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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 108, कुल 530 में से

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पृष्ठ 108

क्षणभङ्गवादः ५९
दिति चेत्, अप्रामाणिकत्वेन कथञ्चिदपि व्यवतिष्ठते, प्रामाणिकञ्चेत्
तदेवोच्यतामिति वादे व्यवस्था।
जल्पवितण्डयोस्तु पक्षादिषु प्रमाणप्रश्नमात्रप्रवृत्तस्य न
स्ववचनविरोधः, तत्र प्रमाणेनोत्तरमनिष्टमशक्यं च। अप्रमाणेनैव
तूत्तरे स्ववचनेनैव भङ्गः, मदुक्तेषु पक्षादिषु प्रमाणं नास्तीति स्वय-
मेव स्वीकारात्। अनुत्तरे तु अप्रतिभैवेति।
यदि च व्यवहारस्वीकारे विरोधपरिहारः स्यात्, असौ
स्वीक्रियेतापि, न त्वेवम्, न खलु सकलव्यवहाराभाजनं च तन्नि-
षेधव्यवहारभाजनं चेति वचनं परस्परमविरोधि।
यदि कहो कि—अनुभवसे ही इस प्रकारका व्यवहार व्यवस्थित है—
तो यह अनुभव यदि अप्रामाणिक है तो किसी प्रकार भी उससे व्यवहार
व्यवस्थित नहीं हो सकता है। यदि प्रामाणिक है तो वह प्रमाण ही
बताओ। क्योंकि यही वादनामक कथाका नियम है।
जल्प और वितण्डा नामक कथाओंमें तो तुम्हारे पक्ष हेतु और
दृष्टान्तमें सिर्फ प्रमाण पूछनेमें प्रवृत्त होनेसे मुझे स्ववचनविरोध
नहीं होगा। उस प्रश्नका यदि प्रमाणसे उत्तर दो तो अनिष्ट हो
जायगा। अर्थात् शशशृङ्ग भी प्रामाणिक होने लगेगा। साथ ही
प्रमाणद्वारा शशमें शृङ्गका ग्रहण अशक्य भी है।
यदि अप्रमाणसे ही उत्तर दो, तब तो अपने वचनसे ही तुम्हारी
पराजय होजाती है। क्योंकि “मेरे (तुम्हारे) कहे पक्षादिकोंमें प्रमाण
नहीं है” ऐसा तुमने स्वयं ही स्वीकार कर लिया। यदि मेरे प्रश्नका
कुछ उत्तर ही न दो तो अप्रतिभानामक निग्रहस्थानसे निगृहीत
होते हो।
एवं, यदि व्यवहार स्वीकार करनेपर विरोधका परिहार हो जाता
रहता तो यह स्वीकार भी कर लिया जाता। अर्थात् मूक रहना अच्छा
नहीं बताते। परन्तु ऐसा तो है नहीं। क्योंकि सभी व्यवहारोंका यह
अपात्र भी है और निषेध व्यवहारका पात्र भी है—यह वचन परस्परमें
अविरोधी नहीं है किन्तु विरोधी है।