आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
३८२ आत्मतत्त्वविवेके
निःश्रेयससिद्धेः । किमस्योपादानम् ? विवेकः । कुतः ?
अनात्मनः शरीरादेः ।
किं पुनरत्र प्रमाणम् ? न्यायः, आम्नायश्च । शरीरमेव
हि तारतम्याभिषिक्तमनात्मान मन्यमानस्य तदुपादाय तदनुकूल-
त्रैलोक्यविषया तृष्णा विजृम्भते, तथा तत्प्रतिकूलविषयो द्वेषः ।
न चैतत् केवलात्मदर्शिनः सम्भवति, निरुपाधेः पुत्रवित्तलोभा-
भावात्, तैरनुपकार्यत्वात्, छेदक्लेददाहशोषाद्यनुपपत्तेः विधि-
मनन कर लेनेपर निदिध्यासनद्वारा शरीरादिसे भिन्न आत्मतत्त्वका
साक्षात्कार होनेसे मोक्षकी सिद्धि होगी । इसीलिये आत्मा उपादेय है ।
यदि पूछो कि-आत्माके उपादानका क्या अभिप्राय है ? तो उत्तर होगा-
विवेक अर्थात् भिन्नरूपमे ज्ञान । यदि पूछो—किससे ? तो कहूँगा,
अनात्मभूत शरीर इन्द्रिय आदिसे । अर्थात् शरीर, इन्द्रिय, मन तथा
विषय आदिसे भिन्नरूपमें आत्माका ज्ञान ही उसका उपादान है ।
यदि पूछो कि-शरीरादिसे भिन्नरूपमें आत्माका ज्ञान करना चाहिये,
इसमें क्या प्रमाण है ?—तो यही उत्तर है कि न्याय और आम्नाय (श्रुति)
दोनों ही प्रमाण हैं । क्योंकि शरीरको ही, जो सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं
पूर्णरूपसे अनात्मा है, आत्मा माननेवाले व्यक्तिको शरीर पाकर उसके
अनुकूल संसारविषयक तृष्णा जगती है तथा शरीरके प्रतिकूल विषयके
प्रति द्वेष जगता है । इसप्रकारकी तृष्णा और द्वेष निरुपाधिक आत्म-
ज्ञानीको नहीं हो सकता है । क्योंकि उपाधिविहीन आत्माको पुत्र धन
आदिका लोभ नहीं होता है । कारण, उपाधि हीन आत्माका पुत्रवित्तादि
से कोई उपकार नहीं है । एव निरुपाधि आत्माको छेदन, क्लेदन,
दाह या शोषण आदिका कुछ भी अनुभव नहीं होता है। इसलिये
छेदनादिके हेतुओंके प्रति द्वेष भी नहीं होता ।
एव विधि-निषेधोंमे निरुपाधि आत्माका अधिकार भी नहीं है ।
अर्थात् वैदिक यज्ञादि विधियोंमें तथा हिंसादि निषेधोंमें शरीरवान् आत्मा
ही अधिकारी है । अतः निरुपाधि आत्माको विहितानुष्ठान या निषिद्ध-
परित्यागकी दृष्टिसे भी तृष्णा या द्वेषकी सम्भावना नहीं है । क्योंकि
अनुपलम्भवादः ३८३
निषेधानधिकाराच्च । जन्मजातिवयोवित्तसंस्काराद्युपग्रहेण
तत्प्रवृत्तेः ।
ततोऽनात्मन्यात्मग्रहो निदानं संसारस्य, मिथ्याज्ञानं च
तत्त्वज्ञानान्निवर्तते । तच्च श्रवणमननादिक्रमेणोत्पद्यते । कारण-
निवृत्तौ च कार्यं न जायते । उत्पन्नश्च धर्माधर्मप्रचयो भोगेन
क्षीयत इति न्याय्यार्थपारसंक्षेपः । आम्नायसारसंक्षेपस्त्वशरीरं
वाव सन्तमित्यादि ।
जन्म (शरीरग्रहण), ब्राह्मणत्वादि-जाति, दीर्घायुष्ट्वरूप वय, यज्ञसम्पादनके
