आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षणभङ्गवादः ५७
न तावत् प्रथमः, नहि विरोधसहस्रेणापि स्थिरे तस्य
क्रमादिविरहे वा प्रत्यक्षमनुमानं वा दर्शयितुं शक्यम्, तथात्वे वा
कृतं भौतकलहेन ।
द्वितीय¹स्त्विष्यत एव प्रामाणिकैः । अवचनमेव तर्हि प्राप्तम्
किं कुर्मो यत्र वचनं सर्वथैवानुपपन्नं तत्रावचनमेव श्रेयः । त्वमपि
परिभावय तावन्निष्प्रामाणिकेऽर्थे मूकवावदूकयोः कतरः श्रेयान्² ।
एवं विदुषापि भवता न मूकीभूय स्थितम्, अपि तु व्यध-
इनमे प्रथम तो हो नहीं सकता है। क्योंकि हजारों विरोधके रहने
पर भी तुम स्थिरभावरूप पक्षमे अथवा उसमें असत्त्वको सिद्ध करने-
वाले क्रमयौगपद्याभावरूप हेतुमे अथवा शशशृङ्गरूप दृष्टान्तमे प्रत्यक्ष
या अनुमान प्रमाण नहीं दिखा सकते हो। यदि दिखा सको तो
भूताविष्टोंकी तरह इस निरर्थक कलहकी क्या आवश्यकता है ?
द्वितीय पक्ष तो प्रामाणिकोंको इष्ट ही है। अर्थात् शशशृङ्गादि
अलीक पदार्थोंमे विधिव्यवहारके समान ही निषेधका भी व्यवहार
हम नहीं ही मानते हैं। "शशशृङ्ग नास्ति" यह जो निषेधव्यवहार
होता है, उसका तो अर्थ यह है कि शशमे शृङ्ग नहीं है। शश भी
सत् है और शृङ्ग भी कहीं सत् है। इसलिये शशमें शृङ्ग नहीं है, ऐसा
व्यवहार होनेमें कोई बाधा नहीं है।
यदि यह कहो कि—तब हमे अलीक पदार्थोंके सम्बन्धमे कुछ नहीं
बोलना चाहिये अर्थात् मौन धारण किये रहना चाहिये—तो क्या करें,
जहा बोलना सर्वथा ही असंगत है, वहाँ न बोलना ही अच्छा है।
स्वय भी तो विचारो कि अप्रामाणिक अर्थके बारेमे मूक रह जानेवाले
और अधिक बोलनेवालेमे कौन अच्छा है ?
यदि कहो कि—ऐसा जानते हुए भी आपसे (मुझसे) मूक होकर
नहीं रहा गया, प्रत्युत असत्मे भी व्यवहारका प्रतिषेधरूप व्यवहार कर
१. द्वितीय स्त्विष्यत—इति पाठ क्वचित् ।
२ कतरः प्रामाणिक—इति १ पु० पाठ