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आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

३६२ | आत्मतत्त्वविवेके


अलीकं वेति ? नाद्यो, दूषितत्वात् । न द्वितीयः, स्वयमनभ्युप-
गमात् । योऽप्यभ्युपगच्छेत् सोऽपि विरुद्धधर्माध्यासाद् भेद-
मिच्छेत्, तन्निवृत्तौ च तन्निवृत्तिम् ।
न तृतीयः, अहमिति विकल्पस्य सवस्तुकतायाः प्रागेव प्रमा-
धनात् । अवस्तुकत्वेऽपि न तत्र प्रकृतोपयोगिभेदाऽग्रहसंभवः,
सदसदारोपितसदारोपितासत्त्वव्यधिकरणाव्यपदेश्यभेदेन षड्विध-
है, या उससे भिन्न कोई दूसरी वस्तु है, अथवा अलीक (मिथ्या)
है ? इनमें आद्यपक्ष नहीं हो सकता । क्योंकि विज्ञानवादका खण्डन
करते हुए पूर्वमे इसका भी खण्डन किया जा चुका है। द्वितीय भी
नहीं होगा । क्योंकि विज्ञानसे अतिरिक्त वस्तुकी सत्ता तुम स्वयं नहीं
मानते हो । यदि मानो तो विज्ञानसे अतिरिक्त एव विज्ञानका विषय-
भूत वह वस्तु ही आत्मा सिद्ध हो जाती है। जो भी विज्ञानसे अतिरिक्त
विषयकी सत्ता मानता है, वह भी उस विषयमें विरुद्ध धर्मोंका अध्यास
होनेपर ही भेद स्वीकार कर सकता है और अध्यासके अभावमे अभेद।
अर्थात् उक्त अहम्प्रतीतियोँका विषय जो विज्ञानातिरिक्त अहमर्थ है,
उसमें विरुद्ध धर्मों की प्रतीति नहीं होनेसे वही एक पूर्वापरमे अभिन्न
आत्मा सिद्ध हो जाता है ।
विषयदृष्टिवाला तीसरा अलीकपक्ष भी नहीं हो सकता है । क्योंकि
"अहम्" इस विकल्पकी सवस्तुकता पहले ही अर्थात् "प्रत्यक्षपृष्ठभा-
बित्वे साक्षादेव सवस्तुक" इत्यादि वचनसे ही सिद्ध की जा चुकी है।
यदि यह विकल्प अवस्तुविषयक हो तो भी वहाँ अभेद-प्रतिसन्धानमें
उपयोगी जो भेदका अग्रह, वह नहीं हो सकेगा । क्योंकि सत् भेद,
असत् भेद, जिसमें सत्ता आरोपित है ऐसा भेद जिसमे असत्ता
आरोपित है ऐसा भेद, व्यधिकरण भेद तथा अव्यपदेश्य भेद ये
छहों प्रकारके भेदका अग्रह नहीं हो सकेगा, जो कि अभेदारोप करा
सके । यह बात भी द्वितीय परिच्छेदमें ही कही जा चुकी है ।
अर्थात् सत्भेदका अग्रह नहीं हो सकता, क्योंकि जो अलीक हैं, उनमें
सत्भेद रह ही नहीं सकता जिसका अग्रह हो । यदि भेदको असत्
मानो तो असत्भेदके अग्रहसे अभेदका ग्रह माननेपर अतिव्या-
प्तिदोष आ जायगा । अर्थात् जहाँ अभेदग्रह नहीं होना चाहिये वहाँ

स्यापि भेदस्याग्रहोऽभेदारोपौपयिकतया तन्न न सम्भवतीत्युक्तत्वा-
दिति ॥
अथवा इहानुभवः१ कालान्तरभाविनीं स्मृतिं जनयेत् ?
•तज्जनितो वा संस्कारः ? सोऽप्यतीन्द्रियः ? प्रत्यक्षसिद्धो वा ?
अतीन्द्रियोऽपि तावत्कालावस्थायी२ ? सन्तन्यमानो वा ?
प्रत्यक्षसिद्धोऽपि तदुत्तरबुद्धिधारारूपः ? तदन्यो वा ? तद्विशेषो
भी अभेदग्रह होने लगेगा । यदि भेदमें सत्त्व आरोपित हो तो उसका
अग्रह नहीं हो सकता । क्योंकि जब आरोप है तो अग्रह कैसा ? भेदमें
असत्त्वका आरोप रहते हुए उसका अग्रह कहो तो भेदमें पारमार्थिकत्व
आ जायगा, क्योकि उसमें असत्त्वको आरोपित मानते हो । इस प्रकार
वह अलीक नहीं हो सकता ।
यदि व्यधिकरण अर्थात् दूसरेके भेदके अग्रहसे अभेदका आरोप
मानो तो जिस किसीके भेदके अग्रहसे घटपटादिमें भी अभेदारोप
होने लगेगा । एव सत्-असत् आदि कोटियोंसे रहित अनिर्वचनीय
भेदके अग्रहसे अभेदारोप माननेमें सर्वत्र अभेदारोपका प्रसङ्ग होने
लगेगा ॥
स्थिर-आत्मसाधनमें अन्य प्रकार
अथवा यह बताओ कि कालान्तरमें होनेवाली स्मृतिके प्रति अनुभव
कारण है ? या अनुभवसे उत्पन्न संस्कार ? वह संस्कार भी अतीन्द्रिय
है ? या प्रत्यक्ष-सिद्ध है ? यदि अतीन्द्रिय हो तो स्मृति उत्पन्न होनेके
समय तक स्थायी है ? अथवा क्षणिक होनेके कारण सन्तन्यमान अर्थात्
धारारूप है ? यदि प्रत्यक्ष-सिद्ध वह संस्कार हो तो यह अनुभवके बाद
होने वाली बुद्धियोंकी धारारूप है ? या उससे भिन्न है ? अथवा
अनुभवोत्तरकालिक बुद्धिधारागत कोई विशेष (धर्म) है ? वह
विशेष भी अनुभवप्रभवत्वमात्र है ? या अनुभवितृसन्तानगत वैजात्य
है ? अर्थात् नीलानुभवके बाद जिन बुद्धियोंका सन्तान जारी रहता
है, सान्तानिकभूत उन बुद्धियोंमें ही रहने वाला वैजात्य अभिप्रेत
१. कि म् इत्यपि क्वचित् पाठः । २. तत्कालावस्थायी इति क्वचित् पाठः ।

