आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
विवक्षायां यत् समर्थं तत्करोत्येवेत्युपसंहर्तुं शक्यमिति चेन्न, काल-
नियमाविवक्षायां यत् समर्थं तत्करोत्येवेति कदाचित् स्यात् । तथा
च संभवविधेरत्यन्तायोगो विरुद्धो न स्वयोगः । नीलं सरोजं
भवत्येवेतिवत् ।
ननु यदसमर्थं प्रथममासीत् तस्य सामर्थ्यं पश्चादपि कुत
आगतम्, प्रथमं समर्थस्य वा पश्चात् कुत्र गतम् । नैतदेवं,
तत्तत्सहकारिमत्तत्तत्कारकत्वं हि सामर्थ्यम्, अतद्वतस्तदन्यवतो
वा तदकर्तृत्वममामर्थ्यम् । इदं चौत्पत्तिकमस्य रूपं, ते च
( उत्तर ) यह भी ठीक नहीं है। कालविशेषका निर्देश किये बिना
'जो समर्थ है वह करता ही है यह बात सदाके लिए नहीं है किन्तु
कदाचित्के लिये है। इस स्थितिमे उस उपसहारका यह स्वरूप हुआ
कि 'जो समर्थ है उसका करना संभव है'। यदि इस संभव-विधिको
किसीके साथ विरोध है तो करणके अत्यन्तिक अयोगके साथ है न कि
सामान्य अयोग के साथ । जैसे 'नील कलम होता ही है' यहाँ नील
कमलकी संभावना बताकर नीलकमलका सर्वथा न होना ( आत्यन्तिक
अभाव ) रोका जाता है, न कि नीलकमलके न होनेको भी रोक देता है ।
क्योंकि नीलकमल नहीं भी होता है ।
( शङ्का ) तो, जो पहले अङ्कुर करनेमें असमर्थ रहा, उसमे पीछे
भी सामर्थ्य कहासे आगयी ? अथवा जो पहले समथ था, उसकी
सामर्थ्य पीछे कहाँ चली गयी ?
( उत्तर ) इस तरहका प्रश्न नहीं कर सकते । क्योंकि यहाँ
सामर्थ्यका अर्थ योग्यता लो, तबतो पहले और पीछे भी वह समर्थ ही है ।
सामर्थ्यपदसे यदि कार्यका करना अर्थ लो, तो उस उस सहकारीसे युक्त
होकर उस उस कार्यको कर देना ही सामर्थ्य है और उस उस सहकारीके
अभावमे अथवा अन्य कार्यके सहकारीके योगमे उस कार्यका न करनाही
असामर्थ्य है । भावोंका यही स्वाभाविक रूप है । और वे सहकारी
अपने उपस्थापक कारणके अधीन होनेसे अनियत कालमे उपस्थित होते
है । इसलिये कार्योंका भी काल अनियत रहता है । अर्थात् सामर्थ्य
सहकारिणः स्वोपसर्पणकारणवशात् भिन्नकाला इत्यर्थात् कार्या-
णामपि भिन्नकालतेति ।
तथाप्येककालस्थ एव भावो जातप्रध्वस्तदा तदा तत्कार्यं
करोतु, उत्पन्नमात्रस्य तत्स्वभावत्वात्, एक देशस्थवदिति चेत्—
सेयमेककालस्थता स्वरूपापेक्षया ? सहकारिसन्निध्यापेक्षया
वा ? आद्ये न किञ्चिदनुपपन्नम्, नित्यानामप्येकरूपत्वात् वर्त-
मानैकस्वभावत्वात् सर्वभावानाम् । तदेव तु क्वचित् सावधि
क्वचिन्निरवधीति विशेषः । सावधित्वेऽपि व्यापारफलप्रवाह-
प्रकर्षाप्रकर्षाभ्यां विशेषः ।
न कहीं जाता है और न कहीं से आता है । किन्तु सहकारीका योग
और वियोग ही सामर्थ्य और असामर्थ्य है । और उस योगका भी
समय अनियत है क्योंकि वह भी उपस्थापक कारणके अधीन है ।
( शङ्का ) तो भी जैसे एक जगह रहता हुआ विषय अपनेसे भिन्न
देशमें आत्माम ज्ञानसुखादिको पैदा करता है वैसे ही किसी एक काल
मे रहकर नष्ट हो जानेवाला क्षणिक पदार्थ भी विभिन्न क्षणोंम कार्य
पैदा कर सकता है क्याकि उसी स्वभाव का वह पैदा होता है ।
( उत्तर ) तो यहाँ एक कालमे रहनेका अभिप्राय अपने कालमें
रहना है ? या सहकारियोंके कालम रहना है ?
यहाँ प्रथमपक्षमे कोई अनुपपत्ति नहीं है । क्योंकि नित्य और
अनित्य सभी स्थिर पदार्थ अपने कालमे ही रहते है । क्याकि अपने
कालमे ही रहना सभी भावोंका स्वभाव है । किंतु यही रहना कहीं
अवधिके साथ है जैसे अनित्योंका । और कहीं बिना अवधिके है,
जैसे नित्या का । सावधि रहनेमे भी व्यापार और फलके प्रवाहका
प्रकर्ष और अप्रकर्षरूप विशेषता होती है । अर्थात् यागसे अपूर्वनामक
एक ऐसा प्रकृष्ट व्यापार पैदा होता है, जिसके प्रभावसे बहुत पहन ही
यागके नष्ट हो जानेपर भी स्वर्गरूप फल उत्पन्न हो जाता है । बीजादिमें
यह प्रकर्ष नहीं है, इसलिये अङ्कुरोत्पत्तिके अव्यवहित पूर्वमें बीजका
रहना आवश्यक है ।
क्षणभङ्गवादः ४५
द्वितीयस्तु स्यादपि यदि तेषां यौगपद्यं भवेत्, क्रमिणस्तु
सहकारिण इत्युक्तम् । सहकारिसहितः स्वभावेन करोतीति
वक्तरि तु जातनष्ट एव करोत्वित्युत्तरप्रसङ्गो निरर्गलशैश-
वस्येत्यलमनेन ।
तस्मात् कार्यस्य स एव कालः, कारणस्य तु स चान्यश्चेति
संबन्धिकालापेक्षया पूर्वकालताव्यवहारः ।
अपि च यदा तदेतिस्थाने यत्र तत्रेति प्रक्षिप्य तयोरेव प्रसङ्ग-
तद्विपर्यययोः को दोषः ?
