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आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

क्षणभङ्गवादः ६३
कर्तृत्वविविक्तस्यावस्तुनो नियमेनोपलम्भात् ? आहोस्विद् वस्तु-
विविक्तस्य वक्तृत्वस्यानुपलम्भादिति ?
न तावदवस्तु केनापि प्रमाणेनोपलम्भगोचरः, तथात्वे वा
नावस्तु । नाप्युत्तरः, समानत्वात् । नहि वक्तृत्वमिव अवक्तृत्व-
मपि वस्तुविविक्तं कस्यचित् प्रमाणस्य विषयः ।
तद्विविक्तविकल्पमात्रं तावदस्तीति चेत्, तत्संसृष्टविकल्प-
नेऽपि को वारयिता ? ननु वक्तृत्वं वचनं प्रति कर्तृत्वं, तत्
कथमवस्तुनि ? तस्य सर्वसामर्थ्यविरहलक्षणत्वादिति चेत्,
विरोध किस प्रमाणसे सिद्ध होता है ? क्या वक्तृत्वसे शून्य ही अवस्तु-
की नियमतः उपलब्धि होनेसे ? अथवा वस्तुविहीन वक्तृत्वकी अनु-
पलब्धि होनेसे ?
इनमे प्रथम पक्ष ठीक नहीं है। क्योंकि अवस्तुकी तो किसी भी
प्रमाणसे उपलब्धि नहीं होती है। यदि उपलब्धि होगी तो वह अवस्तु
नहीं रह जायगी।
दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है। क्योंकि मेरे और आपके साध्यों-
की समान स्थिति है। क्योंकि, जैसे वस्तुविहीन वक्तृत्व अप्रामाणिक
है, वैसे ही वस्तुविहीन अवक्तृत्वमे भी कोई प्रमाण नहीं है।
यदि कहो कि—प्रमाण न होनेपर भी वक्तृत्वसे शून्य अवस्तु
(वन्ध्यासुत) का ज्ञानमात्र तो है—तो वक्तृत्वसे सम्पृक्त अवस्तुके
ज्ञानको भी कौन रोकनेवाला है ?
यदि कहो कि—वक्तृत्वका अर्थ है 'वचनक्रियाका कर्त्ता होना'
और वह कर्त्तापन अवास्तविक वन्ध्यासुतमे कैसे आ सकता है ? क्योंकि
वह हर प्रकारकी सामर्थ्यसे रहित है—तो, उसमे अवक्तृत्व भी कैसे आ
सकता है ? क्योंकि उसका भी अर्थ है 'वचनसे भिन्न कार्यके प्रति कर्त्ता
होना' जो मिथ्या में नहीं हो सकता ।
यदि कहो कि—जिसमें हर प्रकारकी सामर्थ्यका अभाव है, उसमें
बोलनेकी सामर्थ्यका भी अभाव रहने में कोई विरोध नहीं है—तो

६४ आत्मतत्त्वविवेके

अवक्तृत्वमपि कथं तत्र ? तस्य वचनेतरकर्त्तृत्वलक्षणत्वादिति ।
सर्वसामर्थ्यविरहे वचनसामर्थ्यविरहो न विरुद्ध इति चेत्, अथ
सर्वसामर्थ्यविरहो बन्ध्यासुतस्य कुतः प्रमाणात् सिद्धः ? आवस्तु-
त्त्वादेवेति चेत्, नन्वेतदपि कुतः सिद्धम् ? सर्वसामर्थ्यविरहादिति
चेत्, सोऽयमितस्ततः केवलैर्वचनैर्निर्धनाधमर्णिक इव साधून्
भ्रामयन् परस्पराश्रयदोषमपि न पश्यति ।
क्रमयौगपद्यविरहादिति चेन्न, तद्विरहसिद्धावपि प्रमाणानुयो-
गस्यानुवृत्तेः । सुतत्वे च परामृश्यमाणे तदविनाभूतसकलवक्तृत्त्वा-
दिधर्मप्रसक्तौ कुतः क्रमयौगपद्यविरहसाधनस्यावकाशः ? कुतस्तरां
चावस्तुत्वसाधनस्य ? कुतस्तमां चावक्तृत्त्वादिसाधनानाम् ?

बताओ, तूने किस प्रमाणसे जाना कि बन्ध्यासुतमें हर प्रकारकी सामर्थ्य
का अभाव है ?
यदि कहो कि—उसके मिथ्या होनेसे—तो यही कैसे जाना कि
बन्ध्यासुत मिथ्या है। यदि कहो कि—उसमें हर प्रकारकी सामर्थ्यका
अभाव है, अर्थात् वह कुछ भी नहीं कर सकता है, इसलिये जानते हैं
कि वह मिथ्या है—तब तो निर्धन सद्दुकके समान तू भी केवल
बातोंसे ही सज्जनों को इधर उधर भरमाते हो और अन्योन्याश्रय
दोषको भी नहीं देखते ।
यह कहना कि—हर प्रकारकी असामर्थ्यका कारण क्रम और यौग-
पद्यका अभाव है। अर्थात् जो किन्हीं कार्यों के करनेमे सामर्थ्यवान् होता
है, वह या तो क्रमश करता है या युगपत् ( एक साथ ) करता है।
बन्ध्यासुत तो न क्रमसे कुछ करता है और न एक साथ । इसीलिए वह
सर्वसामर्थ्यसे रहित है—ठीक नहीं है। क्योंकि क्रम और यौगपद्यके
अभावकी भी सिद्धिके लिए प्रमाणकी अपेक्षा ज्यों की त्यों है। क्योंकि
जब उसे सुत कहते हो तो सुतोंमे रहनेवाले वक्तृत्व आदि सम्पूर्ण धर्म
उसमें भी होने ही लगेंगे । इस स्थितिमें बन्ध्यासुतमे क्रमयौगपद्या-
भावकी सिद्धि कैसे होगी ? और वह मिथ्या भी कैसे सिद्ध होगा ?

