सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 101, कुल 256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 101

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ४१
अभाव से मेरी स्थिति उर्द की छोमी के समान हो गयी है, भूख से बुरी हालत
हो रही है, कंठ सूख गया है, बुझी हुई आग को प्रज्वलित करने के लिए बार-
बार फूँक लगाने से ओठ फट गये हैं, अनादृत प्रेयसी के समान नींद भी मुझसे
भागी-भागी फिर रही है और रात पहाड़ के समान मालूम पड़ रही है, बीतने
का नाम ही नहीं लेती । जैसे सत्पात्र को दान की गयी पृथ्वी के समान वह भी
अक्षय होने पर तुली हो ।
अत्रानौचित्यस्पर्शपरिहारेण केवलं हृदयसंवादसौन्दर्यमेव स्वादुता-
मादधाति ॥ १५ ॥
अत्र पद्ये, अनौचित्यस्पर्शपरिहारेणोपमालङ्कारस्य पूर्णौचित्येन, केवल
निष्प्रतिद्वन्दि, हृदयसंवादसौन्दर्यमेवार्थेन सह यो हृदयसंवादः समता,
तत्प्रयुक्तं सौन्दर्यमेव, स्वादुतामाह्लादकतामादधाति उत्पादयति ।
उक्त पद्य में “सत्पात्रप्रतिपादितेव वसुधा” “विमानितेव दयिता” इत्यादि
पदों के द्वारा प्रतिपादित उपमालंकार अनौचित्य के लेश से भी रहित है अर्थात्
सर्वथा समुचित है, अतः यहाँ का वर्णनीय अर्थ ( व्यक्तिविशेष की दीनता )
सहृदय-हृदयसमर्थित होकर आस्वाद्यता को उत्पन्न करता है ॥ १५ ॥
रसौचित्यं दर्शयितुमाह—
कुर्वन्सर्वाशये व्याप्तिमौचित्यरुचिरो रसः ।
मधुमास इवाशोकं करोत्यङ्कुरितं मनः ॥ १६ ॥
अलङ्कारगतौचित्यस्योदाहरण-प्रत्युदाहरणानि प्रदर्श्य सम्प्रति क्रमानु-
सारं षष्ठं रसौचित्यं विवेचयितुमाह- कुर्वन्निति । सर्वाशये सर्वेषां तत्त्व-
ज्ञानामाशये, वासनायां लक्षणया हृदये इति यावत्, व्याप्तिं व्यापकतां
सम्बन्धमिति यावत् कुर्वन्विदधानः, औचित्यरुचिर औचित्यचमत्कृतो
रसः शृङ्गारादिः, मधुमासो वसन्तर्तुः, अशोकं वञ्जुलमिव, मनश्चित्त-
मङ्कुरितं प्रफुल्लं करोति सम्पादयति ।
अलंकारगत औचित्यानौचित्य का प्रतिपादन करके अभी छठे रसगत
औचित्य की विवेचना करने के लिए कहा गया है—कुर्वन्निति । समस्त सहृदयों
के हृदय में व्यापक रूप से अपनी स्थिति बनाता हुआ औचित्य से युक्त रस
सज्जनों के चित्त को उसी तरह अंकुरित कर देता है जिस तरह अशोकतरु
को मधुमास ।