दूसरा पक्ष तब हो सकता, यदि सभी सहकारी एक कालमें
रहें । किन्तु सहकारी क्रमसे रहने वाले हैं, यह कहा जा चुका है ।
सहकारिसहित होकर स्वयं या अपूर्व आदि व्यापारके द्वारा स्वभावतः
करता है, ऐसा कहने वालेके प्रति तो यह उत्तर उपस्थित करना
कि--पैदा होते ही नष्ट होकर ही (क्षणिक होता हुआ भी) कार्य
करेगा, स्वच्छन्द शिशुता है । अतः इससे बचो । अर्थात् उक्त कथनमें
क्षणिकत्वका अवसर ही नहीं है ।
अतः कार्यका वही [सामग्रीसमवधानका उत्तरवर्ती] काल है और
कारणका तो यथासंभव वह भी है और दूसरा भी है । अर्थात् कोई
कारण सामग्रीके बाद भी बना रहता है और कोई कार्यके पूर्व ही नष्ट
हो जाता है । कार्य और कारणके एक समयमें रहनेपर भी कारणमें
कार्यके प्रति पूर्वकालताका जो व्यवहार होता है, वह कार्यप्रागभावरूप
सम्बन्धीके कालमें उसके नियमतः रहनेके कारण होता है ।
इसके अतिरिक्त कालवाची 'जब और तब' पदोंके स्थानमें देश-
वाची 'जहां और वहां' पदोंका भी निवेश करके यदि वे ही प्रसङ्ग
और विपर्यय उपस्थित किये जाँय तो क्या हानि है ? अर्थात् “जो जब
जहां जिसके प्रति समर्थ है, वह तब वहां उसे करता ही है" ऐसा
नियम मानकर पूछता हूँ कि-खेतमें बोया गया बीज बखारमे
अङ्कुर करनेमें समर्थ है या नहीं ? यहां यदि समर्थ मानो तो क्षेत्रस्थ
४६ आत्मतत्त्वविवेके
न कश्चिदिति चेत, तर्हि देशाद्वैतं वा कारणभेदो वा
आपद्येत ।
आपद्यतां, तदादाय योगाचारनयनगरं प्रवेक्ष्याम इति, न,
हेतुफलभाववादवैरिरणमनपोद्य तत्र प्रवेष्टुमशक्यत्वात् ।
तदपवादे वा सत्त्वाख्यसाधनशस्त्रसंन्यासिनस्तव बहिर्वाद-
संग्रामभूमावपि कुतो भयम् ?
बीज बखारेमे भी अंकुर उत्पन्न करदे, इस प्रकारका प्रसङ्ग और 'नहीं
करता है इसलिये वह उस समय खेतमे अंकुर-जनन समर्थ होता हुआ
भी बखारमे अङ्कुर जनन समर्थ नहीं है' इस प्रकारका विपर्यय तुम्हारे
प्रति भी दिये जा सकते हैं । अर्थात् क्षणिक भी बीज सामर्थ्यासामर्थ्य-
लक्षण विरुद्ध-धर्मके संसर्गसे भिन्न-भिन्न होने लगेगा ।
यदि कहो, इसमें कोई हानि नहीं है, तो सामर्थ्यपक्षमें सब जगह
समानरूपसे कार्य करनेसे देशाद्वैतकी आपत्ति हो जायगी । तथा
असामर्थ्यपक्षमें एक ही क्षणिकबीजमें सामर्थ्य और असामर्थ्यरूप
विरुद्धधर्मों के संसर्गसे पुनः भेदकी आपत्ति आ जायगी ।
( शङ्का ) देशाद्वैत हो जाय, उसे लेकर हम योगाचारमतरूप नगरमें
प्रवेश कर जायेंगे । अर्थात् योगाचारमतानुसार हम भी बाह्य वस्तु नहीं
मानेंगे । अतः क्षेत्र कुशूल आदि सभी देश विज्ञानरूपसे अभिन्न ही
हैं । इस स्थितिमे देशभेद मानकर मेरे प्रति सामर्थ्यासामर्थ्यका
क्षणिकबीजमें आपादन नहीं हो सकता है ।
( उत्तर ) ऐसा कहना भी ठीक नहीं है । क्योंकि कार्यकारण-
भावरूप वैरीको परास्त किये बिना योगाचारमतरूप नगरमें प्रवेश ही
नहीं कर सकते । अर्थात् योगाचारमतमे सब कुछ विज्ञानरूप होनेसे
कार्यकारणका भेद भी मिथ्या मानना होगा । और यही योगाचारनगरमें
प्रवेशका बाधक होगा ।
यदि योगाचारनगरमें प्रवेश पानेके लिये कार्यकारणभावको भी
छोड़ दो तो "यत् सत् तत् क्षणिकम्" इस अनुमानमें क्षणिकत्वसिद्धिका
क्षणभङ्गवादः [४७]
ननु यावत्योऽर्थक्रिया भिन्नदेशास्तावद्भेदं कारणमस्तु को
विरोध इति चेत्, न, तेषामपि प्रत्येकं तत्प्रसङ्गस्य तदवस्थत्वात्।
एवमेकस्य जगति वस्तुतत्त्वस्याऽलाभे साध्वी क्षणभङ्गसाधन-
परिशुद्धिः।
अस्तु तर्हि कश्चिद्दोष एवानयोरिति चेत्, स पुनः कस्मिन्
साध्ये ? किं सामर्थ्यांसामर्थ्ययोः ? किं वा तद्विरुद्धयोः ? किं वा
तद्विरुद्धधर्माध्यासेन भेदे ? आहोस्वित् शक्त्यशक्त्योर्विरोधे ?
साधनभूत सत्त्व-हेतुरूप शस्त्रका भी परित्याग कर देना पड़ेगा। ऐसी
दशामें बाह्यस्थिरत्ववादरूप युद्धस्थलीमे भी तुम्हें क्या भय है ?
अर्थात् क्षणिकत्वसिद्धिके लिये उठाये सत्त्वहेतुरूप शस्त्र गिराकर हार
मान ही गये तो स्थिरत्व ही मान लो, उससे बचनेके लिये योगाचार
मतका स्वीकार क्यों कर रहे हो ?
(शङ्का) जिन जिन भिन्न देशोंमे जितनी अर्थक्रियायें (अंकुरादि
कार्य) होती हैं, बीजरूपकारणके भी उतने भेद माननेमें क्या
विरोध है !
(उत्तर) ऐसा नहीं कह सकते। क्योंकि कारणके उतने भेदोंमे
भी प्रत्येकके लिये उक्त प्रसङ्ग पुनः वैसे ही दिया जा सकता
है। अर्थात् वह प्रत्येक बीज देशान्तरमें भी अंकुरसमर्थ हो तो
देशाद्वैतकी आपत्ति हो जायगी। और अंकुरसमर्थ न हो तो स्वदेशमे
सामर्थ्य और अन्यदेशमे असामर्थ्यरूप विरुद्धधर्मोंका संसर्ग होनेसे
वह प्रत्येक भी भिन्न हो जायगा। इस प्रकार जगत् मे एक वस्तु कोई
रह ही नहीं जायगी। ऐसी दशामे क्षणिकत्व सिद्ध करनेवाले आपके
हेतुओंकी अच्छी विशुद्धता (निर्दोषता) है। अर्थात् जब एक कोई
है नहीं तो किसे पक्ष मानकर क्षणिकत्व सिद्ध करोगे।
यदि पूर्वोक्त देशगर्भित प्रसङ्ग और विपर्य्ययमे किसी दोषको मानो,
तो बताओ, क्या सिद्ध करनेमे वह दोष होगा। क्या, सामर्थ्य और
असामर्थ्य सिद्ध करने में ? या सामर्थ्य और असामर्थ्यरूप विरुद्ध
४८ आत्म. तत्त्व. - १ क
नाद्यः, सर्वत्र सामर्थ्ये हि प्रसह्यकरणात्, सर्वत्राशक्तौ
क्वचिदप्यकरणात् ।
सर्वदेशसमानस्वभावत्वेऽप्यस्य ‘स्वोपादानदेश एव तत्कार्यं
करोतीति, अयमस्य स्वभावः स्वकारणादायातो न नियोग-
पर्यनुयोगानर्हतीति चेत् , तर्हि सर्वकालसमानस्वभावत्वेऽपि तत्त-
त्सहकारिकाल एव^१ करोतीत्ययमस्य स्वभावः स्वकारणादायात
इति किन्न रोचयेः ?