३६४ आत्मतत्त्वविवेके
वा ? विशेषोऽप्यनुभवप्रभवत्वमात्रं वा ? अनुभवितृसन्तान-
वैजात्यं वा ?
तत्र न प्रथमः, अनुत्पन्नानन्वयध्वस्तयोर्विशेषात् । नापि
दृश्योऽन्यः, तस्यानुपलब्धिबाधितत्वात् । नाप्यनुभवप्रभवत्व-
मात्रं विशेषः, न हि कर्मकरकरोपनीतमेव बीजं क्षितिमासाद्याङ्कुरं
कुरुते न तु प्रमादपतितम् । तथा नीलाद्यनुभवप्रभवसन्तानः १
है । इसीलिये जिस सन्तानसे पहले नीलानुभव नहीं हुआ है, उसीसे
वैजात्य यहाँ विवक्षित है । अतः जो अननुभूत है, उसका स्मरण-
प्रसङ्ग यहाँ नहीं होगा । यह अन्तिम विकल्पका अभिप्राय है ।
उपर्युक्त पक्षोंमें प्रथमपक्ष नहीं हो सकता है । क्योंकि नहीं उत्पन्न
होना या निरन्वयध्वस्त हो जाना, इन दोनोंमें कोई अन्तर नहीं है ।
अर्थात् चिरकाल पूर्वमें उत्पन्न होकर नष्ट हुआ अनुभव बहुत कालके
बाद होनेवाली स्मृतिका कारण नहीं हो सकता, जो वस्तु अपना प्रति-
निधित्वरूप कोई दूसरी वस्तु पैदा किये बिना ही विलीन हो जाती है,
यह स्वयं भी नहीं पैदा हुएके समान है । अतः पूर्वोत्पन्न नीलानुभवका
निरन्वय-ध्वंस हो जानेके कारण नहीं उत्पन्न हुएके बराबर होनेसे वह
कालान्तरमें नीलकी स्मृति नहीं करा सकेगा । अनुभवके बाद होने-
वाली बुद्धिधारासे अन्य दृश्यभूत संस्कार भी स्मृतिका कारण
नहीं हो सकता है । क्योंकि उपलब्धि नहीं होनेसे उक्त संस्कार ही
बाधित है ।
“अनुभवोत्तरकालिक बुद्धिधारागत जो अनुभवप्रभवत्वमात्रस्वरूप
विशेष है, वही संस्कार है, जो भावी स्मृतिका जनक है” यह पक्ष भी
ठीक नहीं है । क्योंकि यह नियम नहीं है कि श्रमिकके हाथसे समझ
बूझकर डाला हुआ बीज ही पृथ्वीमें पहुँचकर अङ्कुर पैदा करता हो और
प्रमादसे गिरा हुआ न करता हो । वैसे ही नीलानुभव सन्तान (नील-
बुद्धिधारा) पीतानुभवसे ही उपनीत हो या नीलानुभवसे ही उपनीत,
इनमें स्मृति पैदा करनेके सम्बन्धमें कोई विशेषता नहीं है । अर्थात् जैसे
१. नीलाद्यनुभवसन्तानः इति क्वचित् पाठः ।

पीताद्यनुभवेनैवोपपद्यतां नीलाद्यनुभवेनैव वेति न कश्चिद्
विशेषः । एवं चाऽननुभूतेऽपि स्मरणप्रसङ्गो न चानुभूतेऽपीति ।
१शालिप्रभवस्य बीजस्य शालित्व'प्रतिसन्धानवन्नियम इति
चेत्, न, क्षीर-जम्बूरसपायिनील-धवलकलरवजनितविपरीतपारा-
वतवदनियमदर्शनेन तस्याप्रयोजकत्वात् । वैजात्यं तु विशेषो
भवेत्, यथा क्षीरावसेकादम्लत्वं परिहृत्य माधुर्यमुपादानानुवर्त-
अंकुर पैदा करनेमें बीजत्वमात्र प्रयोजक है, और वह किसी भी प्रकार
पृथिवीमें पहुँचकर अङ्कुर पैदा कर देता है, वैसे ही नीलादिविषयकी
स्मृतिमें भी अनुभवप्रभवत्वमात्र ही प्रयोजक है, उसे नील या पीत
विषयविशेषकी अपेक्षा नहीं है । अतः नीलादिविषयक या पीतादि-
विषयक जिस किसी अनुभवसे उपनीत होनेमात्रसे ही स्मृतिका प्रयोजक
हो जायगा । ऐसी स्थितिमें नीलविषयक अनुभवके न होनेपर भी
नीलविषयकी स्मृति होने लगेगी । क्योंकि आप उस स्मृति-प्रयोजक
अनुभवमें विषयविशेषकी अपेक्षा मानते नहीं हैं । यदि स्मृतिके प्रति
अनुभवप्रभवत्वको प्रयोजक न मानें तो अनुभूत विषयकी भी स्मृति
नहीं होनी चाहिये ।
यदि कहो कि—जैसे, शालि ( धान ) प्रभव ही बीज शालि उत्पन्न
करता है, न कि दूसरे यवादिसे उत्पन्न बीज शालि उत्पन्न करता, वैसे ही
नीलातुभवप्रभव ही नीला‌नुभवसन्तान नीलस्मरणका कारण होगा न कि
पीतानुभवप्रभव भी अनुभवसन्तान कारण होगा । अतः पूर्वोक्त अतिप्रसङ्ग
या अप्रसङ्ग-दोष नहीं होगा—तो ऐसा नहीं कह सकते हो । क्योंकि
"तत्प्रभवत्व तादृश प्रतिसन्धानका जनक है" यह नियम व्यभिचरित
है । कारण, क्षीरपान करनेवाले नीले कबूतरसे भी धवल कबूतरका तथा
जामुनका रस पीनेवाले धवल कबूतरसे भी नीलरङ्गके कबूतरका उत्पन्न
होना देखा जाता है । अतः तत्प्रभवत्त्वमात्र तादृश प्रतिसन्धानका
प्रयोजक नहीं हो सकता है ।
अनुभवितृसन्तानगत वैजात्यनामक विशेष तो प्रतिसन्धानका निया-
मक हो सकता है । अर्थात् जिस सन्तानमें नीला‌नुभव पहले नहीं हुआ
१. शालिप्रतिसन्धानवत् इति क्वचित् पाठः ।

Here is the complete, line-by-line transcription of the page into Devanagari:


मानाऽऽमलकी कालान्तरेऽपि फले माधुर्यमुन्मीलयति, लावार-
सावसेकाद् वा धवलिमानमपहाय रक्ततामनुवर्त्तमानं कार्पास-
बीजं कुसुमेषु रक्तताम् । न चैवं प्रकृतेऽपि, जपा१कुसुमाद्यु-
पधानसन्निधानेऽपि२ तद्रूपतामनादाय धवलिमानमेव सन्दधानस्य
स्फटिकस्येव विज्ञानस्य ३विषयोपधानमपगम्य४ चिद्रूपतामात्रेणानु-
वृत्तेः ।
सर्वाकारत्वमेव सर्वज्ञानानां, किन्तु कश्चिदाकारः पकड़में
है, उससे वैजात्य ही नीलस्मरणका नियामक होगा । पीतानुभवसन्तान
ऐसा ही सन्तान है, जिसमें पहले नीलानुभव नहीं हुआ रहता
है । अतः उसका विजातीय सन्तान नीलानुभवसन्तान ही होगा । इस
लिये पीतानुभवके बाद नीलस्मरणका प्रसङ्ग नहीं होगा । जैसे कि
दूधसे सींचनेके कारण अम्लत्व (खट्टापन) को छोड़कर मधुरताको
[