क्षणभङ्गवादः ६५
तस्मात् प्रमाणमेव सीमा व्यवहारनियमस्य तदतिक्रमे त्वनियम
एवेति ।
न ह्यप्रतीते देवदत्तादौ 'स किं गौरः कृष्णो वेति' वैयात्यं
विना प्रश्नः । तत्रापि यद्येकोऽप्रतीतपरामर्शविषय¹ एवोत्तरं
ददाति न गौर इति, अपरोऽपि किं न दद्यान्न कृष्ण इति ।
न चैवं सति काचिदर्थसिद्धिः, प्रमाणाभावविरोधयोरुभयत्रापि
तुल्यत्वादिति ।
नन्वप्रतीतेर्व्यवहाराभाव इति युक्तं, कूर्मरोमादयस्तु प्रतीयन्त
तथा यह भी कैसे सिद्ध होगा कि वन्ध्यासुतमे अवक्तृत्वादि है, अर्थात्
यह वक्ता आदि नहीं हो सकता ।
इसलिये किसी भी व्यवहारका नियामक प्रमाण ही है । उसके
बिना तो कोई नियम ही नहीं रह जायगा । क्योंकि प्रमाणसे देवदत्त
आदिको जाने बिना “क्या वह गोरा या काला है ?” ऐसा प्रश्न
धृष्टताके बिना नहीं हो सकता है । अर्थात् जिस वस्तुको जानते नहीं
उसके गोरा काला होनेका प्रश्न ही नहीं होता है । साथ ही वैसा प्रश्न
होनेपर भी यदि कोई उसके गोरापन कालापनको बिना जाने ही उत्तर
देता है कि वह गोरा नहीं है तो दूसरा भी यह उत्तर क्यों न दे कि वह
काला नहीं है । ऐसी स्थितिमें काला या गोरा किसीका निर्णय नहीं
हो सकता है । क्योंकि प्रमाणाभाव और विरोध दोनों ही उत्तरोंमे
समान हैं ।
यहाँ प्रमाणका अभाव इसलिये है कि दोनोंमे किसीने प्रमाणके
साथ उत्तर नहीं दिया । और विरोध इसलिए है कि प्रमाणके द्वारा
जिस वस्तुको जाना ही नहीं उसका गोरा न होना या काला न होना
कैसे जान सकता है ? और उत्तर भी कैसे दे सकता है ?
( शङ्का ) यह ठीक है कि अज्ञात विषयके सम्बन्धमे किसी प्रकार
का व्यवहार नहीं होता, किन्तु कछुएके रोम या बन्ध्याका पुत्र आदि तो
१. अविदितपरामर्श विषय इति म० ठक्कुरसम्मत पाठ. ।
५

एव, न ह्येते विकल्पाः कञ्चिदर्थभेदमुल्लिखन्त एव उत्पद्यन्ते,
न च प्रमाणास्पदमेव व्यवहारास्पदमिति, तच्चयुक्तम्१ । तथाहि
शशविषाणमिति ज्ञानमन्यथाख्यातिर्वा स्यात् असत्ख्यातिर्वा । न
तावदाद्यस्ते रोचते, तथा सति हि किञ्चिदारोप्यं किञ्चिदारोप-
विषय इति स्यात् । तथा चारोपविषयस्तत्रैवास्ति आरोपणीयस्त्व-
न्यत्रैवेति जितं नैयायिकैः । नापि द्वितीयः, कारणानुपपत्तेः ।
इन्द्रियस्य ज्ञानजनने विषयाधिपत्येनैव२ व्यापारात् । लिङ्गशब्दा-
भासयोरन्यथाख्यातिमात्रजनकत्वात् । अपहस्तितस्वार्थगोश्वापद-

ज्ञात ही हैं । क्योंकि कूर्मरोम या वन्ध्यापुत्र आदि शब्द को सुनकर
जो ज्ञान उत्पन्न होते हैं, वे किसी वस्तु विशेषको विषय किये बिना
नहीं होते हैं । यहाँपर यह आवश्यक नहीं हे कि जो प्रामाणिकरूपसे
ज्ञात होगा, उसीमें कोई व्यवहार होगा । अर्थात् व्यवहारके लिये उसे
किसी भी प्रकारसे ज्ञात होना चाहिये ।
(उत्तर) इस प्रकारका कथन ठीक नहीं है । क्योंकि शश-
शृङ्ग, कूर्मरोग, वन्ध्यापुत्र आदि ज्ञानको अन्यथाख्याति मानते हो
या असत्ख्याति मानते हो । इनमे प्रथम पक्ष तो तुम्हें नहीं पसन्द
है । क्योंकि उस पक्षमें कोई आरोप्य होगा और कोई आरोप का
विषय । अर्थात् वन्ध्यास्त्री कूर्म आदि आरोपके विषय होंगे और उनमें
पुत्र रोम आदिका सम्बन्ध आरोप्य होगा । ऐसी दशामे वन्ध्यास्त्री तो
सामने ही हे और पुत्रका सम्बन्ध भी दूसरी जगह हे ही । इस प्रकार
नैयायिकोंको विजय प्राप्त हो गयी ।
कारण न हो सकनेसे असत्ख्याति ( असत्‌का ज्ञान ) रूप द्वितीय
पक्ष भी संभव नहीं हे । क्योंकि इन्द्रिय द्वारा ज्ञान होनेमें विषय और
इन्द्रियका सन्निकर्षरूप व्यापार आवश्यक हे। हेत्वाभास और
शब्दाभास तो अन्यथाख्याति ही पैदा करते हैं न कि असत्ख्याति ।

१. तन्न युक्तम्—१ पृ० पा०
२. विषयाधिपत्येन—सन्निहितविषयसहकारित्वेनेत्यर्थं इति शिरोमणिः ।

क्षणभङ्गवादः ६७
ख्यातिजनकत्वे शशविषाणादिशब्दात् कूर्मरोमादिविकल्पानामप्यु-
त्पत्तिप्रसङ्गात्, नियामकाभावात् ।
स हि सङ्केतो वा स्यात् ? शब्दस्वाभाव्यं वा ? आद्यस्ता-
वत् सङ्केतविषयाप्रतीतेरेव पराहतः । तत एव१ तत्प्रतीतावितरेतरा-
श्रयत्वम्, पदसङ्केतबलेनैव प्रतीतौ स्वार्थापरित्यागात् । तथा
चानन्विताः पदार्था एवान्विततया परिस्फुरन्तीति विपरीतख्याति-
अर्थात् गलत हेतु और मिथ्यावादीके शब्दसे भी उसी अर्थकी प्रतीति होती
है, जो कहीं सत् है । जिस हेतुका अपने साध्यके साथ और जिस शब्द-
का अपने अर्थके साथ कहीं भी सम्बन्ध न हो और वह असत् अर्थकी
प्रतीति करावे तो शशशृङ्ग आदि शब्दसे कूर्मरोम आदि अर्थका ज्ञान भी
होने लगेगा । क्योंकि ऐसा न होने देनेवाला कोई नियामक नहीं है ।
क्योंकि यह नियमन करने वाला सङ्केत होगा ? अथवा शब्द-
का स्वभाव ? प्रथम पक्षमें 'शशविषाण' इस पदसमूहका सङ्केत
मानो तो असंभव है । क्योंकि सङ्केतका विषय जो अखण्ड शशविषाण
उसकी कहीं प्रतीति ही नहीं है तो उसमें 'शशविषाण' इस पदसमूहका
सङ्केत कैसे हो सकता है ? यदि इसी सङ्केतके बलपे उसकी प्रतीति
मानो तो अन्योन्याश्रय दोष हो जाता है “सङ्केतसे प्रतीति और प्रतीति
होनेपर सङ्केत” ।
यदि कहो कि—शश और विषाण इन प्रत्येक पदोंके सङ्केतबलसे
ही “शशविषाण' इस अखण्ड अर्थकी प्रतीति हो जायगी—तब तो
शशपदका खरहारूप अपना अर्थ और विषाणपदका सींगरुप अपना अर्थ
कहीं सत् ही है न कि असत् । इस प्रकार पृथक् पृथक् लोकमें प्रसिद्ध
खरहा और सींगरुप अर्थ केवल परस्पर मे असम्बद्ध है, और 'शशशृङ्ग'
शब्दसे सम्बद्धरूपमें भासित होते हैं, यह अन्यथाख्याति ही तो हो
रही है न कि असत्ख्याति ।
यदि कहो कि—शश और विषाण पदोंका भी पृथक्-पृथक् अपने-
अपने अर्थोंके साथ भी कोई सम्बन्ध नहीं है, अर्थात् उन पदोंका
१ '०एवेति भ० ठक्कुरसम्मतः पाठः ।

