औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
पृष्ठ 92, कुल 256 में से
संदर्भ में पढ़ें३२ औचित्यविचारचर्चा
अत्र क्षात्रवृत्तिरिवौजसा काव्यगुणेनास्पृष्टा सुभटोक्तिरुचितार्थापि
तेजोजीवितविरहिता दुर्गंतगृहदीपशिखेव मन्दायमाना न विद्योतते ।
उपर्युक्तपद्ये ओजसा तेजसा, अस्पृष्टाऽशतोऽपि रहिता, क्षात्रवृत्तिः
क्षत्रियजात्युत्पन्नजनाचरणमिव, ओजोनामकेन काव्यगुणेनास्पृष्टो-
चितार्थाऽथौचित्ययुक्तापि, सुभटोक्तिर्विशिष्टवीरजनकथन, तथैव न
विद्योतते प्रकाशते । यथा दुगंतानां दरिद्राणां, गृहे वाताघातादिसङ्कुले
आवासे, स्थितस्य दीपस्य शिखा, तेजोजीवितविरहिता तेजोविकिरणा-
त्मकनिजस्वभावशून्या, अत एव मन्दायमाना मन्दतामवलम्बमाना, न
विद्योतते इति भावः ।
पूर्वोक्त पद्य एक सुन्दर योद्धा का उक्तिरूप है । उसका अर्थ यद्यपि उचित है
अर्थात् उसका आशय वीरतोचित है, तथापि यह सुभटोक्ति चमकती नहीं । कारण
यह है कि जिस तरह क्षत्रियों के आचरण में नैसर्गिक तेजस्विता का रहना आवश्यक
है उसी तरह वीरों की उक्ति में भी ओजोगुण का रहना उचित है । ऐसी स्थिति
में ओजोनामक काव्यगुण से सर्वथा रहित यह उक्ति उस दीपशिखा के समान
दीप्तिविहीन है जो दरिद्रों के समुचित आवरणरहित घर में रहने के कारण प्राण-
तुल्य प्रकाशात्मक निजनैसर्गिक स्वभाव से हीन होकर मन्द पड़ जाती है ।
तात्पर्य यह है कि काव्य में प्रतिपाद्य अर्थ के उपयुक्त ही शैली और भाषा का
रहना भी अत्यावश्यक है, अन्यथा कवि का अभिप्रेत सिद्ध नहीं हो पाता । इन्हीं
गुणों के अभाव में यहाँ की सुभटोक्ति भी प्राणहीन सी प्रतीत होती है ।
यथा वा राजशेखरस्य-
एतस्याः स्मरसंज्वरः करतलस्पर्शैः परीक्ष्यो न यः,
स्निग्धेनापि जनेन दाहभयतः प्रस्थम्पचः पाथसाम्
निर्वीर्याकृतचन्दनौषधिविधौ तस्मिंस्तदत्कारिणो,
लाजस्फोटममी स्फुटन्ति मणयः सर्वेऽपि हारस्रजाम् ॥
गुणगतानौचित्यस्य द्वितीयमुदाहरणमुपस्थापयितुमुपक्रमते-यथा
वा राजशेखरस्येति । एतस्या इति । पाथसां जलानां, प्रस्थं द्रोणप्रमाणं
पचति शोषयति उष्णं विधत्ते एवंभूतः, अत एव स्निग्धेनापि प्रियेणापि,
सरसेनापीति व्यज्यते ( शुष्कापेक्षया सरसा अधिकतापसहा भवन्तीति