अनुपलब्धवादः ३६७
त्वपटुरिति स्वदर्शनश्रद्धावतो विरुद्धधर्माध्यासादपि न भीः।
न हि स एव पटुरपटुश्चेति सम्भवति। न च स्वसंविदितरूपस्या-
जाड्यार्थं पश्यामः।
निराकारपक्षेऽपि यावानर्थो बुद्धेर्विषयस्तावति स्फुटैव सा। यत्र
चास्फुटा, नासौ तस्य (तस्या) विषयः। तथात्वे वा विषयेतरव्यवस्था
होनेसे उसमें वैजात्य नहीं होता। किंतु एसी बात नहीं है। बल्कि
सभी ज्ञान स्वभावसे ही सर्वविषयाकार होते हैं। और उनमें किसी
आकारके पटु होनेसे स्पष्टरूपसे उस आकारका उल्लेख होता है तथा
किसीके अपटु होनेसे उल्लेख नहीं होता है। अर्थात् ज्ञानोमे विषयकृत
ही वैजात्य होता है। इसीलिये पीतानुभवसे नीलप्रतिसन्धान तथा नीला-
नुभवसे पीतप्रतिसन्धानका प्रसङ्ग भी नहीं होगा—तो ऐसा नहीं कह
सकते। क्योंकि यदि सभी ज्ञान सर्वविषयाकार हों तो प्रत्येक अनुभवमे
नीलादिका उल्लेख होना चाहिये। इसके समाधानके लिये अनुभवको
नीलपी

३६८ आत्मतत्त्वविवेके
न स्यात् । सांशे त्वेवं युक्तमेतदिति दर्शितं प्राक् । तस्मादतीन्द्रियः
संस्कारः परिशिष्यते । स च न सन्तन्यमानः, तत्रैव स्मृत्यादि-
प्रसङ्गे प्रवृत्तिसन्ताने फलानवकाशप्रसङ्गात् । १अन्यत्र संस्कारे-
ऽन्यत्र फलेऽतिप्रसङ्गात् । परम्परैकोपादानतया नियमे
संस्कारान्तरसन्तानेऽपि स्मृतिप्रसङ्गात् ।
युक्त है। क्योंकि उस वस्तुको हम सावयव मानते हैं। साथ ही
अवयवोंमें परस्पर भेद होनेसे मेरे मतमें विरुद्धधर्मका संसर्ग दोष भी
नहीं होगा। क्योंकि भिन्न अवयवको स्फुट कहा जाता है और भिन्न
अवयवको अस्फुट कहा जाता है, न कि एक ही अवयवको स्फुट और
अस्फुट कहते हैं।
अतः अनुभवसे उत्पन्न जो अतीन्द्रिय संस्कार, वही स्मृतिके निया-
मकके रूपमें बच जाता है। किन्तु उस सन्तन्यमान (अस्थायी)
संस्कारको अर्थात् संस्कारके सन्तानको स्मृतिनियामक नहीं मान सकते।
क्योंकि तब संस्कारोंके सन्तानमें ही स्मृति और स्मृतिजन्य इच्छा आदि
फल हो सकेगा तथा प्रवृत्तिविज्ञानके सन्तानमें स्मृत्यादिरूप फल नहीं
हो सकेगा। ऐसी स्थितिमें "अहं घटं स्मरामि" इत्यादि प्रतीति नहीं
हो सकेगी। क्योंकि प्रवृत्तिविज्ञानधाराका अन्तःपाती ज्ञान ही अहमा-
स्पद होता है, संस्कार नहीं।
यदि भिन्न सन्तानोंमें संस्कार मानो और भिन्न सन्तान (प्रवृत्ति-
विज्ञानसन्तान) में स्मृतिरूप फल मानो तो अतिप्रसङ्गरूप दोष हो
जायगा। अर्थात् नीलसंस्कारसे भी पीतस्मरण होने लगेगा।
यदि यह नियम करो कि—परम्परया समान उपादानकारणसे उत्पन्न
संस्कार ही स्मृत्यादि फल उत्पन्न कर सकेगा, अतः अतिप्रसङ्ग दोष नहीं
होगा। अर्थात् एक ही नीलानुभवरूप उपादान-कारणसे संस्कारोंका
भी सन्तान उत्पन्न होता है और प्रवृत्तिविज्ञानोंका भी सन्तान उत्पन्न
होता है। अतः यहाँका संस्कार अपने समान उपादान कारणसे उत्पन्न
होने वाले प्रवृत्तिविज्ञानसन्तानमें स्मृति पैदा करेगा, दूसरे सन्तानमें
१. यदप्यतिप्रसङ्गादिति क्वचित् पाठः ।

अनुपलम्भवादः ३६९
तस्मात् स्वोपादान एव स्मृतिं करोतीति गत्यन्तराभावा-
दापाततिक्तमप्युपेयमेव१ । तथा च स्मृतेः कालान्तरसम्बन्धात्
संस्कारतदुपादानयोः स्थैर्यमयत्नसिद्धमवर्जनीयञ्चेति२ ।
एतेन धर्माधर्मरूपः३ संस्कारो व्याख्यातः । तथा च यो यः
संस्कारः क्वचित् सन्तान आहितः४ स तत्रैव फलाधानयोग्यो
नहीं। अतः यहाँ कोई अनुपपत्ति या आपत्ति नहीं होगी-तो यह भी
नहीं हो सकता। क्योंकि पीतसंस्कारसन्तानका उपादानकारण जो पीतानु-
भव है, वह परम्परया पीतानुभवके बाद कदाचित् होनेवाले नीला नुभव-
जन्यनीलसंस्कारसन्तानका भो उपादानकारण होगा। अत नीलसंस्कार-
सन्तानमें भी पीतस्मरण होने लगेगा।
इसलिए संस्कार अपने उपादानमें ही स्मृति पैदा करेगा-यह बात
आपातत कटु होनेपर भी दूसरा चारा नहीं होनेके कारण माननी ही
पड़ेगी और वह उपादान ही आत्मा है। तथा स्मृतिका, संस्कारके बहुत
बाद, कालान्तरसे सम्बन्ध होनेके कारण संस्कार और उसके उपादानका
स्थैर्य (स्थायित्व) भी बिना प्रयासके ही सिद्ध हो गया और वह
अनिवार्य भी है। अर्थात् अनुभवके अनन्तर वर्षों बाद भी होती हुई
स्मृति संस्कारकी और उसके उपादानकारण आत्माकी स्थिरताको
पक्षधर्मताब्रलसे स्वतः सिद्ध कर देती है।
इसीसे धर्माधर्मरूप संस्कारकी भी व्याख्या हो गयी। अर्थात् यज्ञ
और हिंसा आदिसे उत्पन्न जो धर्म-अधर्मरूप संस्कार, वे भी स्वयं के
और अपने उपादानकारण (आत्मा) के स्थिरत्वके बिना कालान्तरमे होने
वाले स्वर्ग-नरकादि फलके जनक नहीं हो सकते हैं। अतः उस दृष्टिसे
भी स्थिर आत्माकी सिद्धि होती है।
इसी प्रकार "जो जो संस्कार जिस किसी सन्तानमें आधित रहता
है, वह उसीमें स्मृतिरूप फलको उत्पन्न करनेके योग्य होता है, अन्यत्र
नहीं" इत्यादि कथन भी खण्डित हो गया। क्योंकि बुद्धिधारासे अति-
१ अभ्युपेयमिति क्वचित् पाठः २ च इति क्वचित् पाठः
३ धर्माधर्मेक्षण इति २ पु० पा० ४ संतानेनोपहित इति २ पु० पा०