६८ आत्मतत्त्वविवेके

रेणानुवर्त्तते। स्वार्थपरित्यागे तु पुनरप्यनियमः, असामयिकार्थ-
प्रत्यायनात्। शब्दस्वाभाव्यात् तु नियमे व्युत्पन्नवदव्युत्पन्न-
स्यापि तथाविधविकल्पोदयप्रसङ्गादिति।
वासनाविशेषादिति चेत्, अथासदुल्लेखिनः प्रत्ययस्य वासनैव
कारणम् ? उत वासनापि ? न तावदाद्यः, शशविषाणादिप्रत्य-
यानां सदातनत्वप्रसङ्गात्। कदाचित् प्रबोधादिति चेत्, न,
प्रबोधोऽपि सहकार्यन्तरं वा ? अतिशयपरम्परापरिपाको वा ?
आद्ये वासनैवेति पक्षानुपपत्तिः। द्वितीयेऽपि यद्यर्थान्तरप्रत्या-
सत्तेस्तदा पूर्ववत्।


खरहा और सींगरुप अर्थ भी असत् ही है इसप्रकार असत्ख्याति
सिद्ध हो जाती है—तब तो फिर भी किस शब्दसे कौन अर्थ समझा
जाय इसका कोई नियम नहीं रह गया। इस स्थितिमे घटशब्दसे पटका
भी बोध होना चाहिये। यह कहना तो ठीक नहीं है कि—शब्दका
स्वभाव ही ऐसा है कि कोई खास शब्द किसी खास अर्थको ही बताता
है—क्योंकि तब विद्वान्‌के समान मूर्खको भी समान रूपसे शब्दोंसे
अर्थबोध होना चाहिये। कारण शब्दका स्वभाव सबके प्रति समान है।
इस दोषसे बचनेके लिये यदि संस्कारविशेषको कारण मानो,
तो बताओ, असत् अर्थका उल्लेख करनेवाले ज्ञानका कारण केवल
संस्कार ही है ? या संस्कार भी एक कारण है ? इनमें प्रथम पक्ष ठीक
नहीं है, क्योंकि संस्कारके सदा होनेसे शशविषाणादिका ज्ञान भी
सदा होते रहना चाहिये।
यदि कहो कि—संस्कारके कभी कभी उद्बुद्ध होनेसे शशशृङ्ग-
ज्ञान भी कभी कभी होगा—तो ठीक नहीं है। क्योंकि संस्कारका
उद्बोध (जागरण) संस्कारसे भिन्न एक अन्य सहायक है ? या उन्हीं
संस्कारोंकी एक परिपक्व अवस्थामात्र है ? प्रथम पक्षमें वासना
(संस्कार) ही कारण है, यह कथन असङ्गत हो जाता है। द्वितीय
पक्षमें भी संस्कारका वह अवस्था यदि दूसरी वस्तुके संसर्गसे हो तो
"वासना ही कारण है" यह कथन फिर असङ्गत हो जाता है। यदि

क्षणभङ्गवाद ६९

स्वसंततिमात्राधीनत्वे तु बाह्यवादव्याघातः,१ नीलादिबुद्धीनामपि
वासनापरिपाकादेवोत्पादात्२ । वासनापीति पक्षे तु तदन्योऽपि
हेतुः कश्चिद् वक्तव्यः, स च विचार्यमाणः पूर्वन्यायं नाति-
वर्त्तत इति ।
न च शशविषाणादिशब्दानामसदर्थैः सह सम्बन्धावग-
मोऽपि। तथाहि परबुद्धीनामनुल्लेखात् तद्विषयस्याऽप्यनुल्लेख
एव। न चार्थक्रियाविशेषोऽप्यस्ति, यतो विषयविशेषमुन्नीय तत्र
संस्कारोंकी धारासे ही वह अवस्था बन जाती है, तब तो बाह्यवादका
व्याघात हो जायगा। क्योंकि नीलपीतादिज्ञान भी बिना बाह्यवस्तुकी
अपेक्षा किये ही परिपक्वावस्थाप्राप्त संस्कारसे ही उत्पन्न हो जायगा।
अर्थात् नीलपीतादिविकल्पोंके कादाचित्कत्वकी उपपत्तिके लिये ही तुमने
बाह्यनीलादिको स्वीकार किया है। वह कादाचित्कत्व यदि वासना-
मात्रके अधीन उत्पन्न हो जाय तो बाह्य नीलादिका स्वीकार व्यर्थ
हो जायगा।
इन सभी दोषोंसे बचनेके लिए-ज्ञान होनेमे वासना भी कारण
है-ऐसा द्वितीय पक्ष स्वीकार करो तो वासनासे अन्य जो हेतु है,
उसे भी बताना चाहिए। और उसपर विचार किये जानेपर वह
भी पूर्ववत् ही खण्डित हो जाता है। अर्थात् असत्ख्यातिका कारण
इन्द्रिय नहीं हो सकती है, क्योंकि असत् वस्तुसे उसका सन्निकर्ष
नहीं होता और वह सन्निकृष्ट वस्तुको ही बतानेमे समर्थ है। हेत्वा-
भास या शब्दाभाससे तो असत्की ख्याति हो ही नहीं सकती, यह
बता चुके हैं।
एव शशविषाण आदि शब्दोंका असत् अर्थोंके साथ सम्बन्धज्ञान
भी नहीं हो सकता है। क्योंकि दूसरेकी बुद्धिका ज्ञान दूसरेको नहीं
१ नीलादिविकल्पकादाचित्कत्वेन त्वया नीलादीनि बाह्यानि स्वीक्रियन्ते।
तच्च कादाचित्कत्व यदि वासनामात्राधीनमेव तदा गत बाह्यनीलादि
स्वीकारव्यसनेनेति शङ्करमिश्रः ।
२. वासनापरिपाकादेवोत्पादात्-१ पु० पा०

