सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 101, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 101

१२ आत्मतत्त्वविवेक
अस्तु तर्हि तस्यैव तेनैव सहकारिणा संबन्धोऽसंबन्धश्चेति
विरोधः, न, विकल्पानुपपत्तेः । तथाहि संबन्धिनः संबन्ध्यन्तरे स्वा-
भावस्वाभाव्यं वा विरुध्येत ? अभावप्रतियोगित्वं वा ? तदैवेति
सहितं वा ? तत्रैवेति सहितं वा ? उभयासहितं वा ? तथैवेति
सहितं वेति ?
न प्रथमः, अनभ्युपगमात् । न द्वितीयः, सत्कार्यप्रतिषेधात् १।
न तृतीयः, प्राक्प्रध्वंसाभावयोर्विद्यमानकालत्वानभ्युपगमात् ।
परस्पर भिन्न होना ही करण और अकरणका विरोध है" यह पूर्वोक्त
तृतीयपक्ष भी ठीक नहीं है । क्योंकि इस प्रकारका विरोध माननेमे
परस्परमे भिन्न होनेमात्रसे कृतकत्व और अनित्यत्वमे भी विरोधका
प्रसङ्ग हो जायगा ।
(शङ्का) तब उसी (बीज) का उसी सहकारीके साथ कभी सम्बन्ध-
का होना और कभी न होना ही विरोध होवे ।
(उत्तर) यह नहीं कह सकते हो, क्योंकि अग्रिम विकल्पोंमे कोई
भी विकल्प नहीं बन सकता है ।
जैसे, क्या दूसरे सम्बन्धीको एक सम्बन्धीका अभावरूप होना
विरुद्ध होगा ? अर्थात् एक सहकारीका दूसरा सहकारी अभावस्वरूप
ही है और भाव और अभावका सम्बन्ध कभी हो नहीं सकता है, यही
विरोध है ? अथवा भावरूप एक सहकारीका दूसरे सहकारीमे
अभावप्रतियोगित्वरूप असमवधान विरुद्ध होगा ? अथवा जिस क्षणमे
अपना समवधान है उसी क्षणमे उसका असमवधान विरुद्ध होगा ?
अथवा जिस जगह समवधान है वहीं असमवधानका होना विरुद्ध
होगा ? अथवा उसी क्षण और उसी देशमें उसका समवधान और
असमवधानका होना विरुद्ध होगा ? अथवा जिस रूपसे समवधान हो
उसी रूपसे असमवधानका होना विरुद्ध होगा ?
इनमे प्रथमपक्ष ठीक नहीं है, क्योंकि एक सम्बन्धीका अभावरूप
दूसरे सम्बन्धीको हम नहीं मानते हैं । दूसरा भी ठीक नहीं है,
१. प्रतिषेधात्—२ पु० पा०