न द्वितीयः, विरुद्धधर्माध्यासेनाप्यभेदे भेदव्यवहारस्य
धर्मों के आरोपसे बीजव्यक्तिमें भेद सिद्ध करने मे ? अथवा करण और
अकरणका विरोध सिद्ध करने मे ?
इनमे प्रथमपक्ष ठीक नहीं है। क्योंकि क्षेत्रस्थ बीजम क्षेत्रमे
अंकुरके प्रति सामर्थ्य और बगारमे अंकुरके प्रति असामर्थ्य ये दा न
माने जाँय तो वह बीज सर्वत्र अंकुर समर्थ ही होगा अथवा सर्वत्र अस-
मर्थ ही होगा। ऐसी दशामे सर्वत्र सामर्थ्य होनेमे उसे बगारमे भी
अंकुर करना बलात् प्राप्त हो जायगा। एवं सर्वत्र असामर्थ्य होनेम
कहीं भी (क्षेत्रमे भो) अंकुर न करना प्रसक्त हो जायगा।
(शङ्का) सब जगह बीजके एक ही स्वभावका होनेपर भी अपने
कार्यके लिये नियत एकदेशमें ही यह कार्यको करता है, इस प्रकार का
बीजका यह स्वभाव अपने कारणसे प्राप्त हुआ है। अत स्वभावके लिये
कोई विधि या निषेध नहीं दिया जा सक्ता है।
(उत्तर) तो उसी प्रकार “सब कालमें अर्थात् खेतमे और बगारमें
भी रहनेकी दशामें बीजके एक स्वभावका होने पर भी उन उन सहका-
रियोंके प्राप्तिकालमें ही यह अङ्कुररूप कार्य करता है। इस प्रकारका
यह बीजका स्वभाव ही है, जो अपने कारणसे इसे प्राप्त है यह बात
क्यों नहीं पसंद करते हो ?
द्वितीय पक्ष भी ठीक नहीं है। क्योंकि विरुद्ध धर्मोका संसर्ग होने
१. लाभ एव — १ पु० पा०
निर्निमित्तकत्वप्रसङ्गात् । अनैकान्तिकश्च हेतुः कालतोऽपि न
भेदं साधयेत् ॥
न तृतीयः, विरोधलक्षणयोगे बाधकसहस्रेणापि विरोध-
स्यापनेतुमशक्यत्वात्, अयोगे वा तदेव चिन्त्यम् । यद्विधाने यस्य
निषेधो यन्निषेधे वा यस्य विधानं तयोरेकत्र धर्मिणि परस्पर-
परिहारस्थिततया विरोधः१, सचेह नास्ति । तद्देशकार्यकारित्वं हि
तद्देशाकार्यकारित्वेन विरुद्धं तद्विधौ तस्य नियमेन निषेधात्, न
पुनर्देशान्तरे तत्कार्याकारित्वेन, तस्यानिषेधात् । न ह्यन्यत्र तद्-
करणमतत्करणं वा तत्र तत्करणस्याभावोऽपि तु तत्र तदकरण-
मिति चेत्---
पर भी यदि अभेद मानो तो विश्वमे भेदव्यवहारका कोई विषय ही नहीं
रह जायगा। साथ ही दैशिक भेदस्थलमे ही व्यभिचारी होनेसे
विरुद्धधर्माध्यासरूप हेतु कालिक भेदको भी नहीं सिद्ध कर सकेगा।
एवं, तीसरा पक्ष भी ठीक नहीं है। क्योंकि विरोधलक्षणका योग
रहनेपर हजारों बाधक भी उस विरोधको नहीं हटा सकते। यदि
विरोधलक्षणका यहाँ अयोग है, तब यही तो विचारणीय है कि
जिसके विधानमे जिसका निषेध हो और जिसके निषेधमे जिसका
विधान हो, उन दोनोंमें एक जगह एक दूसरेको छोड़कर रहनेके कारण
ही विरोध होता है, और वैसा यहाँ नहीं है। क्योंकि उस देशमे कार्य
करनेको उसी देशमे कार्य न करनेके साथ विरोध है। कारण, उस
देशमे कार्यकारित्वके विधानमें उस देशमें कार्याकारित्वका नियमतः
निषेध होता है। न कि देशान्तरमे उस कार्यको न करनेके साथ विरोध
है। कारण, वहाँ देशान्तरमें कार्यकारित्वका निषेध नहीं होता है।
अर्थात् उस देशमे कार्यकारी देशान्तरमे कार्यकारी भी हो सकता है,
इसमें विरोध नहीं है। क्योंकि उससे भिन्न जगहमे उस कार्यको
न करना या उससे भिन्न कार्यका करना उस जगह उस कार्यको
१. परस्परपरीहारावस्थितयोर्विरोध — १ पु० पा०
४
५० आत्मतत्त्वाववेके
हन्तैवम्भूतविरोधलक्षणव्यावृत्तिर्भिन्नकालशक्त्यशक्तयोरपीत्यु-
क्तप्रायं, तत्प्रतिसन्दधीथाः। तस्मात् प्रसङ्गतद्विपर्ययस्थितावपि
असिद्धो विरुद्धधर्माध्यासः।
ननु यदेकदा यत् करोति तद्यावत्सत्त्वं तत्करोत्येव यथा
कश्चिच्छब्दः१ शब्दान्तरमिति प्रसङ्गोऽस्तु। विपर्ययस्तु यदेकदा
यन्न करोति तत् सर्वदैव तन्न करोति यथा शिलाशकलमङ्कुरम्।
न करोति चैकदा कुशलस्थं बीजमङ्कुरमिति चेत्—
तदेतज्जात्यभिप्रायेण वा स्यात् व्यक्त्यभिप्रायेण वा स्यात्।