७०
सङ्केतो गृह्यताम् । न च सङ्केतयितुरेव वचनात् तदवगतिः,
तद्विषयाणां सर्वेषां वचनानामप्रतीतविषयत्वेनागृहीतसमयतया
अप्रतिपादकत्वात् ।
न च शशविषाणमुच्चारयतः कश्चिदभिप्रायो वृत्त इति तद्वि-
षयोऽस्य वाच्य इति सुग्रहः समय इति वाच्यम्, न ह्येवमाकारः
होनेसे शशविषाणशब्दका प्रयोग करनेवाला व्यक्ति उस शब्दका
किस अर्थके साथ सम्बन्ध जानकर प्रयोग करता है, इसका ज्ञान श्रोताको
नहीं हो सकता है । एवं शशशृङ्गशब्दके प्रयोगके बाद किसी
वस्तुका लाना या ले जाना भी नहीं दीख पडता, जिससे उस
वस्तुविशेषको जानकर उसमें शशशृङ्गशब्दका संकेत (सम्बन्ध)
जाना जाय ।
यह भी नहीं कह सकते कि—जैसे, 'पिक' शब्दका अर्थ 'कोकिल'
होता है, संकेतकर्त्ताके इस वचनसे हम पिकशब्दके अर्थको जान
जाते हैं, वैसे ही शशशृङ्ग शब्दका अर्थ भी संकेतकर्त्ताके वचनसे ही
जाना जा सकता है—क्योंकि वहाँ कोकिलशब्दके द्वारा कोयलरूप
वस्तुको पहलेसे ही हम जानते हैं और उसीकी सहायतासे पिकशब्दका
भी कोयलअर्थके साथ सम्बन्ध जाने जाते हैं । किन्तु यहाँपर शश-
शृङ्गशब्दका अर्थ जाननेके लिए संकेतकर्त्ता जितने भी शब्दोंका प्रयोग
करेगा, वे सभी शब्द शशशृङ्गशब्दके समान ही श्रोताके लिए
अपरिचित अर्थवाले ही होंगे । इस प्रकार जब स्वयं उन्हीं शब्दोंका
उस असत् अर्थके साथ सम्बन्ध नहीं जाना गया है, तब उनकी
सहायतासे शशशृङ्गशब्दका अर्थ कैसे जाना जा सकता है ? अर्थात्
जब वह अर्थ ही असत् है तो किसी भी कल्पित शब्दसे उस अर्थकी
उपस्थिति श्रोताके मनमे नहीं हो सकती है । कोयल तो सत् वस्तु है
और वह सबको प्रत्यक्ष है ।
यह कहना भी ठीक नहीं है कि—शशविषाणशब्दका उच्चारण
करनेवाला व्यक्ति अवश्य ही किसी अर्थके अभिप्रायसे उच्चारण करता
है, अत वही अर्थ शशविषाणशब्दका वाच्य है, ऐसा संकेतग्रह
आसानी से हो सकता है—क्योंकि सामान्यरूपसे हुए ऐसे सङ्केतग्रहका

समयग्रहः। गां बधानेत्युक्ते अप्रतीतशब्दार्थस्याप्यभिप्रायमात्र-
प्रतीतौ समयग्रहप्रसङ्गात्। न च विशेषान्तरविनाकृतः कल्प-
नामात्त्रविषयोऽस्य वाच्य इति साम्प्रतम्, घटकूर्मरोमादीनामपि
तदर्थत्वप्रसङ्गात्।
न च सर्वे प्रतिपत्तारः स्वस्ववासनयाऽसदर्थशब्दसंबन्धप्रति-
पत्तिभाज इति साम्प्रतम्, परस्परवार्तानभिज्ञतया अपरार्थत्वप्र-
ङ्गात्। न हि स्वयं कृतं समय^२मग्राहयित्वा परो व्यवहारयितुं
शक्यते। न च व्यवहारोपदेशान्तरेण ग्राहयितुमपि। न च गां
बधानेतिवत् शशविषाणपदार्थे व्यवहारः, न चायमसावश्व इति-
शाब्दबोधमें कोई उपयोग नहीं है। अन्यथा 'गा बधान' ऐसा कहनेपर
जिसे विशेषरूपसे 'गा' और बधान' पदका अर्थ नहीं मालूम है उसे
भी केवल यह जानकर कि ये पद अवश्य ही किसी अर्थके अभिप्रायसे
कहे गये हैं, सङ्केतज्ञान होकर शाब्दबोध हो जाना चाहिये।
यह भी समुचित नहीं है कि—शशविषाण आदि शब्दोंका कोई
विशेष अर्थ नहीं होनेपर भी कल्पनामात्रका विषय जो अलीक अर्थ
वही इस शब्दका वाच्यार्थ है—क्योंकि कोई भी काल्पनिक अर्थ यदि
शशविषाण शब्दका अर्थ माना जाय तो काल्पनिक घटरोम^१ और
कूर्मरोम आदि भी शशविषाणशब्दका अर्थ होने लगेगा।
यह भी ठीक नहीं है कि—बोध करनेवाले सभी व्यक्ति अपनी
अपनी वासनासे ही उपस्थित हुए अलीक अर्थोंमें शशविषाण आदि
शब्दोंका सङ्केत जान लेते हैं—क्योंकि अपनी वासनाके आधारपर
उपस्थित अर्थमे हुआ शब्दका सङ्केतग्रह अपने ही तक रह जायगा,
दूसरे को नहीं हो सकता। इसलिये दूसरे व्यक्तिके प्रति शशशृङ्ग
आदि शब्दोंका व्यवहार असम्भव हो जायगा। कारण, स्वयं कल्पित
किसी अर्थमें किसी शब्दके सङ्केतको बिना दूसरे को बताये उसके
१. यद्वा यन्मते घटस्यापि काल्पनिकत्वं तन्मतमाश्रित्योक्तमिति शक्यमित्रः।
२. स्वयं कृतं सङ्केतं—१ पु० पा०

चदुपदेशः । न च यथा गौस्तथा गवय इतिवदुपलक्षणातिदेशः । न
चेह प्रभिन्नकमलोदरे मधूनि मधुकरः पिबतीतिवत् प्रसिद्धपदसामा-
नाधिकरण्यम् ।
तदमूः शशविषाणादिकल्पाः¹ नासत्ख्यातिरूपास्तथात्वे
कारणाभावात् मूकस्वप्नवदाम व्यावहारिकत्व²प्रसङ्गाच्च । तस्मा
दन्यथाख्यातिरूपा एवेति नैतदनुरोधे³नाप्यवस्तुनो निषेधव्यव-
हारगोचरत्वमिति ।
प्रति उस शब्दका व्यवहार नहीं किया जा सकता है। ओर यह भी
नहीं हो सकता कि प्रवृत्तिरूप व्यवहार अथवा शब्दोपदेश के बिना ही
सङ्केतका ग्रह हो जाय। अत शशविषाणशब्दका सङ्केतग्रह नहीं
हो सकता है।
क्योंकि गौमें बाधना आदि व्यवहार जैसे होता है वैसे शशशृङ्ग
पदार्थम कोई व्यवहार नहीं होता। एव “इसे अश्व कहते हैं' इसके
समान “इसे शशशृङ्ग कहते ह' ऐसा शब्दोपदेश भी नहीं होता है।
और न तो 'गो के सदृश गवय होता है' इसके समान किसी वस्तुकी
सदृशता ही शशशृङ्ग मे बतलाई जा सकती है। एव जैसे, प्रभिन्न
कमलोदरे मधूनि मधुकर पिबति' इस वाक्यमे आये मधुकरपदका
सङ्केत वह व्यक्ति आसानीसे जान जाता है, जिसे कमलका खिलना
और उसके द्वारा इसके रसका पान किया जाना आदि पहलेसे विदित
है। अर्थात् प्रसिद्ध पदोंके साहचर्यसे भी अप्रसिद्ध पदका सङ्केतग्रह
हो जाता है। किन्तु शशशृङ्गशब्द तो मधुकरशब्दके समान प्रसिद्ध
पदोंके साथ कहीं व्यवहृत होता हुआ भी नहीं पाया जाता है।
अत शशविषाण कूर्मरोम आदि प्रतीतिया असत्ख्यातिरूप नहीं
हो सकती हैं, क्योंकि वैसा होनेका कोई कारण नहीं है। यदि हो भी
सकें तो भी गूँगेके स्वप्नके समान उनका व्यवहारमें उपयोग नहीं हो
सकता है। इसलिये उक्त प्रतीतिया अन्यथाख्यातिरूप ही हैं। इस
१. कल्पना — इति युक्त पाठ ।
२ अव्यावहारिकत्व इति पाठो युक्तो भाति ।
३ न तदनुरोधेन—२ पु० पा० ।

