आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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ननु समवधानं नाम सहकारिणा धर्मः संयोगो भवद्भिरिष्यते,
स च तेभ्यो व्यतिरिक्तोऽव्याप्यवृत्तिश्चेत्यपि। तथा च स एव
तदैव तत्रैवास्ति नास्ति चेति। अनतिरेके स्थिरवादिनो व्यस्ता-
न्यपि बीजवारिधरणिधामानि तान्येवेति तेभ्योऽपि कार्योत्पत्ति-
प्रसङ्गः। व्याप्यवृत्तित्वे च सर्वत्र रक्तादिदिभ्रमः शब्दादिकार्यो-
त्पत्तिप्रसङ्गश्च। तस्मादसंयुक्तेभ्योऽय एव संयुक्तस्वभावाः पर-
माणवो जाता इत्येव ज्यायः।
विनाश भी असिद्ध है। यदि कहो कि वस्तुओंका विनाश ध्रुव है
इसलिये विनाशमे किसी हेतुकी अपेक्षा नहीं है—तो इसके सम्बन्ध
मे आगे कहेंगे।
एव पाचव प्रकारका विरोध भी नहीं हो सकता है। क्योंकि—
उसी कालमे उसी स्थानमें वही सहकारी है भी और नहीं भी है-ऐसा
हम नहीं मानते हैं।
(शङ्का) समवधानको भी आप सहकारियोंका धर्म और संयोग
रूप मानते हैं और यह भी मानते हैं कि वह समवधान उन
सहकारियोंसे अतिरिक्त और अव्याप्यवृत्ति (एकदेशी) भी है। तब
वही समवधान (संयोग) उसी समय यहीं पर है भी और
नहीं भी है, इस प्रकार विरोध आ जाता है। यदि वह
समवधान सहकारियोंसे अतिरिक्त न हो तो चूँकि स्थिरवादीके मतसे
छिटफुट रहनेवाले भी बीज, पानी, पृथ्वी और प्रकाश वे ही हैं,
इसलिये छिटफुट रहनेकी स्थितिमें भी उनसे अङ्कुररूप कार्यकी
उत्पत्ति होनी चाहिये। यदि संयोगको एकदेशी न मानकर व्याप्यवृत्ति
मानें तो एक भागमे रङ्गका संयोग होनेपर सर्वांशमे लालिमाकी
प्रतीति होनी चाहिये और आकाशके एक भागमें नगाडके संयोगसे
सम्पूर्ण आकाशम शब्दकी उत्पत्ति होनी चाहिये। इसलिये असंयुक्त
परमाणुओंसे दूसरे ही संयुक्त स्वभाववाले परमाणु उत्पन्न होते हैं,
यही मानना समुचित है। अर्थात् परमाणुपुञ्जसे या सहकारिसमूह-
से अतिरिक्त संयोग नहीं है। इस प्रकार क्षणभङ्गवाद सिद्ध हो
जाता है।