करनेका विरोधी नहीं है किन्तु उसी जगह उस कार्यको न करना ही
विरोधी है।
तब तो हन्त ! ऐसे विरोधलक्षणका अभाव भिन्नकालमें करण और
अकरणमे भी है। यह पहले ही कह दिया गया है, उसे स्मरण करो।
अर्थात् भिन्नकालमे करण अकरणमे कोई विरोध नहीं है।
क्षणभङ्गवादः ५१
प्रथमे द्वयमपि अनैकान्तिकम्, अनियमदर्शनात् । द्वितीये द्वय-
मप्यन्यथासिद्धम्, एकान्तासामर्थ्यप्रयुक्तत्वादत्यन्ताकरणस्य ।
सामर्थ्ये सति सहकारिसन्निधिप्रयुक्तत्वात् करणनियमस्य ।
एनेन यद्यत्करोति तत्तदुत्पन्नमात्रं यथा कर्म विभागम् । यदुत्प-
न्नमात्रं यन्न करोति तन्न कदाचिदपि यथा शिलाशकलमङ्कुरमिति
निरस्तम् । अत्रापि पूर्ववदनैकान्तान्यथासिद्धी दोषा१विति ।
नापि तृतीयः, कृतकत्त्वानित्यत्वादेरपि२ परस्पराभाववत्त्वामा-
त्रेणैव विरोधप्रसङ्गादिति ।
और विपर्यय दोनोंमें व्यभिचार है । क्योंकि एक ही बीज जातिमे
करना और न करना दोनों ही के देखे जानेसे केवल करने या केवल
न करने का नियम नहीं है ।
जो व्यक्ति एक बार जिसे नहीं करता है वह कभी भी उसे नहीं
करता—इस द्वितीय अभिप्रायमे प्रसङ्ग और विपर्यय दोनों ही अन्यथा-
सिद्ध हैं । क्योंकि एकबार अङ्कुर न करनेवाले प्रस्तरखण्डमे सदा
अङ्कुर न करना उसको अङ्कुरके प्रति स्वाभाविक अयोग्यताके कारण
है । तथा अङ्कुरके प्रति स्वाभाविक योग्यतावाले बीजमें तो कभी अङ्कुरका
करना सहकारियोंकी सन्निधिके कारण और कभी अङ्कुर न करना सह-
कारियोंकी असन्निधिके कारण है ।
इससे—जो जिसे करता है वह उत्पन्न होते ही उसे करता है, जैसे
कर्म ( क्रिया ) उत्पन्न होते ही विभागको । एव जो उत्पन्न होते ही जिसे
नहीं करता वह कभी भी उसे नहीं करता, जैसे शिलाखण्ड अङ्कुरको—
इस प्रकारके प्रसङ्ग और विपर्यय भी खण्डित हो गये । क्योंकि यहाँ भी
पूर्वके समान जातिके अभिप्रायमे व्यभिचार और व्यक्तिके अभिप्रायमें
अन्यथासिद्धिदोष हो जायेंगे ।
“दण्डित्व और कुण्डलित्त्वके समान एक जगह रहते हुए भी
१. अन्यथासिद्धदोषो—२ पु० पा०
२. कृतकत्वानित्यत्वयोरपि—१ पु० पा०
१२ आत्मतत्त्वविवेक
अस्तु तर्हि तस्यैव तेनैव सहकारिणा संबन्धोऽसंबन्धश्चेति
विरोधः, न, विकल्पानुपपत्तेः । तथाहि संबन्धिनः संबन्ध्यन्तरे स्वा-
भावस्वाभाव्यं वा विरुध्येत ? अभावप्रतियोगित्वं वा ? तदैवेति
सहितं वा ? तत्रैवेति सहितं वा ? उभयासहितं वा ? तथैवेति
सहितं वेति ?
न प्रथमः, अनभ्युपगमात् । न द्वितीयः, सत्कार्यप्रतिषेधात् १।
न तृतीयः, प्राक्प्रध्वंसाभावयोर्विद्यमानकालत्वानभ्युपगमात् ।
परस्पर भिन्न होना ही करण और अकरणका विरोध है" यह पूर्वोक्त
तृतीयपक्ष भी ठीक नहीं है । क्योंकि इस प्रकारका विरोध माननेमे
परस्परमे भिन्न होनेमात्रसे कृतकत्व और अनित्यत्वमे भी विरोधका
प्रसङ्ग हो जायगा ।
(शङ्का) तब उसी (बीज) का उसी सहकारीके साथ कभी सम्बन्ध-
का होना और कभी न होना ही विरोध होवे ।
(उत्तर) यह नहीं कह सकते हो, क्योंकि अग्रिम विकल्पोंमे कोई
भी विकल्प नहीं बन सकता है ।
जैसे, क्या दूसरे सम्बन्धीको एक सम्बन्धीका अभावरूप होना
विरुद्ध होगा ? अर्थात् एक सहकारीका दूसरा सहकारी अभावस्वरूप
ही है और भाव और अभावका सम्बन्ध कभी हो नहीं सकता है, यही
विरोध है ? अथवा भावरूप एक सहकारीका दूसरे सहकारीमे
अभावप्रतियोगित्वरूप असमवधान विरुद्ध होगा ? अथवा जिस क्षणमे
अपना समवधान है उसी क्षणमे उसका असमवधान विरुद्ध होगा ?
अथवा जिस जगह समवधान है वहीं असमवधानका होना विरुद्ध
होगा ? अथवा उसी क्षण और उसी देशमें उसका समवधान और
असमवधानका होना विरुद्ध होगा ? अथवा जिस रूपसे समवधान हो
उसी रूपसे असमवधानका होना विरुद्ध होगा ?
