आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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हन्तैवम्भूतविरोधलक्षणव्यावृत्तिर्भिन्नकालशक्त्यशक्तयोरपीत्यु-
क्तप्रायं, तत्प्रतिसन्दधीथाः। तस्मात् प्रसङ्गतद्विपर्ययस्थितावपि
असिद्धो विरुद्धधर्माध्यासः।
ननु यदेकदा यत् करोति तद्यावत्सत्त्वं तत्करोत्येव यथा
कश्चिच्छब्दः१ शब्दान्तरमिति प्रसङ्गोऽस्तु। विपर्ययस्तु यदेकदा
यन्न करोति तत् सर्वदैव तन्न करोति यथा शिलाशकलमङ्कुरम्।
न करोति चैकदा कुशलस्थं बीजमङ्कुरमिति चेत्—
तदेतज्जात्यभिप्रायेण वा स्यात् व्यक्त्यभिप्रायेण वा स्यात्।
करनेका विरोधी नहीं है किन्तु उसी जगह उस कार्यको न करना ही
विरोधी है।
तब तो हन्त ! ऐसे विरोधलक्षणका अभाव भिन्नकालमें करण और
अकरणमे भी है। यह पहले ही कह दिया गया है, उसे स्मरण करो।
अर्थात् भिन्नकालमे करण अकरणमे कोई विरोध नहीं है।