आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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असुतत्वनिवृत्तिमात्रस्य स्वरूपेण कृतिज्ञप्त्योरसामर्थ्ये
समर्थमर्थान्तरमध्यवस्यमन-तर्भाव्य कुतो हेतुत्वमिति चेन्न, अचै-
तन्येऽप्यस्य न्यायस्य समानत्वात् । व्याववृत्तिरूपमपि तदेव गमकं
यदतस्मादेव, यथा शिशपात्वम्, वन्ध्यासुतस्त्वसुतादिव घटादेः
सुतादपि देवदत्तादेर्व्यावर्तते अतो न हेतुरिति चेत्, नन्विदम-
चैतन्यमपि अस्यैवरूपमेन, नहि वन्ध्यासुतश्चेतनादिव देवदत्तादे-
रचैतनादिकाष्ठादेर्न व्यावर्तते ।
वक्तृत्वं वस्त्वेकनियतो धर्मः, स कथमवस्तुसाध्यो विरोधा-
दिति चेत्, स पुनरयं विरोधः कुतः प्रमाणात् सिद्धः ? किं
यदि कहो कि—असुतत्वकी निवृत्तिमात्र तो अलीक होनेके कारण
स्वय किसी क्रियाको और किसी ज्ञानको करानेमें असमर्थ है । इसलिये
समर्थ एव अनुभवमे आनेवाले किसी दूसरे पदार्थका अन्तर्भाव किये
बिना यह हेतु कैसे बन सकता है ? —तो ऐसा नहीं कह सकते ।
क्योंकि तुम्हारे अचैतन्य हेतुमे भी यह न्याय समानरूपसे लागू
हो जायगा ।
यदि कहो कि—व्यावृत्ति (निवृत्ति) रूप होकर भी वही बोधक
होता है, जो विजातीयसे ही व्यावृत्त होता है, न कि सजातीयसे भी ।
जैसे शिंशपात्व अपने विजातीय कटहल आदिसे ही व्यावृत्त होता है,
न कि सीसमसे भी । इसलिए वह अपने वृक्षत्वका बोधक हो सकता
है । किन्तु वन्ध्यासुत तो जैसे असुत अर्थात् विजातीय घट आदि से
व्यावृत्त है, वैसे ही देवदत्त आदि सुतसे भी व्यावृत्त है । अत वह
वक्तृत्वका हेतु नहीं हो सकता है—तो निश्चय ही तुम्हारा यह अचैतन्य
हेतु भी इसके समान ही है । क्योंकि ऐसी बात नहीं है कि वन्ध्यासुत
जैसे चेतन देवदत्तसे व्यावृत्त है, वैसे ही काष्ठ आदि अचेतनसे भी
व्यावृत्त न हो ।
यदि कहो कि—वक्तृत्व केवल वस्तुका ही नियत धर्म है, अत.
यह अवस्तु (मिथ्या) भूत वन्ध्यासुतमें कैसे सिद्ध किया जा सकता
है ? क्योंकि वस्तु और अवस्तु परस्पर विरुद्ध हैं—तो बताओ, यह