३७० आत्मतत्त्वविवेके
नान्यत्रेत्याद्यपि निरस्तम् । अतिरिक्तसंस्कारपक्षे हेतोर्व्यधि-
करणत्वात्, विशेषलक्षणस्य च स्वरूपासिद्धत्वात्, अविशिष्टोत्तर-
कार्यप्रवाहमात्रस्य च विरुद्धत्वादिति ।
न चातीन्द्रियोऽपि संस्कारः सौगतनये संभवति । तस्य ज्ञान-
त्वे परोक्षत्वानुपपत्तेः, अज्ञानत्वे ज्ञानोपादानकत्वायोगात्,
सन्तानान्तरत्वे ज्ञानस्यापि पारोक्ष्ये तदन्तःपातिनः स्मृतिसुखादे-
रिक्त संस्कारपक्षमें संस्कारत्व-हेतु व्यधिकरण (आश्रयासिद्ध) हो
जायगा । अर्थात् “संस्कार-, स्वसन्ताने स्मृतिजनकः, संस्कारत्वात्” इस
अनुमानमें संस्काररूप आश्रय (पक्ष) असिद्ध है । क्योंकि तुम
संस्कारको मानते नहीं हो । अथवा यहा हेतुके व्यधिकरण होनेका
अभिप्राय यह है कि स्वसन्तानगत संस्कार स्वसन्तानमें ही स्मृति उत्पन्न
कर सकता है, न कि प्रवृत्तिविज्ञानसन्तानमें, क्योंकि प्रवृत्तिविज्ञानसन्तान
संस्कारका अधिकरण नहीं है ।
यदि संस्कारत्वको ज्ञानगत-जातिविशेषस्वरूप मानो तो संस्कारत्वहेतु
स्वरूपासिद्ध हो जायगा । क्योंकि तुम्हारे मतमें कोई भी जाति होती ही
नहीं है और मेरे मतमें भी ज्ञानमे संस्कारत्व-जाति नहीं होती है । यदि
सस्कारका अर्थ अनुभवके बाद होनेवाला अविशिष्ट (सामान्यत) कार्य-
प्रवाहमात्र लो तो यह विरुद्ध होगा । अर्थात् नीलानुभवोत्तरकार्यप्रवाहके
अन्तर्गत नीलानुभवके बाद होनेवाला घटपटादिका सन्तान भी गृहीत
होने लगेगा, किन्तु घटपटादिका सन्तान स्मृतिरूप फल उत्पन्न करता नहीं
है । अतः उक्त प्रकारका संस्कार स्मृतिरूप फलके विरुद्ध है ।
एवं बौद्धमतमें अतीन्द्रिय स्थिर संस्कार प्रतिसन्धानका नियामक
नहीं हो सकता है । क्योंकि उस संस्कारको ज्ञानस्वरूप मानें तो वह
परोक्ष (अतीन्द्रिय) नहीं हो सकता है । कारण, बौद्धमतमे सभी
ज्ञान स्वप्रकाश होनेसे प्रत्यक्ष होते हैं । यदि उस संस्कारको ज्ञानसे
भिन्न मानें तो उसका उपादान-कारण ज्ञान नहीं हो सकेगा ।
यदि उस संस्कारको ज्ञानका सन्तानान्तर मानें तथा उस ज्ञानको भी
परोक्ष मानें, अर्थात् घट मं ... ज्ञान ... हो तो उस ...

रपि तथाभावप्रसङ्गादिति । तदिदमुक्तरूपं प्रतिसन्धानं निमित्त-
वत्तया व्याप्तम् , अनिमित्तकत्वे नियमानुपपत्तेः । तच्चानेककर्तृ-
कत्वे नास्तीति व्यापकानुपलब्ध्या विपक्षान्निवर्तमानं निमित्तव-
त्त्वेककर्तृकत्वे विश्राम्यतीति प्रतिबन्धसिद्धिः ।
एवञ्च सति अन्वयोऽपि नर्तकीभ्रूलताक्षेपादौ द्रष्टव्यः ।
सैव हि भ्रूलता, त एव वा परमाणवः प्रतिसन्धीयमाना नाना-
ज्ञाननिमित्तत्वेऽवस्थिताः । विरुद्धधर्मविरोधिविषयत्वेन तु विशेष-

ज्ञानसन्तानके अन्तःपाती स्मृति-सुख आदि भी अतीन्द्रिय होने लगेगा
और उसका प्रत्यक्ष नहीं हो सकेगा ।
इस प्रकार पूर्वापर प्रतीतियोंके एकाश्रयत्वका अवगाहन करनेवाला
तथा पूर्वानुभूत अर्थका अवगाहन करने वाला प्रतिसन्धान ( प्रत्यभिज्ञा
तथा स्मरण ) निमित्तवत्तासे व्याप्त है अर्थात् उक्त प्रतिसन्धानका अवश्य
कोई निमित्त है । बिना निमित्तका हो तो प्रतिसन्धानका कोई नियम

