आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षणभङ्गवादः [४७]
ननु यावत्योऽर्थक्रिया भिन्नदेशास्तावद्भेदं कारणमस्तु को
विरोध इति चेत्, न, तेषामपि प्रत्येकं तत्प्रसङ्गस्य तदवस्थत्वात्।
एवमेकस्य जगति वस्तुतत्त्वस्याऽलाभे साध्वी क्षणभङ्गसाधन-
परिशुद्धिः।
अस्तु तर्हि कश्चिद्दोष एवानयोरिति चेत्, स पुनः कस्मिन्
साध्ये ? किं सामर्थ्यांसामर्थ्ययोः ? किं वा तद्विरुद्धयोः ? किं वा
तद्विरुद्धधर्माध्यासेन भेदे ? आहोस्वित् शक्त्यशक्त्योर्विरोधे ?
साधनभूत सत्त्व-हेतुरूप शस्त्रका भी परित्याग कर देना पड़ेगा। ऐसी
दशामें बाह्यस्थिरत्ववादरूप युद्धस्थलीमे भी तुम्हें क्या भय है ?
अर्थात् क्षणिकत्वसिद्धिके लिये उठाये सत्त्वहेतुरूप शस्त्र गिराकर हार
मान ही गये तो स्थिरत्व ही मान लो, उससे बचनेके लिये योगाचार
मतका स्वीकार क्यों कर रहे हो ?
(शङ्का) जिन जिन भिन्न देशोंमे जितनी अर्थक्रियायें (अंकुरादि
कार्य) होती हैं, बीजरूपकारणके भी उतने भेद माननेमें क्या
विरोध है !
(उत्तर) ऐसा नहीं कह सकते। क्योंकि कारणके उतने भेदोंमे
भी प्रत्येकके लिये उक्त प्रसङ्ग पुनः वैसे ही दिया जा सकता
है। अर्थात् वह प्रत्येक बीज देशान्तरमें भी अंकुरसमर्थ हो तो
देशाद्वैतकी आपत्ति हो जायगी। और अंकुरसमर्थ न हो तो स्वदेशमे
सामर्थ्य और अन्यदेशमे असामर्थ्यरूप विरुद्धधर्मोंका संसर्ग होनेसे
वह प्रत्येक भी भिन्न हो जायगा। इस प्रकार जगत् मे एक वस्तु कोई
रह ही नहीं जायगी। ऐसी दशामे क्षणिकत्व सिद्ध करनेवाले आपके
हेतुओंकी अच्छी विशुद्धता (निर्दोषता) है। अर्थात् जब एक कोई
है नहीं तो किसे पक्ष मानकर क्षणिकत्व सिद्ध करोगे।
यदि पूर्वोक्त देशगर्भित प्रसङ्ग और विपर्य्ययमे किसी दोषको मानो,
तो बताओ, क्या सिद्ध करनेमे वह दोष होगा। क्या, सामर्थ्य और
असामर्थ्य सिद्ध करने में ? या सामर्थ्य और असामर्थ्यरूप विरुद्ध