सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 105, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 105

५६ आत्मतत्त्वविवेके
क्तोऽपि, ततो विरोधः स्यात्, इह तु नैवमिति चेत्, हन्त ! संयोग-
संयोगिनोर्भेदपक्षेऽपि यद्यय मसिद्धान्तवृत्तान्तः स्यात् कीदृशो
दोष इति ? एतेन व्यतिरेकपक्षोऽपि निरस्तः ।
अधिकश्च तत्राश्रयहेतुदृष्टान्तसिद्धौ प्रमाणाभावः, अवस्तुनि
प्रमाणप्रवृत्तेः प्रमाणप्रवृत्तावलीकत्वानुपपत्तेः ।
एव तर्ह्यव्यवहारे स्ववचनविरोध स्यादिति चेत्, तत् किं
स्ववचनविरोधेन तेषु प्रमाणमुपदर्शितं भवति ? व्यवहारनिषेध
व्यवहारो वा खण्डित स्यात् ? अप्रामाणिकोऽय व्यवहारोऽव-
श्याभ्युपगन्तव्य इति वा भवेत् ?
इस प्रकार 'जो सत् है वह क्षणिक है' इस अन्वयव्याप्तिके खण्डन-
से 'जो क्षणिक नहीं है वह सत् भी नहीं है, जैसे खरहेकी सींग'
यह व्यतिरेक व्याप्ति भी खण्डित हो गयी ।
बल्कि अन्वयव्याप्तिकी अपेक्षा व्यतिरेकव्याप्तिपक्षमे पक्ष, हेतु
और दृष्टान्तकी सिद्धिमें कोई प्रमाण नहीं हे यह अधिक दोष है।
क्योंकि जो अवस्तु ( असत् ) है, उसमे किसी प्रमाणकी प्रवृत्ति नहीं हो
सकती है और जिसमे प्रमाणोंकी प्रवृत्ति होगी, वह असत् नहीं होगा।
अर्थात् स्थिरभावरूप पक्ष तुम्हारे मतमे अप्रामाणिक है। अक्षणिकत्व
हेतुको तुम सत्में मानते नहीं और असत् अप्रामाणिक ही है। इस
प्रकार हेतु भी अप्रसिद्ध है। साथ ही शशशृङ्गरूप दृष्टान्त भी
अप्रसिद्ध ही है।
( शङ्का ) यदि अप्रामाणिकमे व्यवहार न हो तो सिद्धान्तीको
स्ववचनका विरोध हो जायगा । अर्थात् 'असत्मे अनुमानादिका व्यवहार
^ हो सकता यह कहना भी तो असत्में व्यवहार ही है ।
( उत्तर ) तो क्या मेरे स्ववचनविरोधसे उन असत् पक्षादिकोंमें
प्रामाणिकता आ जाती है ? अथवा व्यवहारके निषेधका व्यवहार
खण्डित हो जाता है ? अथवा-अप्रामाणिक भी यह अनुमान-व्यवहार
अवश्य मानना चाहिये-यह सिद्ध होता है ?