णीयमत्र प्रतिसन्धानम् । अन्यथा य एव बालस्त्वया दृष्टः, स
एव युवा मया दृश्यत इत्यनेनानैकान्तात् ।
१न चासिद्धमिदं विशेषणं देहस्यैव चेतनत्वात् । मैवं ।
देहत्वमूर्तत्वभूतत्वरूपादिमत्त्वादिभ्यः । न च भूतानां समुदाये
पर्यवसिते चैतन्यम्, प्रतिदिनं तस्यान्यत्वे पूर्वपूर्वदिवसानुभूत-
स्यास्मरणप्रसङ्गात् ।
अभेदकी सिद्धि नहीं होगी । अतः अभेदसाधक प्रतिसन्धानमे विरुद्ध
धर्मरहितविषयकत्वरूप विशेषण देना चाहिये । यदि ऐसा विशेषण
नहीं दिया जायगा तो—जिसे तूने बालक देखा था, उसे ही मैं युवा देख
रहा हूँ—यहा भी अभेद प्रतिसन्धान होनेसे विषय तथा दोनों आत्माओं
में अभेद सिद्धि होने लगेगी । अर्थात् यहाँ दृश्यांशमे बालत्व और
युवत्वरूप विरुद्धधर्मका अध्यास होनेसे विषयांशमें अभेद नहीं होता है
तथा द्रष्टाके अंशमे भी त्वया और मयाके रूपमे विरुद्ध धर्मका अध्यास
होनेसे द्रष्टाके अशमें भी अभेद नहीं होता है । तात्पर्य यह है कि
“योऽहं घटमद्राक्षम् सोऽहं स्पृशामि” यह प्रतिसन्धान ही स्थिर आत्मा-
की सत्तामे प्रमाण है, क्योंकि यहाँ विरुद्ध धर्म आदि कोई बाधक
नहीं है ।
यदि कहो कि—विरुद्धधर्मरहितविषयत्वरूप विशेषण आत्माके
सम्बन्धमे असिद्ध है, क्योंकि देह ही चेतन आत्मा है, और उसमें
परिमाणभेदसे प्रतिदिन विरुद्धधर्मका अध्यास हुआ करता है—तो ऐसा
नहीं कह सकते हो । क्योंकि देहत्व, मूर्तत्व भूतत्व तथा रूपवत्त्व आदि
हेतुओंसे देहमें चेतनत्वका अभाव ही सिद्ध होता है । अर्थात् ‘देहो
न चेतन , मूर्तत्वात्, भूतत्वात्, रूपवत्त्वात्, रसवत्त्वात् पृथिव्यादिवत्’
इत्यादि अनुमानोंसे शरीर अचेतन ही सिद्ध होता है । अत देहको
चेतन आत्मा नहीं कह सकते ।
एव देहको चेतन माननेमें देहगत भूतसमुदायमे चैतन्य नहीं हो
सकता, क्योंकि देहगत भूतसमुदायके प्रतिदिन बदलते रहनेके कारण
पूर्वदिनमें अनुभूत वस्तुका दूसरे दिन स्मरण नहीं हो सकेगा । क्योंकि
१ नचासिद्धम् इति पाठो युज्यते ।

न्तरेण"? No.
Let's look at the letter between 'षा' and 'न्त':
It has a top bar, a vertical right stem, and a loop to the left: looks like 'म' or 'य'!
Wait, if it is 'य': "इच्छाद्वेषाद्यन्तरेण" (from इच्छाद्वेषादि + अन्तरेण = इच्छाद्वेषाद्यन्तरेण)!
YES! "इच्छाद्वेषादि" (desire, aversion, etc.)!
इच्छाद्वेषादि + अन्तरेण = इच्छाद्वेषाद्यन्तरेण!
Look at the Hindi:
L14-15: "क्योंकि इच्छा या द्वेषके बिना प्रवृत्ति नहीं होती..."
Wait, does it say आदि? No, "इच्छा या द्वेषके बिना". But in Sanskrit "इच्छाद्वेषाद्यन्तरेण" or "इच्छाद्वेषमन्तरेण"?
Wait, if it's "इच्छाद्वेषमन्तरेण", why would there be an 'ा' on 'ष'?
Look at 'ष': it is 'षा'! It clearly has an aa-kāra mātrā: षा!
Wait, does it have an aa-kāra?
Let's compare 'ष' in 'विशेषे' (L2):
'वि शे षे' -> षे has an e-mātrā.
Here: 'द्वे षा'?
Wait, look at the top

३७४ आत्मतत्त्वविवेके
प्रवृत्त्यन्तानां कार्यकारणभावस्य इहैव जन्मनि निश्चितत्वात्,
तथा च तदभावे तदभावस्य सुलभत्वात् । अन्यथा त्वतिप्रसङ्गात् ।
अतएव नेन्द्रियाणि१ चेतयन्ते, दर्शनस्पर्शनाभ्यामेकार्थ-
ग्रहणाच्च ।
न च मनस्तथा, तस्य करणत्वेनैवानुमानादिति प्रतिबन्ध-
सस्कारका अभाव, उसके अभावमे व्याप्तिस्मरणका अभाव, उसके
अभावमें इष्टसाधनतानुमितिका अभाव, उसके अभावमे स्तन्यपानकी
इच्छाका अभाव, तथा इच्छाके अभावमें प्रवृत्तिका अभाव न्यायसिद्ध
है। यदि कारणके अभावमे भी कार्यकी उत्पत्ति मानी जाय तो सर्वत्र
कार्योत्पत्ति होने लगेगी तथा सभी कार्य आकस्मिक होने लगेंगे ।
उक्त प्राथमिक प्रवृत्तिकी अनुपपत्तिसे ही इन्द्रिया भी चेतन आत्मा
नहीं हो सकती हैं । अर्थात् इन्द्रियोंको चेतन माननेपर जन्म होनेके
वाद प्रथम-प्रथम देखने, सुनने, छूने या कुछ पकड़ने आदिमे जो बालक
की प्रवृत्ति होती है, वह नहीं हो सकेगी। क्योंकि इस जन्ममें उस
इन्द्रियको कुछ अनुभव नहीं होनेसे प्रवृत्तिका हेतु इष्टसाधनताज्ञान
अभी हुआ नहीं है । एव दर्शन और स्पर्शनकेद्वारा एक ही वस्तुका
ज्ञान होनेसे भी सिद्ध होता है कि इन्द्रियाँ चेतन नहीं हैं, किन्तु
उनसे अतिरिक्त नित्य आत्मा ही चेतन है । अर्थात् जिसे मैंने देखा
था, उसे छू रहा हूँ, अथवा जिसे छुआ था, उसे देख रहा हूँ—इस
प्रकार नेत्रसे दृष्ट वस्तुका त्वचासे और त्वचासे छुई गयी वस्तुका नेत्रसे
प्रतिसन्धान होता है, यह प्रतिसन्धान इन्द्रियोंसे अतिरिक्त स्थिर चेतन
माने विना सम्भव नहीं है । कारण, दूसरेसे दृष्टका दूसरेद्वारा प्रति
सन्धान नहीं हो सकनेसे नेत्रसे दृष्टका त्वचासे कथमपि प्रतिसन्धान
नहीं हो सकेगा । स्थिर चेतन आत्मा माननेपर तो नेत्रसे देखनेवाला
भी वही है और त्वचासे छूनेवाला भी वही है । इसलिये उक्त प्रति
सन्धानके होनेमें कोई अनुपपत्ति नहीं है ।
एवं मनको भी चेतन (ज्ञानका कर्त्ता) नहीं कह सकते । क्योंकि
१ इन्द्रियाणि न चेतयन्ते इति क्वचित् पाठ ।