इनमे प्रथमपक्ष ठीक नहीं है, क्योंकि एक सम्बन्धीका अभावरूप
दूसरे सम्बन्धीको हम नहीं मानते हैं । दूसरा भी ठीक नहीं है,
१. प्रतिषेधात्—२ पु० पा०
न चतुर्थः, स हि न तावत् स्थितियौगपद्यनियमेन, संबन्धि-
नोरतदसिद्धेः । इत एव तत्सिद्धावितरेतराश्रयत्वं, नियमसिद्धौ
हि विरोधसिद्धिः तत्सिद्धौ च भेदे सति नियमसिद्धिरिति ।
न चान्यतस्तत्सिद्धिरस्तदभावात् अनियतोपसर्पणापसर्पणका-
रणप्रयुक्तत्वाच्च संबन्धासंबन्धयोः । नापि विनाशस्य अहेतुकत्वात्
अयं विरोधोऽर्थात् सिद्ध्यति, तस्याप्यसिद्धेः । ध्रुवभावित्वे तु
पश्यामः । नापि पञ्चमः, न हि तदैव तत्रैव स एव सहकार्यस्ति
नास्ति चेति अभ्युपगच्छामः ।
क्योंकि सत्कार्यवादका तुम्हारे यहाँ निषेध है । अर्थात् सत्कार्यवादमें
ही भावका अभाव नहीं होता है । तीसरा भी नहीं हो सकता है,
क्योंकि केवल प्रागभाव और प्रध्वंसाभाव ही भावके कालमे नहीं माना
जाता है । अत्यन्ताभाव तो देशभेदसे भावकाल मे भी रहता ही है ।
चतुर्थ प्रकारका विरोध भी ठीक नहीं है, क्योंकि उक्त प्रकारका
विरोध तब सिद्ध होता जब कि—सम्बन्धियोंमें एकके सत्ताकालमें
बिना किसी व्यवधानके दूसरेकी अवश्य सत्ता है—ऐसा नियम होता ।
किन्तु यह नियम ही असिद्ध है । यदि ऐसा मानो कि इस विरोधसे ही
यह नियम सिद्ध हो जायगा, तो यहाँ अन्योन्याश्रय दोष आ जायगा ।
क्योकि नियमकी सिद्धि होनेपर विरोधकी सिद्धि होगी और विरोधके
सिद्ध होनेपर धर्मीमे भेद सिद्ध होकर सभी सहकारियों (सन्वन्धियों)
के एक साथ रहनेके नियमकी सिद्धि होगी ।
किसी दूसरे प्रमाणसे भी उक्त नियमकी सिद्धि नहीं हो सकती,
क्योंकि वैसा कोई प्रमाण नहीं है । एवं सहकारियों का परस्पर उप-
सर्पण और अपसर्पण अनियत है और इसी कारण उनमें सम्बन्ध और
असम्बन्ध दोनों ही होते हैं ।
यह भी नहीं हो सकता कि—किसी वस्तुके विनाशमें हेतुकी
अपेक्षा नहीं होनेसे सभी वस्तु क्षणिक होगी, अतः उसमे सम्बन्ध और
असम्बन्धका विरोध स्वतः सिद्ध हो जायगा—क्योंकि बिना हेतुका
५४ आत्मतत्त्वविवेक
ननु समवधानं नाम सहकारिणा धर्मः संयोगो भवद्भिरिष्यते,
स च तेभ्यो व्यतिरिक्तोऽव्याप्यवृत्तिश्चेत्यपि। तथा च स एव
तदैव तत्रैवास्ति नास्ति चेति। अनतिरेके स्थिरवादिनो व्यस्ता-
न्यपि बीजवारिधरणिधामानि तान्येवेति तेभ्योऽपि कार्योत्पत्ति-
प्रसङ्गः। व्याप्यवृत्तित्वे च सर्वत्र रक्तादिदिभ्रमः शब्दादिकार्यो-
त्पत्तिप्रसङ्गश्च। तस्मादसंयुक्तेभ्योऽय एव संयुक्तस्वभावाः पर-
माणवो जाता इत्येव ज्यायः।
विनाश भी असिद्ध है। यदि कहो कि वस्तुओंका विनाश ध्रुव है
इसलिये विनाशमे किसी हेतुकी अपेक्षा नहीं है—तो इसके सम्बन्ध
मे आगे कहेंगे।
एव पाचव प्रकारका विरोध भी नहीं हो सकता है। क्योंकि—
उसी कालमे उसी स्थानमें वही सहकारी है भी और नहीं भी है-ऐसा
हम नहीं मानते हैं।
(शङ्का) समवधानको भी आप सहकारियोंका धर्म और संयोग
रूप मानते हैं और यह भी मानते हैं कि वह समवधान उन
सहकारियोंसे अतिरिक्त और अव्याप्यवृत्ति (एकदेशी) भी है। तब
वही समवधान (संयोग) उसी समय यहीं पर है भी और
नहीं भी है, इस प्रकार विरोध आ जाता है। यदि वह
समवधान सहकारियोंसे अतिरिक्त न हो तो चूँकि स्थिरवादीके मतसे
छिटफुट रहनेवाले भी बीज, पानी, पृथ्वी और प्रकाश वे ही हैं,
इसलिये छिटफुट रहनेकी स्थितिमें भी उनसे अङ्कुररूप कार्यकी
उत्पत्ति होनी चाहिये। यदि संयोगको एकदेशी न मानकर व्याप्यवृत्ति
मानें तो एक भागमे रङ्गका संयोग होनेपर सर्वांशमे लालिमाकी
प्रतीति होनी चाहिये और आकाशके एक भागमें नगाडके संयोगसे
सम्पूर्ण आकाशम शब्दकी उत्पत्ति होनी चाहिये। इसलिये असंयुक्त
परमाणुओंसे दूसरे ही संयुक्त स्वभाववाले परमाणु उत्पन्न होते हैं,
यही मानना समुचित है। अर्थात् परमाणुपुञ्जसे या सहकारिसमूह-
से अतिरिक्त संयोग नहीं है। इस प्रकार क्षणभङ्गवाद सिद्ध हो
जाता है।
क्षणभङ्गवादः ५५
नैतदेवम्, क्षणिकपरमाणावप्यस्य विरोधस्य दुर्वारत्वात् ।
तथाहि पूर्वदिगवस्थितः परमाणुर्यथाऽपरदिगवस्थितेन परमाणु-
नाऽपरदिगवच्छेदेनावृतरूप उत्पन्नः, तथैव किं पूर्वदिगवच्छे-
देनापि न वा ? उभयथा वा ? आद्ये उभयतोऽप्यनुपलब्धिप्रसङ्गः ।
द्वितीये तु उभयतोऽप्युपलम्भापत्तिः । तृतीये पुनः स एव दुरात्मा
विरोधः, स एव तेनैव तदैवावृतोऽनावृतश्चेति ।
प्रकारभेदमुपादायाविरोध इति चेत्, कः पुनरसौ¹ दिगन्तरा-
वच्छेदः ? यदि हि यदिगवच्छेदेनैव संयुक्तस्तदिगवच्छेदेनैवासंयु-
( उत्तर ) ऐसा पूर्वपक्ष ठीक नहीं है । कारण, क्षणिक परमाणुमें
भी इस प्रकारका विरोध नहीं रोका जा सकता है । क्योंकि, पूर्व
दिशामें स्थित परमाणु अपर दिशामे स्थित परमाणुसे जैसे अपर भागकी
ओर आवृत ( ढँका ) होकर पैदा होता है, वैसे ही क्या वह पूर्वभागकी
ओर भी आवृत ही होता है ? या पूर्वभागके समान अपरभागकी ओर
भी अनावृत ( बिना ढँका ) उत्पन्न होता है ? अथवा एक भागकी ओर
अनावृत और दूसरे भागकी ओर आवृत दोनों ही प्रकारका होता है ?
यहाँ प्रथम पक्षमें उसकी दोनों ही ओर अनुपलब्धि होनी चाहिये ।
द्वितीय पक्षमें दोनों ही ओरसे उपलब्धि ( प्रत्यक्ष ) होनी चाहिये ।
तृतीय पक्षमें तो वही दुरात्मा विरोध तुम्हारे यहां भी उपस्थित हो जाता
है कि 'वही उसीसे उसी कालमें आवृत भी है और अनावृत भी' ।
यदि कहो कि—विशेषणभेदको लेकर यहाँ विरोधका निवारण हो
जायगा—तो वह कौन सा विशेषणभेद है ?
यदि कहो कि—भिन्न-भिन्न दिशाका योग ही विशेषणभेद है,
क्योंकि यदि जिस दिशाकी ओर संयुक्त है उसी दिशाकी ओर असंयुक्त
भी हो, तब विरोध हो । यहां तो ऐसा है नहीं—तो अहो ! संयोग
और संयोगीमें परस्पर भेद मानने वाले मेरे पक्षमें भी यदि यह
सिद्धान्त लागू हो तब दोष कैसा ?
