आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसहकारिणः स्वोपसर्पणकारणवशात् भिन्नकाला इत्यर्थात् कार्या-
णामपि भिन्नकालतेति ।
तथाप्येककालस्थ एव भावो जातप्रध्वस्तदा तदा तत्कार्यं
करोतु, उत्पन्नमात्रस्य तत्स्वभावत्वात्, एक देशस्थवदिति चेत्—
सेयमेककालस्थता स्वरूपापेक्षया ? सहकारिसन्निध्यापेक्षया
वा ? आद्ये न किञ्चिदनुपपन्नम्, नित्यानामप्येकरूपत्वात् वर्त-
मानैकस्वभावत्वात् सर्वभावानाम् । तदेव तु क्वचित् सावधि
क्वचिन्निरवधीति विशेषः । सावधित्वेऽपि व्यापारफलप्रवाह-
प्रकर्षाप्रकर्षाभ्यां विशेषः ।
न कहीं जाता है और न कहीं से आता है । किन्तु सहकारीका योग
और वियोग ही सामर्थ्य और असामर्थ्य है । और उस योगका भी
समय अनियत है क्योंकि वह भी उपस्थापक कारणके अधीन है ।
( शङ्का ) तो भी जैसे एक जगह रहता हुआ विषय अपनेसे भिन्न
देशमें आत्माम ज्ञानसुखादिको पैदा करता है वैसे ही किसी एक काल
मे रहकर नष्ट हो जानेवाला क्षणिक पदार्थ भी विभिन्न क्षणोंम कार्य
पैदा कर सकता है क्याकि उसी स्वभाव का वह पैदा होता है ।
( उत्तर ) तो यहाँ एक कालमे रहनेका अभिप्राय अपने कालमें
रहना है ? या सहकारियोंके कालम रहना है ?
यहाँ प्रथमपक्षमे कोई अनुपपत्ति नहीं है । क्योंकि नित्य और
अनित्य सभी स्थिर पदार्थ अपने कालमे ही रहते है । क्याकि अपने
कालमे ही रहना सभी भावोंका स्वभाव है । किंतु यही रहना कहीं
अवधिके साथ है जैसे अनित्योंका । और कहीं बिना अवधिके है,
जैसे नित्या का । सावधि रहनेमे भी व्यापार और फलके प्रवाहका
प्रकर्ष और अप्रकर्षरूप विशेषता होती है । अर्थात् यागसे अपूर्वनामक
एक ऐसा प्रकृष्ट व्यापार पैदा होता है, जिसके प्रभावसे बहुत पहन ही
यागके नष्ट हो जानेपर भी स्वर्गरूप फल उत्पन्न हो जाता है । बीजादिमें
यह प्रकर्ष नहीं है, इसलिये अङ्कुरोत्पत्तिके अव्यवहित पूर्वमें बीजका
रहना आवश्यक है ।