सिद्धिः, परलोक्यात्मसिद्धिश्च । अनादिश्चासौ वीतरागजन्मा-
दर्शनात् ।
अनन्तश्च मतोऽनादित्वात् । द्रव्यं च समवायिकारणत्वात् ।
विभुश्च नित्यद्रव्यत्वे सत्यमूर्तत्वात् । अमूर्तश्च निष्क्रियत्वात् ।
निष्क्रियश्च नित्यत्वे सति अस्मदादिप्रत्यक्षत्वात्, प्रत्यक्षधर्माश्रय-
त्वाच्चेति ।
अनुमानद्वारा मनकी सिद्धि ज्ञानके प्रति करणके रूपमे ही होती है न
कि ज्ञानके कर्त्ताके रूपमे, इसप्रकार देहत्व, इन्द्रियत्व और मनस्त्वमें
अचेतनकी व्याप्ति सिद्ध हो जाती है । साथ ही पूर्वजन्मके अनुभवके
बिना प्रथम प्रवृत्तिकी अनुपपत्तिके कारण पूर्वजन्ममें रहनेवाले परलोकी
आत्माकी भी सिद्धि हो जाती है । एव वह चेतन आत्मा अनादि भी
सिद्ध होता है । क्योंकि रागशून्य कोई भी प्राणी उत्पन्न नहीं होता है ।
अर्थात् जन्मते ही विषयमे राग पूर्वजन्मके अनुभवके कारण होता है
और उस जन्ममे जन्मते ही जो राग होता है, वह उससे भी पूर्वजन्मके
अनुभवके कारण होता है । इस प्रकार पूर्व-पूर्व जन्ममे आत्माकी सत्ता
सिद्ध होनेसे वह अनादि भी सिद्ध हो जाता है ।
एव, वह चेतन आत्मा अनन्त भी है । क्योंकि वह भाव वस्तु होते
हुए अनादि है । और वह ज्ञान इच्छा आदिका समवायिकारण होने
से द्रव्य भी है । क्योंकि द्रव्य ही किसीका समवायिकारण होता है ।
वह चेतन आत्मा विभु (व्यापक) भी है । क्योंकि वह नित्य द्रव्य
होते हुए अमूर्त है । और वह अमूर्त भी इसलिये है कि वह क्रिया
रहित है । क्योंकि जिसमें क्रिया होती है, वही मूर्त होता है । और
निष्क्रिय भी इसलिये है कि वह नित्य होते हुए हम लोगोंके प्रत्यक्षका
विषय है तथा प्रत्यक्षगुणोंका आश्रय है । अर्थात् आत्माका और उसमें
रहनेवाले ज्ञान सुखादि गुणोंका हमलोगोंको प्रत्यक्ष होता रहता है और
वह आत्मा नित्य भी है । क्योंकि जो नित्य होता है और जिसका
तथा जिसके गुणोंका प्रत्यक्ष होता है, वह निष्क्रिय होता है—ऐसा
नियम है ॥

३७६ आत्मतत्त्वविवेके
तर्काश्चात्र भवन्ति—आदिमत्त्वे प्रथमप्रवृत्त्यनुपपत्तौ सर्वथै-
वापवृत्तिप्रसङ्गः । सान्तत्वेऽनादेः सत्त्वानुपपत्तिप्रसङ्गः । अद्र-
व्यत्वे निर्गुणत्वप्रसङ्गः । अविभुत्वे दहनपवनादेः क्रियानुपपत्ति-
प्रसङ्गः¹ ।
न च संयुक्तसंयोगात्तदुत्पत्तिः, साक्षात् क्रियावद्द्वारकस्य
तस्याभावात् । अतथाभूतस्य च तद्धेतुत्वेऽतिप्रसङ्गात् ।
उक्त अनुमानोंमें विपक्षबाधक तर्क
उक्त अनुमानोंमें विपक्षबाधक तर्क भी हैं । जैसे, आत्मा यदि
आदिमान् हो तो जन्मकालिक प्रथम प्रवृत्ति नहीं हो सकनेके कारण उसमें
सर्वथा ही प्रवृत्तिका अभाव होने लगेगा । आत्मा यदि सान्त हो तो
अनादि होते हुए सान्त होनेके कारण वह भाव वस्तु नहीं हो सकेगा,
जैसे प्रागभाव । आत्मा यदि द्रव्य न हो तो वह निर्गुण हो जायगा ।
यदि अव्यापक हो तो अग्नि-पवन आदिमें क्रियाकी उत्पत्ति नहीं हो
सकेगी । अर्थात् नानादिग्वर्ती पवनादिमें अदृष्टवाले आत्माके संयोगसे
ही एकसाथ क्रियाकी उत्पत्ति होती है । आत्माके अव्यापक होनेपर
न सबमें एक साथ आत्माका संयोग हो सकेगा और न उनमें एक साथ
क्रियाकी उत्पत्ति हो सकेगी । किन्तु देखा यह जाता है कि एक ही
साथ अग्नि, पवन, जल आदिमें क्रिया होती रहती है । अतः सबमें
एक साथ संयोग होनेके लिये आत्माका व्यापक होना अनिवार्य है ।
यदि कहो कि—साक्षात् संयोग नहीं होनेपर भी संयुक्तसंयोगसे
पवनादिमें क्रियाकी उत्पत्ति हो जायगी । अर्थात् शरीरवृत्ति अविभु
आत्मासे संयुक्त आकाश और उससे संयुक्त होनेसे पवनादिमें क्रिया
होगी—तो ऐसा नहीं हो सकता । क्योंकि साक्षात् क्रियावान्‌के द्वारा
वह क्रिया नहीं हो रही है । अर्थात् संयुक्त संयोगसे जहा क्रिया होती
है, वहाँ क्रियावान्‌के द्वारा ही होती है । जैसे, सँडसीकी क्रियासे लोहे
में क्रिया होती है । देहसंयुक्त होनेपर भी पवनादिमें क्रिया नहीं हो
सकेगी । क्रिया रहितके साथ संयोग भी यदि क्रियाका जनक हो तो
शरीरसंयुक्त आकाशके संयोगसे जहाँ तहाँ क्रिया होने लगेगी ।
१ क्रियानुत्पत्तिप्रसङ्ग इति क्वचित् पाठ ।