क्षणभङ्गवादः ७३
भवतु वा असत्ख्यातिस्तथापि न ततो व्यतिरेकः प्रामा-
णिकः । तथाहि कोऽयं व्यतिरेको नाम ? यद्यतो व्यतिरिच्यते
तस्य तत्राभावो वा ? तदभावस्वभावत्वं वा ? तन्न न तावत्
क्रमयौगपद्ययोः शशविषाणे अभावः प्रमाणगोचरः, वृक्षरहितभूभृत्-
कटकवत् क्रमयौगपद्यरहितस्य शशविषाणस्य प्रमाणागोचरत्वात् ।
नापि क्रमयौगपद्याभावरूपत्वं शशविषाणस्य प्रामाणिकं
घटाभाववच्छशविषाणस्य प्रमाणेनानुपलम्भात् । घटाभावोऽपि
प्रकार शशविषाणप्रतीतिके अनुरोधसे भी अवस्तुमें निषेध व्यवहार नहीं
हो सकता है ।
अथवा शशविषाण आदिकी प्रतीति असत्ख्याति ही हो तथापि उस
असद् वस्तुमें क्रमयौगपद्यका या अर्थक्रियाकारित्वरूप सत्ताका व्यतिरेक
( अभाव ) सिद्ध नहीं हो सकता है । कारण, यह व्यतिरेक क्या
वस्तु है, यह प्रश्न उठता है । क्या जो जिससे व्यतिरिक्त ( भिन्न )
है उसका उसमें अभाव व्यतिरेक है ? अर्थात् अधिकरण से भिन्न
और उसमें रहने वाला अभाव व्यतिरेक है । अथवा प्राभाकर मतके
अनुसार उसका अभावरूप दूसरेका होना ही व्यतिरेक है ? अर्थात्
भूतलादि अधिकरणसे अतिरिक्त घटाभाव कोई वस्तु नहीं है, किन्तु
अधिकरणस्वरूप ही है । इन दोनों पक्षोंमें प्रथम पक्षके अनुसार
शशशृङ्गमें क्रमयौगपद्यका अभाव अप्रामाणिक है । क्योंकि जैसे, वृक्ष-
रहित पर्वतकी तराई प्रत्यक्ष प्रमाणसे देखी जाती है, वैसे क्रमयौगपद्यसे
रहित शशशृङ्ग किसी भी प्रमाण से नहीं जाना जाता है ।
दूसरा पक्ष अर्थात् शशविषाणका क्रमयौगपद्याभावरूप होना भी
प्रामाणिक नहीं है । क्योंकि घटाभावके समान शशविषाण किसी
प्रमाणसे उपलब्ध नहीं है । अर्थात् शशविषाण क्रमयौगपद्याभावरूप
तब होता जबकि "शशविषाणे क्रमयौगपद्याभावः" ऐसी प्रतीति किसी
प्रमाणसे होती, किन्तु ऐसा होता नहीं है । घटाभाव तो यदि
अधिकरणस्वभाव भी हो तो भी "भूतले घटाभाव " यहां घटाभावकी
स्वतन्त्ररूपसे प्रतीति होती है ।

७४ आत्मतत्त्वविवेके
न प्रमाणगोचर इति चेत्, न, तस्य तद्विविक्तेतरस्वभावस्यापि
प्रमाणात् एव सिद्धेः१, असिद्धौ वा तत्राप्यव्यवहार एव ।
घटस्तावत् स्वाभावविरहस्वभावः प्रमाणसिद्धः ताद्रूप्येण
कदाचिदप्यनुपलम्भात् । एतावतैव तदभावोऽपि घटविरहस्वभावः
सिद्ध इति चेन्न, घटभावस्य तदभावविरहस्वभावत्वानभ्युपगमात् ।
न चान्यस्य स्वभावे प्रमाणगोचरे तदन्योऽपि सिद्धः स्यादति-
प्रसङ्गात् ।
यदि कहो कि—शशविषाणके अप्रामाणिक होनेसे यदि उसमे
क्रमयौगपद्याभाव या तत्स्वरूपत्व न बन सके तो घटाभाव भी (बौद्धके
यहाँ) प्रामाणिक नहीं है । अर्थात् अप्रामाणिक होनेपर भी भूतलादिमे
जैसे घटाभावादिका व्यवहार होता है, वैसे अप्रामाणिक भी शश-
विषाणमे क्रमयौगपद्याभावका व्यवहार होनेमे कोई अनुपपत्ति नहीं
होगी—तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि घटाभाव भी अपने से
भिन्न जो भूतलादि उससे इतर स्वभावका है, यह प्रमाणसे ही सिद्ध
है । यदि न सिद्ध हो तो उसमे (घटाभावमे) भी व्यवहार नहीं ही
होगा, क्योंकि प्रमाणसिद्ध वस्तुका ही व्यवहार होता है ।
यदि कहो कि—घट घटाभावके अभावरूपसे सिद्ध ही है, क्योंकि
उसकी कभी भी घटाभावरूपमें उपलब्धि नहीं होती है । इतनेसे ही
घटाभाव भी घटविरहरूपसे सिद्ध है । अर्थात् बौद्धमतमे स्वतन्त्र-
रूपसे घटकी प्रमिति न होनेपर भी जैसे उसमें सभी लौकिक व्यवहार
होते हैं, वैसे ही घटाभाव भी यद्यपि स्वतन्त्ररूपसे प्रमाणसिद्ध वस्तु
नहीं है, तथापि उसमे लौकिक व्यवहार हो ही सकता है—तो यह ठीक
नहीं है । क्योंकि भावभूत घट घटाभावका अभावस्वभाववाला है,
ऐसा तुम नहीं मान सकते हो । कारण, तुम्हारे मतमे अभावके अलीक
होनेसे घट भी मिथ्या होने लगेगा । साथ ही यह भी नहीं हो सकता
कि एकके प्रमाणसे सिद्ध होनेपर दूसरी वस्तु भी सिद्ध हो जाय ।
१. प्रतियोगिसद्भावस्यापि अतद्व्यावृत्तिस्वभावस्य प्रमाणसिद्धत्वादिति
दीधितिः ।

