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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 100, कुल 530 में से

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पृष्ठ 100

क्षणभङ्गवादः ५१
प्रथमे द्वयमपि अनैकान्तिकम्, अनियमदर्शनात् । द्वितीये द्वय-
मप्यन्यथासिद्धम्, एकान्तासामर्थ्यप्रयुक्तत्वादत्यन्ताकरणस्य ।
सामर्थ्ये सति सहकारिसन्निधिप्रयुक्तत्वात् करणनियमस्य ।
एनेन यद्यत्करोति तत्तदुत्पन्नमात्रं यथा कर्म विभागम् । यदुत्प-
न्नमात्रं यन्न करोति तन्न कदाचिदपि यथा शिलाशकलमङ्कुरमिति
निरस्तम् । अत्रापि पूर्ववदनैकान्तान्यथासिद्धी दोषा१विति ।
नापि तृतीयः, कृतकत्त्वानित्यत्वादेरपि२ परस्पराभाववत्त्वामा-
त्रेणैव विरोधप्रसङ्गादिति ।
और विपर्यय दोनोंमें व्यभिचार है । क्योंकि एक ही बीज जातिमे
करना और न करना दोनों ही के देखे जानेसे केवल करने या केवल
न करने का नियम नहीं है ।
जो व्यक्ति एक बार जिसे नहीं करता है वह कभी भी उसे नहीं
करता—इस द्वितीय अभिप्रायमे प्रसङ्ग और विपर्यय दोनों ही अन्यथा-
सिद्ध हैं । क्योंकि एकबार अङ्कुर न करनेवाले प्रस्तरखण्डमे सदा
अङ्कुर न करना उसको अङ्कुरके प्रति स्वाभाविक अयोग्यताके कारण
है । तथा अङ्कुरके प्रति स्वाभाविक योग्यतावाले बीजमें तो कभी अङ्कुरका
करना सहकारियोंकी सन्निधिके कारण और कभी अङ्कुर न करना सह-
कारियोंकी असन्निधिके कारण है ।
इससे—जो जिसे करता है वह उत्पन्न होते ही उसे करता है, जैसे
कर्म ( क्रिया ) उत्पन्न होते ही विभागको । एव जो उत्पन्न होते ही जिसे
नहीं करता वह कभी भी उसे नहीं करता, जैसे शिलाखण्ड अङ्कुरको—
इस प्रकारके प्रसङ्ग और विपर्यय भी खण्डित हो गये । क्योंकि यहाँ भी
पूर्वके समान जातिके अभिप्रायमे व्यभिचार और व्यक्तिके अभिप्रायमें
अन्यथासिद्धिदोष हो जायेंगे ।
“दण्डित्व और कुण्डलित्त्वके समान एक जगह रहते हुए भी
१. अन्यथासिद्धदोषो—२ पु० पा०
२. कृतकत्वानित्यत्वयोरपि—१ पु० पा०