आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षणभङ्गवादः ६१
वन्ध्यासुतस्यावक्तृत्वेऽचेतनत्वादिकमेव प्रमाणं वक्तृत्वे तु न
किञ्चिदिति चेन्न, तत्रापि सुतत्वस्य विद्यमानत्वात् । न हि
वन्ध्यायाः सुतो न सुतः, तथा सति स्ववचनविरोधात् । वचन-
मात्रमेतत् न तु परमार्थतः सुत एवासाविति चेन्न, अचेतनस्याप्येवं-
रूपत्वात् । चेतनादन्यत् स्वभावान्तरमेव ह्यचेतनमित्युच्यते । चैतन्य-
निवृत्तिमात्रमेवेह विवक्षितम् , तच्च सम्भवत्येनेति चेन्न, तत्राप्यसु-
तत्वनिवृत्तिमात्रस्यैव विवक्षितत्वात् ।
के निषेधव्यवहारकी विषयता है तो उसमे विधिव्यवहारकी भी
विषयता क्यों न हो ? कारण, अलीकमे विधि और निषेध दोनों ही
व्यवहारोंके होनेमे प्रमाणाभाव समान रूपसे है ।
यदि कहो कि—बन्ध्यासुतमे वक्तृत्वनिषेधका व्यवहार करनेमे
उसका अचेतन होना ही प्रमाण है, किन्तु उसमे वक्तृत्वका विधिव्यवहार
करनेमें तो कुछ प्रमाण नहीं है—तो यह कहना ठीक नहीं है । क्योंकि
उसके वक्तृत्वमे भी उसका सुत होना ही प्रमाणरूपसे विद्यमान है ।
यह नहीं कह सकते कि बन्ध्याका सुत सुत नहीं है । क्योंकि वैसा
कहनेपर अपने ही वचनका विरोध हो जायगा । अर्थात् बन्ध्यासुत
कहना और उसे सुत न मानना यह स्पष्ट ही स्ववचनविरोध है ।
यदि कहो कि—यह वचनमात्र ही है न कि वह वस्तुत सुत ही
है—तो ऐसा नहीं हो सकता । क्योंकि तब तो उसका अचेतन होना
भी ऐसा ही हो जायगा । अर्थात् बन्ध्यासुतको अचेतन कहना भी
वचनमात्र ही है, न कि वह घटादिके समान वस्तुत अचेतन ही है ।
क्योंकि चेतनसे भिन्न एक दूसरे स्वभावका पदार्थ ही अचेतन कहा
जाता है ।
यदि कहो कि—यहाँ अचेतनपदसे कोई विलक्षण स्वभाववाला
अभिप्रेत नहीं है, किन्तु चैतन्यकी निवृत्तिमात्र ही विवक्षित है और
वह बन्ध्यासुतमे सम्भव ही है—तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि
तब उसमे वक्तृत्व सिद्ध करनेमें भी हेतुवाची सुतपदसे असुतत्वकी
निवृत्तिमात्र ही विवक्षित बताया जा सकता है और वह सम्भव ही है ।