगतानौचित्यं प्रदर्शयितुमाह--नतु तथा चन्द्रकस्येति । युद्धे-
ष्विति । भाग्यचपलेषु नियतिचञ्चलेषु युद्धेष्वाहवेषु मे मम, प्रतिज्ञा,
जयविषयकः पणो न, ( यतो हि ) तत्र, जयं पराजयं च, दैवं भाग्यमेव
नियच्छति वितरति, रणगतस्य संग्रामोपगतस्य, मे, सदा एषैव प्रतिज्ञास्ति
यत्, रिपवः शत्रवो हयानाम् घोटकानां युद्धात्पराङ्मुखीभूतानामिति
भावः, जघनं पश्चाद्भागं, न पश्यन्ति ।
गुणगत अनौचित्य को प्रदर्शित करने के लिये कहा गया है—नतु यथेति ।
युद्धेष्विवित्ति-युद्ध की स्थिति विचित्र होती है, वहाँ जीत या हार के बारे में प्रतिज्ञा-
पूर्वक पहले ही कुछ कह देना मेरे वश की बात नहीं है, वह तो पूर्णतः भाग्य पर
ही अवलंबित रहती है, परन्तु हाँ यह मेरी दृढ़ प्रतिज्ञा है कि युद्ध से जी चुरा
कर मोड़े गये घोड़े की जांघ शत्रु कभी नहीं देख सकते । तात्पर्य यह है कि
वीरतापूर्वक लड़ना ही मेरा काम है जीत-हार की चिन्ता करना नहीं ।