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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 104, कुल 530 में से

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पृष्ठ 104

क्षणभङ्गवादः ५५
नैतदेवम्, क्षणिकपरमाणावप्यस्य विरोधस्य दुर्वारत्वात् ।
तथाहि पूर्वदिगवस्थितः परमाणुर्यथाऽपरदिगवस्थितेन परमाणु-
नाऽपरदिगवच्छेदेनावृतरूप उत्पन्नः, तथैव किं पूर्वदिगवच्छे-
देनापि न वा ? उभयथा वा ? आद्ये उभयतोऽप्यनुपलब्धिप्रसङ्गः ।
द्वितीये तु उभयतोऽप्युपलम्भापत्तिः । तृतीये पुनः स एव दुरात्मा
विरोधः, स एव तेनैव तदैवावृतोऽनावृतश्चेति ।
प्रकारभेदमुपादायाविरोध इति चेत्, कः पुनरसौ¹ दिगन्तरा-
वच्छेदः ? यदि हि यदिगवच्छेदेनैव संयुक्तस्तदिगवच्छेदेनैवासंयु-
( उत्तर ) ऐसा पूर्वपक्ष ठीक नहीं है । कारण, क्षणिक परमाणुमें
भी इस प्रकारका विरोध नहीं रोका जा सकता है । क्योंकि, पूर्व
दिशामें स्थित परमाणु अपर दिशामे स्थित परमाणुसे जैसे अपर भागकी
ओर आवृत ( ढँका ) होकर पैदा होता है, वैसे ही क्या वह पूर्वभागकी
ओर भी आवृत ही होता है ? या पूर्वभागके समान अपरभागकी ओर
भी अनावृत ( बिना ढँका ) उत्पन्न होता है ? अथवा एक भागकी ओर
अनावृत और दूसरे भागकी ओर आवृत दोनों ही प्रकारका होता है ?
यहाँ प्रथम पक्षमें उसकी दोनों ही ओर अनुपलब्धि होनी चाहिये ।
द्वितीय पक्षमें दोनों ही ओरसे उपलब्धि ( प्रत्यक्ष ) होनी चाहिये ।
तृतीय पक्षमें तो वही दुरात्मा विरोध तुम्हारे यहां भी उपस्थित हो जाता
है कि 'वही उसीसे उसी कालमें आवृत भी है और अनावृत भी' ।
यदि कहो कि—विशेषणभेदको लेकर यहाँ विरोधका निवारण हो
जायगा—तो वह कौन सा विशेषणभेद है ?
यदि कहो कि—भिन्न-भिन्न दिशाका योग ही विशेषणभेद है,
क्योंकि यदि जिस दिशाकी ओर संयुक्त है उसी दिशाकी ओर असंयुक्त
भी हो, तब विरोध हो । यहां तो ऐसा है नहीं—तो अहो ! संयोग
और संयोगीमें परस्पर भेद मानने वाले मेरे पक्षमें भी यदि यह
सिद्धान्त लागू हो तब दोष कैसा ?
१. कश्च पुनरसौ-इति शङ्करमिश्रसम्मतः पाठः ।