औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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ललितललनेव सुन्दरीयोषिदिव, झटिति शीघ्रमेव, चेतसि हृदये, अनौचित्यं
विरसतां, सञ्चारयति प्रसर्पयति ।
उपर्युक्त श्लोक में विरहविधुररमणीजनोचित माधुर्य गुण का अतिक्रमण
करके “तड़तड़ा के लावा के समान फूट रहे हैं" इस प्रयोग से ऊर्जितस्वभाव
वाले ओजोगुण का समावेश कर देने के कारण समूची सूक्ति ही कटुभाषिणी
सुन्दरी के समान सहृदयों के हृदय में हठात् औचित्य का संचार कर देती है ।
अर्थात् विप्रलंभ शृङ्गार में माधुर्य गुण की स्थिति आवश्यक होती है ओजो
गुण की नहीं, फिर माधुर्य के बदले ओजोगुणप्रतिपादक शब्दों का प्रयोग करना
तो सहृदयों के हृदय में विरसता की सृष्टि कर देता है । अतः यह अत्यन्त ही
अनुचित है ॥ १४ ॥
अलङ्कारौचित्यं दर्शयितुमाह—
अर्थौचित्यवता सूक्तिरलङ्कारेण शोभते ।
पीनस्तनस्थितेनेव हारेण हरिणेक्षणा ॥ १५ ॥
गुणगतौचित्योदाहरण-प्रत्युदाहरणादिकं प्रतिपाद्य सम्प्रति पञ्चमम-
लङ्कारगतौचित्यं विवृणुते—अर्थौचित्येति । अर्थौचित्यवता वर्णनीयार्थानु-
रूपेणालङ्कारेण रूपकोपमादिना, सूक्तिः सुभाषितं, पीनस्तनस्थितेन
स्थूलपयोधरोपरि लोलता, हारेण मौक्तिकेन, हरिणेक्षणा मृगाक्षीव,
शोभते विभासते ।
अलंकारगत औचित्य की विवेचना की जा रही है—अर्थौचित्येति । अर्थगत
औचित्य से अनुप्राणित अलंकार से सूक्ति उसी तरह सुशोभित होती है जैसे
उत्तुङ्ग पयोधर पर स्थित हार से मृगलोचना सुन्दरी ।
प्रस्तुतार्थस्यौचित्येनोपमोत्प्रेक्षादिनालङ्कारेण सूक्तिश्चकास्ति
कामिनीवोच्चकुचचुम्बिना रुचिरमुक्ताकलापेन ।
विवृणुते- प्रस्तुतेति । प्रस्तुतार्थस्य प्रकृतार्थस्य, औचित्येनानुरूपतया
निबद्ध्यमानेनेति शेषः, उपमोत्प्रेक्षादिनालङ्कारेण, सूक्तिः सुभाषितम्,
उच्चकुचचुम्बिनोत्तुङ्गस्तनस्पर्शशालिना, रुचिरमुक्ताकलापेन मनोहर-
हारेण, कामिनी सुन्दरीव, चकास्ति सुशोभते ।
प्रस्तुत अर्थ के औचित्य से युक्त उपमा-उत्प्रेक्षा आदि अलंकार के द्वारा