अनुपल. भवा१० ३--
मूर्तत्वे नित्यस्यास्मदादिप्रत्यक्षधर्मानाधारत्वप्रसङ्गः, विशेष-
गुणवतापारम्भकत्वप्रसङ्गश्च । सक्रियत्वे मूर्तत्वप्रसङ्ग इति
शास्त्रार्थसंग्रहः ।
अणुरेवासौ, विज्ञानामवायिकारणसंयोगाधारत्वान्मनोवत् ।
अणीयांसमणोरपीति बाधप्रतिरोधाविति१ कश्चित् । तदयुक्तम्,
आत्मन्यविभौ मनसोऽणुत्वासिद्धेः, तत्संयोगक्रमादेव क्रियाक्रमो-
पपत्तेः । आगमस्तु 'महतोऽपि महीयांसम्' इति प्रथमपादमप-
एवं आत्मा यदि मूर्त हो तो नित्य होते हुए मूर्त होनेके कारण हम
लोगोंसे प्रत्यक्ष होने योग्य सुख ज्ञान आदि गुणोंका वह आश्रय नहीं हो
सकेगा । जैसे नित्य एव मूर्त परमाणुओंके गुणोंका प्रत्यक्ष नहीं होता
है । साथ ही मूर्त होते हुए विशेषगुणवान् होनेके कारण द्रव्यका
आरम्भक भी होने लगेगा । जैसे, पृथिवी आदिका परमाणु द्वयण-
कादिका आरम्भक होता है ।
किसीका मत है कि—यह आत्मा अणु है, न कि विभु । क्योंकि
ज्ञानका असमवायिकारण जो सयोग, उसका वह आधार है, जैसे मन ।
अर्थात् ज्ञानका असमवायिकारण आत्म मन सयोग होता है, अतः उस
सयोगका आश्रयभूत मन जैसे अणु है, वैसे ही उसका आश्रयभूत
आत्मा भी अणु ही है । इस अनुमानसे विभुत्वानुमानका प्रतिरोध
हो जायगा । एवं "अणीयासमणोरपि" इस श्रुतिद्वारा बाध भी हो
जायगा—किन्तु उक्त मत अयुक्त है । क्योंकि आत्मा यदि विभु न हो
तो मनका अणुत्व ही नहीं सिद्ध हो सकेगा । कारण, आत्माके विभु
होनेके कारण युगपत् अनेक ज्ञानोंकी उत्पत्ति होने लगेगी, वैसा न हो,
इसीलिये मनकी सिद्धि की जाती है, ताकि अणु-मनके क्रमिक संयोगके
कारण ज्ञान भी क्रमसे ही हो । यदि आत्मा ही अणु हो तो आत्माके
क्रमिक-संयोगसे ही क्रमिक ज्ञान क्रियाकी उपपत्ति हो जायगी, फिर मन
को अणु सिद्ध करना ही असंभव हो जायगा । एव उक्त आगमका जो
प्रमाणके रूपमे उपन्यास किये हो वह भी "महतोऽपि महीयांसम्" इस
१ 'बाधविरोधादिति' इति क्वचित् पाठः ।

३७८ आत्मतत्त्वविवेके
द्वायोपन्यस्तस्तदलमननेन ।
स्यादेतत्, सिद्धोऽप्ययमीदृशो हेय एव । आत्मदर्शी हि
तदुपकारिणि रज्यते, तदपकारिणं च द्वेष्टि । रागद्वेषौ च मूलं
संसारस्य । यस्तु न तं पश्येन्, नासौ तदुपकारापकारिणमपि ।
ततो न रज्येत, न द्विष्यात्, न संसरेदिति जाङ्गलिकेन ( विष-
विद्यावता ) नैर्विष्यवत् मुमुक्षुणापि नैरात्म्यमेव भावनीयमिति
चेत्—न, अनात्मदर्शिनो मुमुक्षुत्वव्याघातात् । न ह्यात्मानम-
प्रतिसन्धाय कश्चिद् दुःखं हातुमिच्छेत् सुखं वाऽवाप्तुम् । मया
१स्वर्गापवर्गफलभागिना भवितव्यमित्यभिप्रायस्य यावदभियोगमनु-
प्रथमपादको छोडकर किये हो, किन्तु ऐसा न करो । अर्थात् प्रथम-
पादस्थ आगमसे विरोध होनेके कारण अणुत्वप्रतिपादक आगम आत्मा
की दुर्बोधता सूचित करनेके लिये है ।।
आत्माका उपादेयत्वनिरूपण
( पूर्वपक्ष ) अस्तु, प्रमाणोंसे सिद्ध हुआ भी इस तरहका आत्मा हेय
( त्याज्य ) ही है । क्योंकि आत्माका ज्ञान रखनेवाला व्यक्ति उसके
उपकारीके प्रति राग रखेगा और उसके अपकारीके प्रति द्वेष करेगा और
ये राग और द्वेष ही संसारके मूल हैं । जो तो ऐसे आत्माका ज्ञान नहीं
करेगा, वह उसके उपकारी और अपकारीको भी नहीं जानेगा और न
उसमें राग करेगा, या न द्वेष करेगा और न आवागमनरूप संसारमें
बँधेगा । अत जिस प्रकार विषवैद्य विषमे भी नैर्विष्य ( औषध ) की
भावनासे ही चिकित्सा करता है, वैसे ही मोक्षकी कामनावाले व्यक्तिको
भी नैरात्म्य ( आत्माका अभाव ) की ही भावना करनी चाहिये ।
समाधान—इस तरहकी बात नहीं कह सकते । क्योंकि जो आत्म-
दर्शी नहीं होगा वह मुमुक्षु ( मोक्षाभिलाषी ) भी नहीं हो सकता है ।
अर्थात् जो दुःखयुक्त आत्माको जानेगा, वही उसके दुःखनाशरूप मोक्षकी
इच्छा करेगा । आत्माका प्रतिसन्धान किये बिना न कोई दुःखको
१. स्वर्गापवर्गपद सुखदुःखाभावपरे इति आधारग्रन्थ टिप्पणी ।

अनुपलम्भवादः ३ *
वृत्तेः। अननुवृत्तावभियोगनिवृत्तौ फलासिद्धेः।
इत्थञ्च नैरात्म्यदृष्टिर्नास्तिक्यं दृढयेत्। तच्च प्रबलविषय-
तृष्णानिष्णतं१ मनर्थमनन्तं प्रसुवीत। न चेदेवम्, कुतो "याव-
ज्जीवेदि"त्यादयो निःशङ्कमुल्लापाः२।
यदुक्तमुपकारिणि रज्येत अपकारिणं द्विष्यादिति, तदेवमे-
तत्। यो हि मोक्षमुपकारं मनुते, स तद्धेतौ रक्तः, तमुपाददानः
तत्परिपन्थिनं द्वेषादलंप्रत्ययाद्वा परिहरन्नेव समीहितं समासाद-
छोड़नेकी इच्छा करेगा और न सुखको पानेकी। मैं स्वर्ग और अपवर्ग
फलका भागी बनूँ यह इच्छा तबतक बनी रहती है, जबतक कि सुख
पाने और दुःख छोड़नेका प्रयत्न जारी रहता है। उक्त इच्छाकी
अनुवृत्ति नहीं रहनेपर प्रयत्न की भी निवृत्ति हो जायगी और प्रयत्नके
अभावमें स्वर्गादि फल भी नहीं सिद्ध हो सकेगा। अर्थात् उक्त फलेच्छा
से सिद्ध होता है कि आत्मतत्त्वका ज्ञान अनिवार्य है।
एवं, यह नैरात्म्यबुद्धि नास्तिक्यको अर्थात् 'न परलोक है और न
कर्मफल होता है' इस तरहके निश्चयको और दृढ़ करेगा तथा वह
नास्तिक्य प्रबल विषय-तृष्णासे भरे हुए अनन्त अनर्थोंको उत्पन्न करेगा।
यदि ऐसा न करता तो क्यों--
"यावज्जीवेत् सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत्।
भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः।"
इत्यादि निःशङ्क प्रलाप होते ? अर्थात् नास्तिक्यके कारण उत्पन्न
विषय-तृष्णाकी वजहसे ही उक्त प्रलाप नास्तिकोंकी ओरसे किये
जाते हैं।
और जो यह कहा कि--आत्माका प्रतिसन्धान करनेवाला व्यक्ति
आत्माके उपकारीके प्रति राग करेगा और अपकारीके प्रति द्वेष करेगा--
तो यह ऐसा ही है। अर्थात् उक्त कथन ठीक ही है। क्योंकि जो
मोक्षको उपकारके रूपमें मानता है, वह मोक्षके हेतुमें रागवान् होकर
उसे ग्रहण करता हुआ तथा उसके बाधकको (भोगेच्छाको) द्वेषबुद्धि
१. सम्प्लुतम् इति १ पु० पा० । २. निःशङ्कप्रलापाः इति १ पु० पा०

