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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 109, कुल 530 में से

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पृष्ठ 109

६० आत्मतत्त्वविवेके
विधिव्यवहारमात्राभिप्रायेणाभाजनत्ववादे कुतो विरोध इति
चेत्, हन्त ! सकलविधिव्यवहाराभाजनत्वेन किञ्चिद् व्यवह्रियते
न वा ? उभयथापि स्ववचनविरोधः, उभयथाप्यवस्तुनैव तेन
भवितव्यम्, वस्तुनः सर्वव्यवहारविरहानुपपत्तेः ।
नेतिपक्षे सकलविधिनिषेधव्यवहारविरहीत्यनेनैव व्यवहारेण
विरोधात् । अव्यवहृतस्य निषेधुमशक्यत्वात् । व्यवह्रियत इति
पक्षेऽपि विषयस्वरूपपर्यालोचनयैव विरोधात्, न हि सर्वव्यवहारा-
विषयश्च व्यवह्रियते चेति ।
यदि चावस्तुनो निषेधव्यवहारगोचरत्वं विधिव्यवहारगोच-
रतापि किं न स्यात् ? प्रमाणाभावस्योभयत्रापि तुल्यत्वाद् इति ।
यदि कहो कि—असत्में सकल व्यवहारका अपात्रत्व मानने वालेके
यहां उसमें निषेधव्यवहार करनेमें भले ही विरोध हो, पर केवल विधि-
व्यवहारका अपात्रत्व माननेवालेके यहां कैसे विरोध होगा ? अर्थात्
शशशृङ्ग आदिमें सत्त्व और क्षणिकत्वका निषेधव्यवहार करनेमे बौद्ध-
को स्ववचन विरोध नहीं होगा । क्योंकि असत्‌को हम केवल विधिव्य-
वहारका ही अपात्र मानते हैं—तो अहो ! सभी विधि और निषेध व्यव-
हारोंका अपात्ररूपसे किसीको व्यवहृत करते हो या नहीं ? दोनों ही
दशाओंमे तुम्हें भी स्ववचन विरोध हो जाता है । तथा दोनों ही
दशाओंमे वह अवस्तु (असत्) ही होगी, जिसे तुम व्यवहृत करते हो ।
कारण, वस्तुमें (सत्‌मे) सकल व्यवहारका अभाव नहीं हो सकता है ।
क्योंकि नहीं पक्षमे—सकल विधि-निषेध-व्यवहारका विरही असत्
—यह भी तो एक व्यवहार ही हुआ, जिससे विरोध आ जाता है ।
कारण व्यवहारमें लाये बिना निषेध ही नहीं कर सकते हो । व्यवहृत
करनेके पक्षमें तो विषयस्वरूपकी पर्यालोचना करनेसे ही विरोध झलक
जाता है। क्योंकि यह नहीं हो सकता कि—'सब व्यवहारका अविषय
भी हो और व्यवहृत भी होता हो' ।
एवं यदि अलीक (मिथ्या वन्ध्यासुतादि) में सत्त्व और क्षणिकत्व-