आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 92, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ेंविवक्षायां यत् समर्थं तत्करोत्येवेत्युपसंहर्तुं शक्यमिति चेन्न, काल-
नियमाविवक्षायां यत् समर्थं तत्करोत्येवेति कदाचित् स्यात् । तथा
च संभवविधेरत्यन्तायोगो विरुद्धो न स्वयोगः । नीलं सरोजं
भवत्येवेतिवत् ।
ननु यदसमर्थं प्रथममासीत् तस्य सामर्थ्यं पश्चादपि कुत
आगतम्, प्रथमं समर्थस्य वा पश्चात् कुत्र गतम् । नैतदेवं,
तत्तत्सहकारिमत्तत्तत्कारकत्वं हि सामर्थ्यम्, अतद्वतस्तदन्यवतो
वा तदकर्तृत्वममामर्थ्यम् । इदं चौत्पत्तिकमस्य रूपं, ते च
( उत्तर ) यह भी ठीक नहीं है। कालविशेषका निर्देश किये बिना
'जो समर्थ है वह करता ही है यह बात सदाके लिए नहीं है किन्तु
कदाचित्के लिये है। इस स्थितिमे उस उपसहारका यह स्वरूप हुआ
कि 'जो समर्थ है उसका करना संभव है'। यदि इस संभव-विधिको
किसीके साथ विरोध है तो करणके अत्यन्तिक अयोगके साथ है न कि
सामान्य अयोग के साथ । जैसे 'नील कलम होता ही है' यहाँ नील
कमलकी संभावना बताकर नीलकमलका सर्वथा न होना ( आत्यन्तिक
अभाव ) रोका जाता है, न कि नीलकमलके न होनेको भी रोक देता है ।
क्योंकि नीलकमल नहीं भी होता है ।
( शङ्का ) तो, जो पहले अङ्कुर करनेमें असमर्थ रहा, उसमे पीछे
भी सामर्थ्य कहासे आगयी ? अथवा जो पहले समथ था, उसकी
सामर्थ्य पीछे कहाँ चली गयी ?
( उत्तर ) इस तरहका प्रश्न नहीं कर सकते । क्योंकि यहाँ
सामर्थ्यका अर्थ योग्यता लो, तबतो पहले और पीछे भी वह समर्थ ही है ।
सामर्थ्यपदसे यदि कार्यका करना अर्थ लो, तो उस उस सहकारीसे युक्त
होकर उस उस कार्यको कर देना ही सामर्थ्य है और उस उस सहकारीके
अभावमे अथवा अन्य कार्यके सहकारीके योगमे उस कार्यका न करनाही
असामर्थ्य है । भावोंका यही स्वाभाविक रूप है । और वे सहकारी
अपने उपस्थापक कारणके अधीन होनेसे अनियत कालमे उपस्थित होते
है । इसलिये कार्योंका भी काल अनियत रहता है । अर्थात् सामर्थ्य