१. कश्च पुनरसौ-इति शङ्करमिश्रसम्मतः पाठः ।
५६ आत्मतत्त्वविवेके
क्तोऽपि, ततो विरोधः स्यात्, इह तु नैवमिति चेत्, हन्त ! संयोग-
संयोगिनोर्भेदपक्षेऽपि यद्यय मसिद्धान्तवृत्तान्तः स्यात् कीदृशो
दोष इति ? एतेन व्यतिरेकपक्षोऽपि निरस्तः ।
अधिकश्च तत्राश्रयहेतुदृष्टान्तसिद्धौ प्रमाणाभावः, अवस्तुनि
प्रमाणप्रवृत्तेः प्रमाणप्रवृत्तावलीकत्वानुपपत्तेः ।
एव तर्ह्यव्यवहारे स्ववचनविरोध स्यादिति चेत्, तत् किं
स्ववचनविरोधेन तेषु प्रमाणमुपदर्शितं भवति ? व्यवहारनिषेध
व्यवहारो वा खण्डित स्यात् ? अप्रामाणिकोऽय व्यवहारोऽव-
श्याभ्युपगन्तव्य इति वा भवेत् ?
इस प्रकार 'जो सत् है वह क्षणिक है' इस अन्वयव्याप्तिके खण्डन-
से 'जो क्षणिक नहीं है वह सत् भी नहीं है, जैसे खरहेकी सींग'
यह व्यतिरेक व्याप्ति भी खण्डित हो गयी ।
बल्कि अन्वयव्याप्तिकी अपेक्षा व्यतिरेकव्याप्तिपक्षमे पक्ष, हेतु
और दृष्टान्तकी सिद्धिमें कोई प्रमाण नहीं हे यह अधिक दोष है।
क्योंकि जो अवस्तु ( असत् ) है, उसमे किसी प्रमाणकी प्रवृत्ति नहीं हो
सकती है और जिसमे प्रमाणोंकी प्रवृत्ति होगी, वह असत् नहीं होगा।
अर्थात् स्थिरभावरूप पक्ष तुम्हारे मतमे अप्रामाणिक है। अक्षणिकत्व
हेतुको तुम सत्में मानते नहीं और असत् अप्रामाणिक ही है। इस
प्रकार हेतु भी अप्रसिद्ध है। साथ ही शशशृङ्गरूप दृष्टान्त भी
अप्रसिद्ध ही है।
( शङ्का ) यदि अप्रामाणिकमे व्यवहार न हो तो सिद्धान्तीको
स्ववचनका विरोध हो जायगा । अर्थात् 'असत्मे अनुमानादिका व्यवहार
^ हो सकता यह कहना भी तो असत्में व्यवहार ही है ।
( उत्तर ) तो क्या मेरे स्ववचनविरोधसे उन असत् पक्षादिकोंमें
प्रामाणिकता आ जाती है ? अथवा व्यवहारके निषेधका व्यवहार
खण्डित हो जाता है ? अथवा-अप्रामाणिक भी यह अनुमान-व्यवहार
अवश्य मानना चाहिये-यह सिद्ध होता है ?
क्षणभङ्गवादः ५७
न तावत् प्रथमः, नहि विरोधसहस्रेणापि स्थिरे तस्य
क्रमादिविरहे वा प्रत्यक्षमनुमानं वा दर्शयितुं शक्यम्, तथात्वे वा
कृतं भौतकलहेन ।
द्वितीय¹स्त्विष्यत एव प्रामाणिकैः । अवचनमेव तर्हि प्राप्तम्
किं कुर्मो यत्र वचनं सर्वथैवानुपपन्नं तत्रावचनमेव श्रेयः । त्वमपि
परिभावय तावन्निष्प्रामाणिकेऽर्थे मूकवावदूकयोः कतरः श्रेयान्² ।
एवं विदुषापि भवता न मूकीभूय स्थितम्, अपि तु व्यध-
इनमे प्रथम तो हो नहीं सकता है। क्योंकि हजारों विरोधके रहने
पर भी तुम स्थिरभावरूप पक्षमे अथवा उसमें असत्त्वको सिद्ध करने-
वाले क्रमयौगपद्याभावरूप हेतुमे अथवा शशशृङ्गरूप दृष्टान्तमे प्रत्यक्ष
या अनुमान प्रमाण नहीं दिखा सकते हो। यदि दिखा सको तो
भूताविष्टोंकी तरह इस निरर्थक कलहकी क्या आवश्यकता है ?
द्वितीय पक्ष तो प्रामाणिकोंको इष्ट ही है। अर्थात् शशशृङ्गादि
अलीक पदार्थोंमे विधिव्यवहारके समान ही निषेधका भी व्यवहार
हम नहीं ही मानते हैं। "शशशृङ्ग नास्ति" यह जो निषेधव्यवहार
होता है, उसका तो अर्थ यह है कि शशमे शृङ्ग नहीं है। शश भी
सत् है और शृङ्ग भी कहीं सत् है। इसलिये शशमें शृङ्ग नहीं है, ऐसा
व्यवहार होनेमें कोई बाधा नहीं है।
यदि यह कहो कि—तब हमे अलीक पदार्थोंके सम्बन्धमे कुछ नहीं
बोलना चाहिये अर्थात् मौन धारण किये रहना चाहिये—तो क्या करें,
जहा बोलना सर्वथा ही असंगत है, वहाँ न बोलना ही अच्छा है।
स्वय भी तो विचारो कि अप्रामाणिक अर्थके बारेमे मूक रह जानेवाले
और अधिक बोलनेवालेमे कौन अच्छा है ?