क्षणभङ्गवादः ७५

एवम्भूतावेव घटतदभावौ यदेकस्य परिच्छित्तिरपरस्य व्यव-
च्छित्तिरिति चेत्, न, घटवद् घटाभावस्यापि प्रामाणिकत्वानभ्यु-
पगमे स्वभाववादानवकाशात् । प्रमाणसिद्धे हि वस्तुनि स्वभाव-
वादावलम्बनं न तु स्वभाववादावलम्बनेनैव वस्तुसिद्धिरिति¹
भवतामेव तत्र तत्र जयदुन्दुभिः ।
तत् किमिदानीं स्वाभावविरहस्वभावो घटः प्रमाणानैव
सिद्धः ? तव दृष्ट्या एवमेतत्, घटो हि यादृक्तादृक्स्वभावस्तावत्
प्रमाणपथमतीर्णस्तस्य तु यदि परमार्थतोऽभावोऽपि कश्चित् स्यात्,
स्यात् परमार्थतः सोऽपि तद्विरहस्वभाव इति तथैव प्रमाणेनावे-

क्योंकि वैसा होनेपर वृक्ष सिद्ध करनेके लिये प्रवृत्त हुआ प्रमाण घड़ा
भी सिद्ध कर दे । यह अतिप्रसङ्ग हो जायगा ।
(शङ्का) और जगह भले ही न हो, तथापि घट और घटाभावका
तो यही स्वभाव है कि एकके निषेधमे दूसरेकी प्रतीति हो जाती है ।
(उत्तर) ऐसा कहना ठीक नहीं है । क्योंकि घटके समान
घटाभाव तुम्हारे मतसे प्रामाणिक वस्तु नहीं है । अतः उसमे किसी
प्रकारका स्वभाववर्णन नहीं हो सकता है, क्योंकि प्रमाणसिद्ध वस्तुमे
ही स्वभावका वर्णन किया जा सकता है, न कि स्वभाव वर्णन कर देनेसे
ही वस्तुकी सिद्धि हो जायगी । यह आपकी ही घोषणा है ।
(शङ्का) तो क्या, अब घड़ेमे अपने अभावका विरहस्वभावत्व
प्रमाणसे नहीं ही सिद्ध होगा ?
(उत्तर) हां, तुम्हारे दर्शनके अनुसार तो ऐसा ही है । क्योंकि
घड़ा तो परमाणुओंके समूहरूपमे या एक अवयवीके रूपमें प्रमाणसिद्ध
है । किन्तु उसका अभाव भी यदि कोई पारमार्थिक वस्तु हो तो घड़ा
भी वस्तुतः उस अभावका अभावरूप हो । और यह अभावाभावरूपसे
ही प्रमाण द्वारा जाना भी जाय । किन्तु आप तो ऐसा मानते नहीं ।

१. वस्तुव्यवस्थितिरिति—१ पु० पा० ।

७६ आत्मतत्त्वविवेके
दितः स्यात् । न चैतदभ्युपगम्यते भवता । तस्माद् घटवत्
तदभावस्यापि प्रामाणिकत्वेनैवानयोः परस्परविरहलक्षणव्यति-
रेकसिद्धिः, अप्रामाणिकत्वे त्वनयोरपि न तथाभाव इति । शश-
विषाणादिष्वपीयमेव गतिः । ननु काल्पनिकरूपसम्पत्तिरेवास्त्व-
नुमानाङ्गम् , तन्न, तस्याः सर्वत्र सुलभत्वात् ।
ननु पक्षसपक्षविपक्षास्तावद्वस्त्ववस्तुभेदेन द्विरूपाः । तत्र
ये कल्पनोपनीतास्तत्र काल्पनिका एव पक्षधर्मान्वयव्यति-
रेकाः, प्रमाणोपनीतेषु तु प्रामाणिका एवेति विभागः ।
तदिह काल्पनिकाग्नेर्यद्यपि प्रमेयत्वादेर्व्यावृत्तिः काल्पनिक्यपि
सिद्धा तथापि प्रामाणिकजलह्रदादेः प्रामाणिक्येवेषितव्या, सा
इसलिये घड़ेके समान उसका अभाव भी यदि प्रामाणिक (तात्त्विक) माना
जाय, तभी घट घटाभावका विरहस्वरूप और घटा

च न सिद्धेति कुतस्तस्य हेतुत्वम् ? एवं प्रामाणिके शब्दे पक्षी-
कृते प्रामाणिक एव हेतुमद्भावो वक्तव्यः । न चासौ चाक्षुष-
त्वस्यास्तीति सोऽपि कथं हेतुः ? एवं कृतकत्वस्यापि वस्त्वेक-
नियतस्य धर्मस्य वास्तव एवान्वयो वक्तव्यः, वस्तुनो विपक्षाच्च
वास्तव एव व्यतिरेकः । न च तस्य तौ स्तः, तत् कथमसावपि
हेतुरिति¹ ।
प्रमाणके आधार पर हैं, वहां तो हेतुका रहना या न रहना प्रामाणिक ही
है, ऐसी व्यवस्था है। अतः काल्पनिक निरग्नि स्थान से प्रमेयत्वादि हेतु-
की व्यावृत्ति भी काल्पनिकरूपमें भले ही सिद्ध हो जाती है, तो भी अग्नि-
रहित प्रामाणिक जल ह्रदसे तो प्रमेयत्वहेतुकी व्यावृत्ति भी प्रामाणिक ही
होनी चाहिये । किन्तु वैसा तो सिद्ध नहीं है । ऐसी दशामें
“अग्निमान् प्रमेयत्वात्” इस अनुमानमें प्रमेयत्व कैसे हेतु बनेगा ?
ऐसे ही “शब्दो नित्यः चाक्षुषत्वात्” इस असिद्ध अनुमानमें भी
प्रामाणिक शब्दके पक्ष किये जानेपर उसमे हेतु की सत्ता भी
प्रामाणिक ही अपेक्षित है। किन्तु शब्दमें चाक्षुषत्व तो वस्तुतः
है नहीं, तब वह भी कैसे हेतु होगा ? इसी प्रकार
“नित्यः शब्दः कृतकत्वात्” इस विरुद्ध अनुमानमे भी तात्त्विक
कृतकत्वधर्मका सपक्षमें रहना भी तात्त्विक ही होगा और वास्तविक
विपक्षमे न रहना भी वास्तविक ही होगा। किन्तु कृतकत्व हेतुमें
उक्त बातें नहीं हैं। अर्थात् प्रकृत अनुमानमे सपक्षभूत नित्य पदार्थमें
कृतकत्वका रहना (अन्वय) और विपक्षभूत अनित्यमें न रहना
(व्यतिरेक) दोनों ही असिद्ध हैं। ऐसी दशामें वह भी कैसे हेतु हो
सकता है ? अर्थात् पूर्वोक्त व्यभिचारी, असिद्ध और विरुद्ध हेतुओंसे
अनुमितिकी आपत्ति नहीं होगी।
(उत्तर) उक्त कथन भी प्रलापमात्र है। क्योंकि जबतक कोई
नियामक न हो, यह नहीं कहा जासकता कि अपने अभीष्टकी ओर
१. नन्वित्यादिः हेतुरित्यन्तः पूर्वपक्षः ।

