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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 102, कुल 530 में से

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पृष्ठ 102

न चतुर्थः, स हि न तावत् स्थितियौगपद्यनियमेन, संबन्धि-
नोरतदसिद्धेः । इत एव तत्सिद्धावितरेतराश्रयत्वं, नियमसिद्धौ
हि विरोधसिद्धिः तत्सिद्धौ च भेदे सति नियमसिद्धिरिति ।
न चान्यतस्तत्सिद्धिरस्तदभावात् अनियतोपसर्पणापसर्पणका-
रणप्रयुक्तत्वाच्च संबन्धासंबन्धयोः । नापि विनाशस्य अहेतुकत्वात्
अयं विरोधोऽर्थात् सिद्ध्यति, तस्याप्यसिद्धेः । ध्रुवभावित्वे तु
पश्यामः । नापि पञ्चमः, न हि तदैव तत्रैव स एव सहकार्यस्ति
नास्ति चेति अभ्युपगच्छामः ।
क्योंकि सत्कार्यवादका तुम्हारे यहाँ निषेध है । अर्थात् सत्कार्यवादमें
ही भावका अभाव नहीं होता है । तीसरा भी नहीं हो सकता है,
क्योंकि केवल प्रागभाव और प्रध्वंसाभाव ही भावके कालमे नहीं माना
जाता है । अत्यन्ताभाव तो देशभेदसे भावकाल मे भी रहता ही है ।
चतुर्थ प्रकारका विरोध भी ठीक नहीं है, क्योंकि उक्त प्रकारका
विरोध तब सिद्ध होता जब कि—सम्बन्धियोंमें एकके सत्ताकालमें
बिना किसी व्यवधानके दूसरेकी अवश्य सत्ता है—ऐसा नियम होता ।
किन्तु यह नियम ही असिद्ध है । यदि ऐसा मानो कि इस विरोधसे ही
यह नियम सिद्ध हो जायगा, तो यहाँ अन्योन्याश्रय दोष आ जायगा ।
क्योकि नियमकी सिद्धि होनेपर विरोधकी सिद्धि होगी और विरोधके
सिद्ध होनेपर धर्मीमे भेद सिद्ध होकर सभी सहकारियों (सन्वन्धियों)
के एक साथ रहनेके नियमकी सिद्धि होगी ।
किसी दूसरे प्रमाणसे भी उक्त नियमकी सिद्धि नहीं हो सकती,
क्योंकि वैसा कोई प्रमाण नहीं है । एवं सहकारियों का परस्पर उप-
सर्पण और अपसर्पण अनियत है और इसी कारण उनमें सम्बन्ध और
असम्बन्ध दोनों ही होते हैं ।
यह भी नहीं हो सकता कि—किसी वस्तुके विनाशमें हेतुकी
अपेक्षा नहीं होनेसे सभी वस्तु क्षणिक होगी, अतः उसमे सम्बन्ध और
असम्बन्धका विरोध स्वतः सिद्ध हो जायगा—क्योंकि बिना हेतुका