आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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हारः प्रतिषिद्ध एवासतीति चेत्, सत्यम्, यथा अप्रामाणिकः स्व-
वचनविरुद्धोऽर्थो मा प्रसाङ्क्षीदिति मन्यमानेन त्वया अप्रामाणिक
एवासति व्यवहारः स्वीकृतस्तथास्माभिरपि प्रमाणचिन्तायाम-
प्रामाणिको व्यवहारो मा प्रसाङ्क्षीदिति मन्यमानैरप्रामाणिक
एव स्ववचनविरोधः स्वीक्रियते । यदि तूभयत्रापि भवान् समान-
दृष्टिः स्यादस्माभिरपि तदा न किञ्चिदुच्यत इति ।
तृतीये त्वप्रामाणिकश्चाप्यवश्याभ्युपगन्तव्यश्चेति कस्येयमाज्ञेति
भवानेव प्रष्टव्यः । व्यवहारस्य सुदृढनिरूढत्वादिति चेत्, अप्रा-
माणिकश्च सुदृढनिरूढश्चेति व्याघातः । कथंचिदपि व्यवस्थितत्वा-
ही दिया गया—तो यह ठीक है। क्योंकि, जैसे—जो सत् है, वह
क्षणिक है—अपने इस वचनका विरोधी अक्षणिक शशशृङ्गमें भी
सत्त्वरूप अप्रामाणिक अर्थ न प्रसक्त हो जाय, यह मानते हुए तुम
असत् शशशृङ्गमें अप्रामाणिक ही अनुमानव्यवहार स्वीकृत किये हो,
वैसे ही हम भी क्षणिकत्वसिद्धिके लिये प्रमाणकी चिन्तामें शशशृङ्ग-
में व्यतिरेकव्याप्तिग्रहरूप तुम्हारे द्वारा किया गया अप्रामाणिक भी
व्यवहार न प्रसक्त हो जाय, ऐसा मानते हुए अप्रामाणिक भी स्ववचन-
विरोध हम स्वीकार करते हैं ।
यदि आप दोनों ही ओर समानदृष्टि हों, तब हम भी कुछ नहीं
कहते हैं । अर्थात् तुम यदि शशशृङ्गमे व्यतिरेकव्याप्ति दिखाना
छोड़ दो तो हम भी उसके खण्डनका यत्न नहीं करेंगे ।
तृतीयपक्षमें तो—असत्में व्यवहार अप्रामाणिक भी है और उसे
अवश्य मानना भी चाहिये—यह किसकी आज्ञा है ? ऐसा आप ही से
पूछा जा सकता है।
यदि कहो कि—असत्में व्यवहार अबाधितरूपसे अनादि परम्परासे
सिद्ध है, इसलिये अप्रामाणिक होता हुआ भी मानने ही योग्य है—
तो उक्तव्यवहार अप्रामाणिक भी है और अनादिपरम्परासिद्ध भी है—
यह परस्पर व्याहत वचन है ।