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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

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पृष्ठ 95

४६ आत्मतत्त्वविवेके
न कश्चिदिति चेत, तर्हि देशाद्वैतं वा कारणभेदो वा
आपद्येत ।
आपद्यतां, तदादाय योगाचारनयनगरं प्रवेक्ष्याम इति, न,
हेतुफलभाववादवैरिरणमनपोद्य तत्र प्रवेष्टुमशक्यत्वात् ।
तदपवादे वा सत्त्वाख्यसाधनशस्त्रसंन्यासिनस्तव बहिर्वाद-
संग्रामभूमावपि कुतो भयम् ?
बीज बखारेमे भी अंकुर उत्पन्न करदे, इस प्रकारका प्रसङ्ग और 'नहीं
करता है इसलिये वह उस समय खेतमे अंकुर-जनन समर्थ होता हुआ
भी बखारमे अङ्कुर जनन समर्थ नहीं है' इस प्रकारका विपर्यय तुम्हारे
प्रति भी दिये जा सकते हैं । अर्थात् क्षणिक भी बीज सामर्थ्यासामर्थ्य-
लक्षण विरुद्ध-धर्मके संसर्गसे भिन्न-भिन्न होने लगेगा ।
यदि कहो, इसमें कोई हानि नहीं है, तो सामर्थ्यपक्षमें सब जगह
समानरूपसे कार्य करनेसे देशाद्वैतकी आपत्ति हो जायगी । तथा
असामर्थ्यपक्षमें एक ही क्षणिकबीजमें सामर्थ्य और असामर्थ्यरूप
विरुद्धधर्मों के संसर्गसे पुनः भेदकी आपत्ति आ जायगी ।
( शङ्का ) देशाद्वैत हो जाय, उसे लेकर हम योगाचारमतरूप नगरमें
प्रवेश कर जायेंगे । अर्थात् योगाचारमतानुसार हम भी बाह्य वस्तु नहीं
मानेंगे । अतः क्षेत्र कुशूल आदि सभी देश विज्ञानरूपसे अभिन्न ही
हैं । इस स्थितिमे देशभेद मानकर मेरे प्रति सामर्थ्यासामर्थ्यका
क्षणिकबीजमें आपादन नहीं हो सकता है ।
( उत्तर ) ऐसा कहना भी ठीक नहीं है । क्योंकि कार्यकारण-
भावरूप वैरीको परास्त किये बिना योगाचारमतरूप नगरमें प्रवेश ही
नहीं कर सकते । अर्थात् योगाचारमतमे सब कुछ विज्ञानरूप होनेसे
कार्यकारणका भेद भी मिथ्या मानना होगा । और यही योगाचारनगरमें
प्रवेशका बाधक होगा ।
यदि योगाचारनगरमें प्रवेश पानेके लिये कार्यकारणभावको भी
छोड़ दो तो "यत् सत् तत् क्षणिकम्" इस अनुमानमें क्षणिकत्वसिद्धिका