३८० आत्मतत्त्वविवेके
येत, न तु विपर्ययात् । यस्तु भोगम्, सोऽपि तथा, इत्यनुकूल-
मेव प्रतिकूलत्वेन गृहीतं मन्दैः । अन्यत्रानुरज्येत, अन्यत्रापि
द्विष्यादिति न दृष्टं गोवैद्यकेऽपीति ।
तथापि दुःखहेतुत्वादिन्द्रियादिवदसौ हीयतामिति चेत्,
यादृशो दुःखहेतुस्तादृशो हेय एव, सोपाधिश्च तथा । निरुपाधि-
रपि हीयतामिति चेन्न, अशक्यत्वात् , निष्प्रयोजनत्वाच्च । न
या अलंबुद्धिसे दूर करता हुआ अपने अभीष्ट ( मोक्ष ) को प्राप्त कर
सकता है, न कि इसके विपरीत भोगोंके सेवनसे ।
एवं, जो तो भोगको अपने उपकारके रूपमे मानता है, वह भी
वैसा ही करता है । अर्थात् भोगानुकूलमें राग करता हुआ तथा भोगमे
बाधकका परिहार करता हुआ ही अपने अभीष्ट भोगको प्राप्त कर सकता
है । अत यह राग और द्वेष तो अभीष्टके ही साधक हैं । किन्तु
मन्दबुद्धियोंने अनुकूलको ही प्रतिकूलके रूपमें समझ लिया है । अन्यत्र
अर्थात् जो अभीष्ट नहीं है उसमें यदि राग हो तथा जो अभीष्ट हो
उसीमें द्वेष हो तो वह राग और द्वेष प्रतिकूल हो सकता है । किन्तु
ऐसा तो गो-चिकित्सकमे भी नहीं देखा जाता है । क्योंकि गौका चीरना
फाड़ना महान् अनर्थका कारण है, फिर भी चिकित्सक उसे रोगसे मुक्त
करनेके उद्देश्यसे उसकी शल्य-चिकित्सा करता ही है और उसका पाप
उस चिकित्सकको नहीं लगता है । उसी प्रकार राग-द्वेष भी स्वरूपतः
अनर्थका हेतु नहीं होता है, यदि उसका उद्देश्य कल्याणमय हो ।
अतः मुक्तिमें राग करना और उसके प्रतिबन्धकमें द्वेष करना उचित
ही है ।
फिर भी दुःखका हेतु होनेके कारण इन्द्रिय विषय तथा देहादिके
समान यह आत्मा त्याज्य होगा, ऐसा यदि कहो तो जिस तरहका आत्मा
दुःखका हेतु है, वैसा त्याज्य ही है । और शरीर-इन्द्रिय आदि उपाधिसे
युक्त ही आत्मा दुःखका हेतु है । यदि कहो कि-उपाधि विहीन शुद्ध
आत्मा भी त्याज्य होगा-तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि उपाधि-
रहित आत्माका त्याग असंभव है और निष्प्रयोजन भी है । क्योंकि

अनुपलम्भवादः ३८१
हि तस्य हानं विनाशो, नित्यत्वात् । नापि विप्रयोगो, व्यापक-
त्वात् । नाप्यप्रतिपत्तिः, यथा यथा तदर्थं यत्नः, तथा तथा
प्रतिपत्तेः । उपेक्षात इति चेत्, कृतैवैतावन्तं कालमुपेक्षा,
तथापि तद्धानासिद्धेः ।
निष्प्रयोजनं चैतत् , सोपाधेर्हि त्यागो दुःखहानाय, निरु-
पाधेस्तु किमर्थम् ? पुनः सोपाधित्वशङ्कया इति चेत्, न, बीजा-
भावादिति । कुतः पुनरुपादेयः ? तथा मति भावनाक्रमेण
उसके त्यागका अर्थ उसका विनाश नहीं है, क्योंकि यह नित्य है । त्याग
का अर्थ दूर हो जाना या व्यवहित हो जाना भी नहीं है, क्योंकि आत्मा
व्यापक है । अप्रतीतिको भी आत्माका त्याग नहीं कहा जा सकता ।
क्योंकि अप्रतीतिरूप त्यागके लिये जैसे जैसे यत्न किया जायगा, वैसे
वैसे उसकी प्रतीति ही होती जायगी । यदि कहो कि—उपेक्षासे अप्रतीति
की सिद्धि हो जायगी, अर्थात् आत्माकी प्रतीतिके लिये कोई यत्न ही
नहीं किया जायगा, अतः उसकी अप्रतीति स्वतः हो जायगी—तो आपने
इतने समय तक आत्मज्ञानके प्रति उपेक्षा की ही, फिर भी आत्माका हान
( अप्रतीति ) नहीं सिद्ध हुआ । अर्थात् "अहं गौरः अहं सुखी ' इत्यादि
ज्ञानकी धारा चलती ही रहती है । अतः आत्माका त्याग किया जाना
प्रत्येक दृष्टिसे अशक्य है ।
एवं निरुपाधिक आत्माका हान निष्प्रयोजन भी है । क्योंकि
सोपाधिक आत्माका त्याग दुःखसे छुटकारा पानेके लिये अपेक्षित है,
किन्तु निरुपाधिक आत्माका त्याग किसलिये अपेक्षित है ? यदि कहो
कि—सोपाधिककी आशङ्कासे अर्थात् शरीर-इन्द्रिय आदि उपाधिका
भविष्यमे पुनः संसर्गे हो जानेकी आशङ्कासे निरुपाधिक आत्माका भी
त्याग अपेक्षित है—तो यह नहीं कह सकते । धर्माधर्म या मिथ्याज्ञान-
रूप बीजका अभाव हो जानेसे ही आत्माको पुनः शरीरग्रहणकी आशङ्का
नहीं रहेगी ।
यदि यह पूछो कि—आत्मा यदि हेय नहीं है तो उपादेय ( ग्राह्य )
भी क्यों है ?—तो इसका उत्तर यह है कि न्यायके अनुसार आत्माका