आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्निमित्तकत्वप्रसङ्गात् । अनैकान्तिकश्च हेतुः कालतोऽपि न
भेदं साधयेत् ॥
न तृतीयः, विरोधलक्षणयोगे बाधकसहस्रेणापि विरोध-
स्यापनेतुमशक्यत्वात्, अयोगे वा तदेव चिन्त्यम् । यद्विधाने यस्य
निषेधो यन्निषेधे वा यस्य विधानं तयोरेकत्र धर्मिणि परस्पर-
परिहारस्थिततया विरोधः१, सचेह नास्ति । तद्देशकार्यकारित्वं हि
तद्देशाकार्यकारित्वेन विरुद्धं तद्विधौ तस्य नियमेन निषेधात्, न
पुनर्देशान्तरे तत्कार्याकारित्वेन, तस्यानिषेधात् । न ह्यन्यत्र तद्-
करणमतत्करणं वा तत्र तत्करणस्याभावोऽपि तु तत्र तदकरण-
मिति चेत्---
पर भी यदि अभेद मानो तो विश्वमे भेदव्यवहारका कोई विषय ही नहीं
रह जायगा। साथ ही दैशिक भेदस्थलमे ही व्यभिचारी होनेसे
विरुद्धधर्माध्यासरूप हेतु कालिक भेदको भी नहीं सिद्ध कर सकेगा।
एवं, तीसरा पक्ष भी ठीक नहीं है। क्योंकि विरोधलक्षणका योग
रहनेपर हजारों बाधक भी उस विरोधको नहीं हटा सकते। यदि
विरोधलक्षणका यहाँ अयोग है, तब यही तो विचारणीय है कि
जिसके विधानमे जिसका निषेध हो और जिसके निषेधमे जिसका
विधान हो, उन दोनोंमें एक जगह एक दूसरेको छोड़कर रहनेके कारण
ही विरोध होता है, और वैसा यहाँ नहीं है। क्योंकि उस देशमे कार्य
करनेको उसी देशमे कार्य न करनेके साथ विरोध है। कारण, उस
देशमे कार्यकारित्वके विधानमें उस देशमें कार्याकारित्वका नियमतः
निषेध होता है। न कि देशान्तरमे उस कार्यको न करनेके साथ विरोध
है। कारण, वहाँ देशान्तरमें कार्यकारित्वका निषेध नहीं होता है।
अर्थात् उस देशमे कार्यकारी देशान्तरमे कार्यकारी भी हो सकता है,
इसमें विरोध नहीं है। क्योंकि उससे भिन्न जगहमे उस कार्यको
न करना या उससे भिन्न कार्यका करना उस जगह उस कार्यको
१. परस्परपरीहारावस्थितयोर्विरोध — १ पु० पा०
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