७८ आत्मतत्त्वविवेके
प्रलपितमेतत् , नहि नियामकमन्तरेण सम्पदं प्रति कल्पना
त्वरते विपदं प्रति तु विलम्बत इति शक्यं वक्तुम् , तथा च
निर्वह्निकमपि कूर्मरोम सधूममिति कल्पनामात्रेण विपक्षवृत्तित्वात्
धूमोऽपि नाग्निं गमयेत् ।
वास्तव्यां रूपसम्पत्तौ किमनेन काल्पनिकेन दोषेणेति चेत् ,
तर्हि वास्तव्यामसम्पत्तौ किं काल्पनिक्या तथेति समानम् ।
विरोधा विरोधौ विशेष इति चेत्, कुत एषः ? उभयोरेकत्र वस्त्व-
वस्तुत्वादन्यत्रावस्तुत्वादिति चेत् , तत् किं काल्पनिकोऽपि धूमो
कल्पना तीव्र हो जाती है, और अनिष्टके प्रति तो मन्द पड़ जायगी ।
ऐसा मानने पर "अग्निरहित भी कूर्मरोम धूमवान् है" इस व्यभिचार-
कल्पनामात्रसे ही धूम विपक्षगामी हो जायगा तथा उससे पर्वतमे अग्नि-
की अनुमिति नहीं होनी चाहिये ।
यदि कहो कि—वस्तुतः तो धूम विपक्षगामी नहीं है, अतः कल्पना-
द्वारा उसे विपक्षगामी बनानेमे क्या हानि है ? सत्त्व और क्षणि-
कत्वकी भी शशशृङ्गमे वास्तविक व्यतिरेकव्याप्ति नहीं है, तब काल्प-
निक व्यतिरेकव्याप्तिसे आपको क्या लाभ है ? इस तरह हम दोनों
समान हैं ।
यदि कहो कि—कूर्मरोम मिथ्या है और उसमें वास्तविक धूमका
रहना विरुद्ध है, किन्तु काल्पनिक कूर्मरोम या शशशृङ्गमे क्षणिकत्व
क्रमयौगपद्यका अभाव भी काल्पनिक ही रहे, तो इसमें कोई विरोध
नहीं है, यही हम दोनोंमें अन्तर है—तो बताओ, क्यों एक जगह विरोध
है और दूसरी जगह अविरोध है ?
यदि कहो कि—दोनों स्थलोंमे एक जगह तो वस्तु ( धूम ) और
अवस्तु ( कूर्मरोम ) का सम्बन्ध होनेमे विरोध है तथा दूसरी जगह
अवस्तु अवस्तुका सम्बन्ध होनेमे अविरोध है—तो क्या काल्पनिक भी
धूम वस्तुभूत ( वास्तविक ) है कि कूर्मरोमको उसके साथ विरोध
हो जाय ?

क्षणभङ्गवादः ७९
वस्तुभूतो येन कूर्मरोम्णस्तेन सह विरोधः स्यात् ? क्वचिद्-
वस्तुभूत एवेति निर्धूमत्वमपि क्वचिद्वस्तुभूतमिति तेनापि विरोध
एव । तस्माद् यथा काल्पनिकी विपत्तिर्न दोषाय तथा काल्प-
निकी सम्पत्तिरपि न गुणायेति व्यतिरेकभङ्गः ।
क्षणभङ्गसिद्धौ प्रकारान्तरखण्डनम्
अस्तु तर्हि ध्रुवभावित्वेन विनाशस्याहेतुकत्वे सिद्धे¹ क्षण-
भङ्गः, न, विकल्पानुपपत्तेः । तद्धि तादात्म्यं वा, निरुपाख्यत्वं
वा, तत्कार्यत्वं वा, तद्व्यापकत्वं वा, अभावत्वमेव वेति ।
यदि कहो कि—वहाँ तो वह धूम वास्तविक ही है, अतः उस
वास्तविक धूमका अवास्तविक कूर्मरोमसे विरोध है ही—तो निर्धूमत्व
भी कहीं ( जलादिमे ) वास्तविक ही है, इस प्रकार निर्धूमत्वसे भी
कूर्मरोमको विरोध ही होगा । अर्थात् कूर्मरोममे धूमाभाव भी नहीं
रह सकेगा और उसमे धूमवत्ताका आपादन किया ही जा सकता है ।
अत जैसे, काल्पनिक व्यभिचारसे अनुमानमे कोई दोष नहीं आता
है, वैसे ही सत्त्व और क्षणिकत्वके व्यतिरेकके काल्पनिक सहचारसे
भी कोई लाभ नहीं है । इस तरह तुम्हारे सत्त्व और क्षणिकत्वमें
व्यतिरेकव्याप्तिका भङ्ग हो गया ।
क्षणभङ्गसिद्धिमें प्रकारान्तरका खण्डन
( शङ्का ) क्षणिकत्वकी सिद्धि दूसरे ही प्रकारसे की जायगी । वह
यों है—चूँकि वस्तुओंका विनाश अवश्यभावी है, इसलिए वह विनाश
बिना हेतुका ही होगा । क्योंकि जो अवश्यभावी होता है, उसमे किसी
हेतुकी अपेक्षा नहीं रहती है । इस प्रकार जब विनाश होनेमें किसी
हेतुकी अपेक्षा नहीं है, तब तो कोई भी वस्तु उत्पन्न होते ही नष्ट होती
रहेगी और क्षणिकत्व स्वतः सिद्ध हो जायगा ।
( उत्तर ) क्षणिकत्व सिद्ध करनेका उक्त प्रकार भी ठीक नहीं है ।
क्योंकि यहाँ आगे दिये जानेवाले पाँच विकल्पोंमे कोई भी सम्भव नहीं
१. ध्रुवभावित्वाद विनाशस्याहेतुकत्वेन—१ पु० पा०