यदि कहो कि—ऐसा जानते हुए भी आपसे (मुझसे) मूक होकर
नहीं रहा गया, प्रत्युत असत्मे भी व्यवहारका प्रतिषेधरूप व्यवहार कर
१. द्वितीय स्त्विष्यत—इति पाठ क्वचित् ।
२ कतरः प्रामाणिक—इति १ पु० पाठ
५८ आत्मतत्त्वविवेके
हारः प्रतिषिद्ध एवासतीति चेत्, सत्यम्, यथा अप्रामाणिकः स्व-
वचनविरुद्धोऽर्थो मा प्रसाङ्क्षीदिति मन्यमानेन त्वया अप्रामाणिक
एवासति व्यवहारः स्वीकृतस्तथास्माभिरपि प्रमाणचिन्तायाम-
प्रामाणिको व्यवहारो मा प्रसाङ्क्षीदिति मन्यमानैरप्रामाणिक
एव स्ववचनविरोधः स्वीक्रियते । यदि तूभयत्रापि भवान् समान-
दृष्टिः स्यादस्माभिरपि तदा न किञ्चिदुच्यत इति ।
तृतीये त्वप्रामाणिकश्चाप्यवश्याभ्युपगन्तव्यश्चेति कस्येयमाज्ञेति
भवानेव प्रष्टव्यः । व्यवहारस्य सुदृढनिरूढत्वादिति चेत्, अप्रा-
माणिकश्च सुदृढनिरूढश्चेति व्याघातः । कथंचिदपि व्यवस्थितत्वा-
ही दिया गया—तो यह ठीक है। क्योंकि, जैसे—जो सत् है, वह
क्षणिक है—अपने इस वचनका विरोधी अक्षणिक शशशृङ्गमें भी
सत्त्वरूप अप्रामाणिक अर्थ न प्रसक्त हो जाय, यह मानते हुए तुम
असत् शशशृङ्गमें अप्रामाणिक ही अनुमानव्यवहार स्वीकृत किये हो,
वैसे ही हम भी क्षणिकत्वसिद्धिके लिये प्रमाणकी चिन्तामें शशशृङ्ग-
में व्यतिरेकव्याप्तिग्रहरूप तुम्हारे द्वारा किया गया अप्रामाणिक भी
व्यवहार न प्रसक्त हो जाय, ऐसा मानते हुए अप्रामाणिक भी स्ववचन-
विरोध हम स्वीकार करते हैं ।
यदि आप दोनों ही ओर समानदृष्टि हों, तब हम भी कुछ नहीं
कहते हैं । अर्थात् तुम यदि शशशृङ्गमे व्यतिरेकव्याप्ति दिखाना
छोड़ दो तो हम भी उसके खण्डनका यत्न नहीं करेंगे ।
तृतीयपक्षमें तो—असत्में व्यवहार अप्रामाणिक भी है और उसे
अवश्य मानना भी चाहिये—यह किसकी आज्ञा है ? ऐसा आप ही से
पूछा जा सकता है।
यदि कहो कि—असत्में व्यवहार अबाधितरूपसे अनादि परम्परासे
सिद्ध है, इसलिये अप्रामाणिक होता हुआ भी मानने ही योग्य है—
तो उक्तव्यवहार अप्रामाणिक भी है और अनादिपरम्परासिद्ध भी है—
यह परस्पर व्याहत वचन है ।
क्षणभङ्गवादः ५९
दिति चेत्, अप्रामाणिकत्वेन कथञ्चिदपि व्यवतिष्ठते, प्रामाणिकञ्चेत्
तदेवोच्यतामिति वादे व्यवस्था।
जल्पवितण्डयोस्तु पक्षादिषु प्रमाणप्रश्नमात्रप्रवृत्तस्य न
स्ववचनविरोधः, तत्र प्रमाणेनोत्तरमनिष्टमशक्यं च। अप्रमाणेनैव
तूत्तरे स्ववचनेनैव भङ्गः, मदुक्तेषु पक्षादिषु प्रमाणं नास्तीति स्वय-
मेव स्वीकारात्। अनुत्तरे तु अप्रतिभैवेति।
यदि च व्यवहारस्वीकारे विरोधपरिहारः स्यात्, असौ
स्वीक्रियेतापि, न त्वेवम्, न खलु सकलव्यवहाराभाजनं च तन्नि-
षेधव्यवहारभाजनं चेति वचनं परस्परमविरोधि।
यदि कहो कि—अनुभवसे ही इस प्रकारका व्यवहार व्यवस्थित है—
तो यह अनुभव यदि अप्रामाणिक है तो किसी प्रकार भी उससे व्यवहार
व्यवस्थित नहीं हो सकता है। यदि प्रामाणिक है तो वह प्रमाण ही
बताओ। क्योंकि यही वादनामक कथाका नियम है।
जल्प और वितण्डा नामक कथाओंमें तो तुम्हारे पक्ष हेतु और
दृष्टान्तमें सिर्फ प्रमाण पूछनेमें प्रवृत्त होनेसे मुझे स्ववचनविरोध
नहीं होगा। उस प्रश्नका यदि प्रमाणसे उत्तर दो तो अनिष्ट हो
जायगा। अर्थात् शशशृङ्ग भी प्रामाणिक होने लगेगा। साथ ही
प्रमाणद्वारा शशमें शृङ्गका ग्रहण अशक्य भी है।
यदि अप्रमाणसे ही उत्तर दो, तब तो अपने वचनसे ही तुम्हारी
पराजय होजाती है। क्योंकि “मेरे (तुम्हारे) कहे पक्षादिकोंमें प्रमाण
नहीं है” ऐसा तुमने स्वयं ही स्वीकार कर लिया। यदि मेरे प्रश्नका
कुछ उत्तर ही न दो तो अप्रतिभानामक निग्रहस्थानसे निगृहीत
होते हो।
एवं, यदि व्यवहार स्वीकार करनेपर विरोधका परिहार हो जाता
रहता तो यह स्वीकार भी कर लिया जाता। अर्थात् मूक रहना अच्छा
नहीं बताते। परन्तु ऐसा तो है नहीं। क्योंकि सभी व्यवहारोंका यह
अपात्र भी है और निषेध व्यवहारका पात्र भी है—यह वचन परस्परमें
अविरोधी नहीं है किन्तु विरोधी है।
६० आत्मतत्त्वविवेके
विधिव्यवहारमात्राभिप्रायेणाभाजनत्ववादे कुतो विरोध इति
चेत्, हन्त ! सकलविधिव्यवहाराभाजनत्वेन किञ्चिद् व्यवह्रियते
न वा ? उभयथापि स्ववचनविरोधः, उभयथाप्यवस्तुनैव तेन
भवितव्यम्, वस्तुनः सर्वव्यवहारविरहानुपपत्तेः ।
नेतिपक्षे सकलविधिनिषेधव्यवहारविरहीत्यनेनैव व्यवहारेण
विरोधात् । अव्यवहृतस्य निषेधुमशक्यत्वात् । व्यवह्रियत इति
पक्षेऽपि विषयस्वरूपपर्यालोचनयैव विरोधात्, न हि सर्वव्यवहारा-
विषयश्च व्यवह्रियते चेति ।
यदि चावस्तुनो निषेधव्यवहारगोचरत्वं विधिव्यवहारगोच-
रतापि किं न स्यात् ? प्रमाणाभावस्योभयत्रापि तुल्यत्वाद् इति ।
यदि कहो कि—असत्में सकल व्यवहारका अपात्रत्व मानने वालेके
यहां उसमें निषेधव्यवहार करनेमें भले ही विरोध हो, पर केवल विधि-
व्यवहारका अपात्रत्व माननेवालेके यहां कैसे विरोध होगा ? अर्थात्
शशशृङ्ग आदिमें सत्त्व और क्षणिकत्वका निषेधव्यवहार करनेमे बौद्ध-
