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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

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पृष्ठ 97

४८ आत्म. तत्त्व. - १ क
नाद्यः, सर्वत्र सामर्थ्ये हि प्रसह्यकरणात्, सर्वत्राशक्तौ
क्वचिदप्यकरणात् ।
सर्वदेशसमानस्वभावत्वेऽप्यस्य ‘स्वोपादानदेश एव तत्कार्यं
करोतीति, अयमस्य स्वभावः स्वकारणादायातो न नियोग-
पर्यनुयोगानर्हतीति चेत् , तर्हि सर्वकालसमानस्वभावत्वेऽपि तत्त-
त्सहकारिकाल एव^१ करोतीत्ययमस्य स्वभावः स्वकारणादायात
इति किन्न रोचयेः ?
न द्वितीयः, विरुद्धधर्माध्यासेनाप्यभेदे भेदव्यवहारस्य
धर्मों के आरोपसे बीजव्यक्तिमें भेद सिद्ध करने मे ? अथवा करण और
अकरणका विरोध सिद्ध करने मे ?
इनमे प्रथमपक्ष ठीक नहीं है। क्योंकि क्षेत्रस्थ बीजम क्षेत्रमे
अंकुरके प्रति सामर्थ्य और बगारमे अंकुरके प्रति असामर्थ्य ये दा न
माने जाँय तो वह बीज सर्वत्र अंकुर समर्थ ही होगा अथवा सर्वत्र अस-
मर्थ ही होगा। ऐसी दशामे सर्वत्र सामर्थ्य होनेमे उसे बगारमे भी
अंकुर करना बलात् प्राप्त हो जायगा। एवं सर्वत्र असामर्थ्य होनेम
कहीं भी (क्षेत्रमे भो) अंकुर न करना प्रसक्त हो जायगा।
(शङ्का) सब जगह बीजके एक ही स्वभावका होनेपर भी अपने
कार्यके लिये नियत एकदेशमें ही यह कार्यको करता है, इस प्रकार का
बीजका यह स्वभाव अपने कारणसे प्राप्त हुआ है। अत स्वभावके लिये
कोई विधि या निषेध नहीं दिया जा सक्ता है।
(उत्तर) तो उसी प्रकार “सब कालमें अर्थात् खेतमे और बगारमें
भी रहनेकी दशामें बीजके एक स्वभावका होने पर भी उन उन सहका-
रियोंके प्राप्तिकालमें ही यह अङ्कुररूप कार्य करता है। इस प्रकारका
यह बीजका स्वभाव ही है, जो अपने कारणसे इसे प्राप्त है यह बात
क्यों नहीं पसंद करते हो ?
द्वितीय पक्ष भी ठीक नहीं है। क्योंकि विरुद्ध धर्मोका संसर्ग होने
१. लाभ एव — १ पु० पा०