८० आत्मतत्त्वविवेके
न पूर्वः—निषेध्यनिषेधयोरेकत्वानुपपत्तेः । उपपत्तौ वा
विश्वस्य वैश्वरूप्यानुपपत्तेः ।
ननु कालान्तरेऽर्थक्रियां * प्रत्यशक्तिरेवास्य नास्तिता, सा
च कालान्तरे समर्थेतरस्वभावत्वमेवेति चेत्, नन्वयमेव क्षण-
भङ्गस्तथा चासिद्धमसिद्धेन साधयतः कस्ते प्रतिनन्दः ? १
अपि च देशान्तरकालान्तरानुषङ्गिणस्तस्य नास्तिता यद्य-
है । जैसे—"विनाश अहेतुक है" इस कथनका क्या अभिप्राय है ?
क्या विनाश प्रतियोगीस्वरूप है ? या निरुपाख्य अर्थात् अलीक है ?
या प्रतियोगीका ही कार्य है ? या उसका व्यापक है ? अथवा अभाव-
स्वरूप ही होता हुआ प्रागभावके समान अहेतुक है ?
इनमें प्रथम विकल्प नहीं हो सकता है । क्योंकि निषेधकी जाने-
वाली वस्तु और उसका निषेध दोनों एक नहीं हो सकते हैं । यदि
परस्पर विरोधी स्वरूपवाले भी निषेध्य और निषेध एक हो जायें तो
संसारमें वही विचित्रता ही नहीं रह जायगी और गौ एवं अश्व भी एक
होने लगेंगे ।
यदि कहो कि—उत्तरकालमें अर्थक्रियाके प्रति भाववस्तुगत जो
असमर्थता है, वही उसका अभाव कहा जाता है । अर्थात् समर्थसे भिन्न
स्वभाववाला यही भाव अभाव कहा जाता है तथा उस असमर्थताको ही
भावका नाश भी कहते हैं—तो यह कथन ठीक नहीं है । क्योंकि प्रथम
क्षणमें सामर्थ्य और दूसरे क्षणमें असामर्थ्य रूप विरोधी धर्म बताकर
यदि एक ही वस्तुको दोनों क्षणोंमें भिन्न भिन्न सिद्ध करना चाहते हो, तो
यही तुम्हारा क्षणभङ्ग है और यह स्वयं असिद्ध है । एवं इस क्षणभङ्गको
सिद्ध करनेके लिये जो क्षणभेदसे सामर्थ्य और असामर्थ्यरूप प्रमाण
उपस्थित कर एक ही वस्तुको भिन्न भिन्न बताते हो, वह भी असिद्ध ही है ।
इस प्रकार असिद्धको असिद्धसे ही सिद्ध करते हुए तुम्हें कौनसा आनन्द
प्राप्त हो रहा है ?
एवं उस स्थान और उस क्षणके अतिरिक्त अन्य स्थान तथा अन्य
१. प्रतिमन्दः—१, ३ पु० पा०

क्षणभङ्गवादः [८१]

मेव, नूनमनवरमिदमुक्तं यदयमेव देशान्तरकालान्तरानुपङ्गीति ।
यदि वा स्वदेशकालवत् कालान्तरदेशान्तरयोरपि नास्तिताननु-
षङ्गेऽस्तित्वप्रसङ्गः । अशक्तेः कथमस्तु ? शक्तेः सत्तालक्षणत्वा-
दिति चेत्, अथ कालान्तरकार्यं प्रति स्वकालेऽशक्तिरसत्त्वं ? किं
वा स्वकार्यमपि प्रति कालान्तरेऽशक्तिरसत्त्वम् ?
आद्ये स्वकालेऽप्यसत्त्वप्रसङ्गः, तदानीमपि तस्य ताद्रूप्यात् ।
कालान्तरकार्यं प्रत्येवमेतदिति चेत्, किमयं मन्त्रपाठः ? न हि


क्षणोंमें भी रहनेवाला वह अभाव यदि प्रतियोगी (भाव) रूप ही
हो तो निश्चय ही यह कथन भी तुम्हारे मतानुसार असंगत ही होगा ।
क्योंकि यह भाव ही देशान्तर और कालान्तरतक रहनेवाला सिद्ध
हो गया ।
यदि दूसरे देश और दूसरे क्षणोंमें भी अभावका अनुवर्तन न मानो
तो वहाँ भावका अस्तित्व सिद्ध हो जायगा ।
यदि कहो कि—दूसरे क्षणोंमें वह भाव वस्तु अर्थक्रियाके प्रति
अशक्त है, अतः उसका दूसरे क्षणोंमें अस्तित्व कैसे होगा ? क्योंकि
शक्ति ही अस्तित्वका लक्षण है—तो बताओ, अन्यकालीन कार्यके प्रति
अपने कालमें जो असमर्थता है, उसे असत्त्व मानते हो ? अथवा अपने
कार्यके प्रति भी दूसरे कालमें असमर्थताको असत्त्व कहते हो ?
प्रथम पक्षमें अपने कालमे भी वह वस्तु असत् होने लगेगी, क्योंकि
उस कालमे भी उसमें असक्ति है ही।
यदि कहो कि—अन्यकालीन कार्यकी दृष्टिसे वह अपने कालमे भी
असत् ही है—तो क्या यह मन्त्रपाठ है कि आँख मूंदकर सत्‌को भी
दूसरी दृष्टिसे असत् मान लिया जाय ? ऐसा व्यवहार तो कहीं नहीं होता
कि जो जिस कार्यमें अशक्त है, वह उस कार्यकी दृष्टिसे है ही नहीं ।
यह नहीं होता कि गर्दभकी दृष्टिसे धूम संसारमें है ही नही। ऐसा
क्यों होता है ? इसीलिए कि अशक्त होनेसे उसका स्वरूप नहीं
निवृत्त हो जाता है ।

८२ आत्मतत्त्वविवेके
यो यत्राशक्तः स तदपेक्षया नास्तीति व्यवह्रियते। न हि रासभा-
पेक्षया धूमो जगति नास्ति। तत् कस्य हेतोः ? न ह्यशक्तस्य
स्वरूपं निवर्तत इति।
द्वितीये तु यदि कालान्तराधाराऽशक्तिः, कथं तदात्मिका ?
तदाधारा चेत्, तदैवासत्त्वप्रसङ्गः। कालान्तरे तु विपर्ययः।
तस्मात्—
विधिरात्माऽस्य भावस्य निषेधस्तु ततः परः।
सोऽपि चात्मेति कः प्रेतः शृण्वन्नपि न लज्जते ॥
अनिर्वचनीयवृत्तिवादखण्डनम्
अस्तु तर्हि 'भावस्वरूपातिरिक्ता निवृत्तिर्नास्ति' इति
दूसरे पक्षके अनुसार यदि उस अशक्तिको अन्य कालमे मानो तो
क्षणिकवादीके मतमे अन्य कालमें उस प्रतियोगी वस्तुके नहीं रहनेसे
वह अशक्ति प्रतियोगीस्वरूप कैसे हो सकती है ? अर्थात् प्रतियोगीका
विनाश प्रतियोगीस्वरूप ही है, यह तुम्हारा कथन गिर जाता है।
यदि कहो कि—यह अशक्ति उस प्रतियोगी वस्तुके कालमे ही है—
तो अशक्तिके कारण वह प्रतियोगी अपने सत्ताकालमें ही असत् होने
लगेगा। इस प्रकार विरोध आ जाता है। साथ ही अपने कालमे असन्
होनेपर दूसरे क्षणोमे इसके विपरीत सत् होने लगेगा।
इसलिए अस्तित्व ही इस भावपदार्थका स्वरूप है, निषेध तो इससे
भिन्न वस्तु है। अतः अस्तित्वके समान निषेध भी वस्तुका स्वरूप
है, ऐसा सुनकर कौन बुद्धिमान् लज्जित नहीं हो जायगा।
विधि स्वरूप है भावका, नहि निषेध विधिरूप।
को नहि सुन लज्जित बने, दोनोंको विधिरूप॥
अनिर्वचनीयवृत्तिवादखण्डन
(शङ्का) यदि प्रथम पक्ष सम्भव नहीं है तो धर्मकीर्तिके "भाव-
स्वरूपातिरिक्ता निवृत्तिर्नास्ति" इस वाक्यमे "सोपाख्या" शब्द जोड़-
कर द्वितीय पक्ष ही रहे। अर्थात् "भावस्वरूपातिरिक्ता सोपाख्या