को स्ववचन विरोध नहीं होगा । क्योंकि असत्को हम केवल विधिव्य-
वहारका ही अपात्र मानते हैं—तो अहो ! सभी विधि और निषेध व्यव-
हारोंका अपात्ररूपसे किसीको व्यवहृत करते हो या नहीं ? दोनों ही
दशाओंमे तुम्हें भी स्ववचन विरोध हो जाता है । तथा दोनों ही
दशाओंमे वह अवस्तु (असत्) ही होगी, जिसे तुम व्यवहृत करते हो ।
कारण, वस्तुमें (सत्मे) सकल व्यवहारका अभाव नहीं हो सकता है ।
क्योंकि नहीं पक्षमे—सकल विधि-निषेध-व्यवहारका विरही असत्
—यह भी तो एक व्यवहार ही हुआ, जिससे विरोध आ जाता है ।
कारण व्यवहारमें लाये बिना निषेध ही नहीं कर सकते हो । व्यवहृत
करनेके पक्षमें तो विषयस्वरूपकी पर्यालोचना करनेसे ही विरोध झलक
जाता है। क्योंकि यह नहीं हो सकता कि—'सब व्यवहारका अविषय
भी हो और व्यवहृत भी होता हो' ।
एवं यदि अलीक (मिथ्या वन्ध्यासुतादि) में सत्त्व और क्षणिकत्व-
क्षणभङ्गवादः ६१
वन्ध्यासुतस्यावक्तृत्वेऽचेतनत्वादिकमेव प्रमाणं वक्तृत्वे तु न
किञ्चिदिति चेन्न, तत्रापि सुतत्वस्य विद्यमानत्वात् । न हि
वन्ध्यायाः सुतो न सुतः, तथा सति स्ववचनविरोधात् । वचन-
मात्रमेतत् न तु परमार्थतः सुत एवासाविति चेन्न, अचेतनस्याप्येवं-
रूपत्वात् । चेतनादन्यत् स्वभावान्तरमेव ह्यचेतनमित्युच्यते । चैतन्य-
निवृत्तिमात्रमेवेह विवक्षितम् , तच्च सम्भवत्येनेति चेन्न, तत्राप्यसु-
तत्वनिवृत्तिमात्रस्यैव विवक्षितत्वात् ।
के निषेधव्यवहारकी विषयता है तो उसमे विधिव्यवहारकी भी
विषयता क्यों न हो ? कारण, अलीकमे विधि और निषेध दोनों ही
व्यवहारोंके होनेमे प्रमाणाभाव समान रूपसे है ।
यदि कहो कि—बन्ध्यासुतमे वक्तृत्वनिषेधका व्यवहार करनेमे
उसका अचेतन होना ही प्रमाण है, किन्तु उसमे वक्तृत्वका विधिव्यवहार
करनेमें तो कुछ प्रमाण नहीं है—तो यह कहना ठीक नहीं है । क्योंकि
उसके वक्तृत्वमे भी उसका सुत होना ही प्रमाणरूपसे विद्यमान है ।
यह नहीं कह सकते कि बन्ध्याका सुत सुत नहीं है । क्योंकि वैसा
कहनेपर अपने ही वचनका विरोध हो जायगा । अर्थात् बन्ध्यासुत
कहना और उसे सुत न मानना यह स्पष्ट ही स्ववचनविरोध है ।
यदि कहो कि—यह वचनमात्र ही है न कि वह वस्तुत सुत ही
है—तो ऐसा नहीं हो सकता । क्योंकि तब तो उसका अचेतन होना
भी ऐसा ही हो जायगा । अर्थात् बन्ध्यासुतको अचेतन कहना भी
वचनमात्र ही है, न कि वह घटादिके समान वस्तुत अचेतन ही है ।
क्योंकि चेतनसे भिन्न एक दूसरे स्वभावका पदार्थ ही अचेतन कहा
जाता है ।
यदि कहो कि—यहाँ अचेतनपदसे कोई विलक्षण स्वभाववाला
अभिप्रेत नहीं है, किन्तु चैतन्यकी निवृत्तिमात्र ही विवक्षित है और
वह बन्ध्यासुतमे सम्भव ही है—तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि
तब उसमे वक्तृत्व सिद्ध करनेमें भी हेतुवाची सुतपदसे असुतत्वकी
निवृत्तिमात्र ही विवक्षित बताया जा सकता है और वह सम्भव ही है ।
६२ आत्मतत्त्वविवेके
असुतत्वनिवृत्तिमात्रस्य स्वरूपेण कृतिज्ञप्त्योरसामर्थ्ये
समर्थमर्थान्तरमध्यवस्यमन-तर्भाव्य कुतो हेतुत्वमिति चेन्न, अचै-
तन्येऽप्यस्य न्यायस्य समानत्वात् । व्याववृत्तिरूपमपि तदेव गमकं
यदतस्मादेव, यथा शिशपात्वम्, वन्ध्यासुतस्त्वसुतादिव घटादेः
सुतादपि देवदत्तादेर्व्यावर्तते अतो न हेतुरिति चेत्, नन्विदम-
चैतन्यमपि अस्यैवरूपमेन, नहि वन्ध्यासुतश्चेतनादिव देवदत्तादे-
रचैतनादिकाष्ठादेर्न व्यावर्तते ।
वक्तृत्वं वस्त्वेकनियतो धर्मः, स कथमवस्तुसाध्यो विरोधा-
दिति चेत्, स पुनरयं विरोधः कुतः प्रमाणात् सिद्धः ? किं
यदि कहो कि—असुतत्वकी निवृत्तिमात्र तो अलीक होनेके कारण
स्वय किसी क्रियाको और किसी ज्ञानको करानेमें असमर्थ है । इसलिये
समर्थ एव अनुभवमे आनेवाले किसी दूसरे पदार्थका अन्तर्भाव किये
बिना यह हेतु कैसे बन सकता है ? —तो ऐसा नहीं कह सकते ।
क्योंकि तुम्हारे अचैतन्य हेतुमे भी यह न्याय समानरूपसे लागू
हो जायगा ।
यदि कहो कि—व्यावृत्ति (निवृत्ति) रूप होकर भी वही बोधक
होता है, जो विजातीयसे ही व्यावृत्त होता है, न कि सजातीयसे भी ।
जैसे शिंशपात्व अपने विजातीय कटहल आदिसे ही व्यावृत्त होता है,
न कि सीसमसे भी । इसलिए वह अपने वृक्षत्वका बोधक हो सकता
है । किन्तु वन्ध्यासुत तो जैसे असुत अर्थात् विजातीय घट आदि से
व्यावृत्त है, वैसे ही देवदत्त आदि सुतसे भी व्यावृत्त है । अत वह
वक्तृत्वका हेतु नहीं हो सकता है—तो निश्चय ही तुम्हारा यह अचैतन्य
हेतु भी इसके समान ही है । क्योंकि ऐसी बात नहीं है कि वन्ध्यासुत
जैसे चेतन देवदत्तसे व्यावृत्त है, वैसे ही काष्ठ आदि अचेतनसे भी
व्यावृत्त न हो ।
यदि कहो कि—वक्तृत्व केवल वस्तुका ही नियत धर्म है, अत.
यह अवस्तु (मिथ्या) भूत वन्ध्यासुतमें कैसे सिद्ध किया जा सकता
है ? क्योंकि वस्तु और अवस्तु परस्पर विरुद्ध हैं—तो बताओ, यह