आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षणभङ्गवादः ४५
द्वितीयस्तु स्यादपि यदि तेषां यौगपद्यं भवेत्, क्रमिणस्तु
सहकारिण इत्युक्तम् । सहकारिसहितः स्वभावेन करोतीति
वक्तरि तु जातनष्ट एव करोत्वित्युत्तरप्रसङ्गो निरर्गलशैश-
वस्येत्यलमनेन ।
तस्मात् कार्यस्य स एव कालः, कारणस्य तु स चान्यश्चेति
संबन्धिकालापेक्षया पूर्वकालताव्यवहारः ।
अपि च यदा तदेतिस्थाने यत्र तत्रेति प्रक्षिप्य तयोरेव प्रसङ्ग-
तद्विपर्यययोः को दोषः ?
दूसरा पक्ष तब हो सकता, यदि सभी सहकारी एक कालमें
रहें । किन्तु सहकारी क्रमसे रहने वाले हैं, यह कहा जा चुका है ।
सहकारिसहित होकर स्वयं या अपूर्व आदि व्यापारके द्वारा स्वभावतः
करता है, ऐसा कहने वालेके प्रति तो यह उत्तर उपस्थित करना
कि--पैदा होते ही नष्ट होकर ही (क्षणिक होता हुआ भी) कार्य
करेगा, स्वच्छन्द शिशुता है । अतः इससे बचो । अर्थात् उक्त कथनमें
क्षणिकत्वका अवसर ही नहीं है ।
अतः कार्यका वही [सामग्रीसमवधानका उत्तरवर्ती] काल है और
कारणका तो यथासंभव वह भी है और दूसरा भी है । अर्थात् कोई
कारण सामग्रीके बाद भी बना रहता है और कोई कार्यके पूर्व ही नष्ट
हो जाता है । कार्य और कारणके एक समयमें रहनेपर भी कारणमें
कार्यके प्रति पूर्वकालताका जो व्यवहार होता है, वह कार्यप्रागभावरूप
सम्बन्धीके कालमें उसके नियमतः रहनेके कारण होता है ।
इसके अतिरिक्त कालवाची 'जब और तब' पदोंके स्थानमें देश-
वाची 'जहां और वहां' पदोंका भी निवेश करके यदि वे ही प्रसङ्ग
और विपर्यय उपस्थित किये जाँय तो क्या हानि है ? अर्थात् “जो जब
जहां जिसके प्रति समर्थ है, वह तब वहां उसे करता ही है" ऐसा
नियम मानकर पूछता हूँ कि-खेतमें बोया गया बीज बखारमे
अङ्कुर करनेमें समर्थ है या नहीं ? यहां यदि समर्थ मानो तो क्षेत्रस्थ