लिये समुचित द्रव्य तथा उपनयन-संस्कार आदि होनेपर ही विधि-निषेध-
शास्त्रमें अधिकार होता है, अन्यथा नहीं । अर्थात् उक्त जन्म-जाति आदि
का उपग्रह वीतराग आत्मतत्त्वदर्शीको नहीं होनेसे उसका विधि-निषेधोंमे
अधिकार नहीं होता ।
अतः शरीर-इन्द्रियादि अनात्मवस्तुमे आत्मत्वका ग्रहणरूप मिथ्या-
ज्ञान ही संसारका हेतु है, और वह मिथ्याज्ञान तत्त्वज्ञानसे दूर होता
है । तथा वह तत्त्वज्ञान भी श्रवण मनन निदिध्यासनक्रमसे पैदा होता
है । इसप्रकार आत्मतत्त्वज्ञानसे मिथ्याज्ञानरूप संसारहेतुकी निवृत्ति
हो जानेसे संसाररूप कार्यकी भी निवृत्ति हो जाती है । अर्थात् मिथ्या-
ज्ञानकी निवृत्तिसे रागद्वेषरूप दोषकी निवृत्ति होती है । दोषकी निवृत्ति
से प्रवृत्तिकी निवृत्ति होती है । तथा प्रवृत्तिकी निवृत्तिसे जन्मकी
निवृत्ति हो जाती है । जन्मकी निवृत्ति हो जानेसे पुनः दुःखोत्पत्ति नहीं
होती है, यही अपवर्ग है ।¹
एवं पूर्वोत्पन्न धर्माधर्मका समूह भोगद्वारा क्षीण हो जाता है । अतः
उस कारणसे भी पुनः संसारकी संभावना नहीं रह जाती है । यही
न्यायसिद्धान्तके रहस्यका संक्षेप है । वेदिकरहस्यका संक्षेप तो "अशरीरं
वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः" इत्यादि है । अर्थात् शरीर-इन्द्रिय
आदि उपाधियोंका विगम होनेपर आत्मामें संसारकी निवृत्ति हो
जाती है ॥
१. 'दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः'
(न्या० द० १।१।२।)
३८४ आत्मतत्त्वविवेके
तदप्रामाण्यं प्रपञ्चमिथ्यात्व-सिद्धान्तभेद-तच्चोपदेशपौनः-
पुन्येषु अनृत-व्याघात-पुनरुक्तदोषेभ्य इति चेन्न, न, मतात्पर्य-
त्वात् । निष्प्रपञ्च आत्मा ज्ञेयो मुमुक्षुभिरिति हि तात्पर्यं
प्रपञ्चमिथ्यात्वश्रुतीनाम् । आत्मन एकस्य ज्ञानमपवर्गसाधन-
मित्यद्वैतश्रुतीनाम् । दुरूहोऽयमिति पौनःपुन्यश्रुतीनाम् । बहिः
संकल्पत्यागो निर्मनस्कश्रुतीनाम् । आत्मैवोपादेय इत्यानन्द-
श्रुतीनाम् । गारुडवदनुष्ठाने तात्पर्यं प्रकृत्यादिश्रुतीनाम् ,
तन्मूलानां साङ्ख्यादिश्रुतीनां चेति नेयम् । अन्यथा “जैमिनि-
आम्नायमें अप्रामाण्यका खण्डन
यदि कहो कि—आम्नाय ( वेद ) अप्रमाण है । क्योंकि प्रत्यक्ष
सिद्ध प्रपञ्चको मिथ्या बतानेके कारण वह अनृतदोषसे ग्रस्त है । एवं
“सदेव सोम्येदमग्र आसीत्” इत्यादि श्रुतियोंमें अद्वैतका प्रतिपादन किया
गया है और अन्यत्र श्रुतिमें द्वैतका प्रतिपादन किया गया है, इस
प्रकार सिद्धान्तभेद मिलनेसे व्याघातदोषसे ग्रस्त है । तथा एक ही
ब्रह्मका बारबार उपदेश होनेके कारण पुनरुक्तदोषसे ग्रस्त है—तो ऐसा
नहीं कह सकते हैं । क्योंकि उक्त कथनोंका अभिप्राय दूसरा है । जैसे,
“मोक्षार्थियोंके लिये निष्प्रपञ्च आत्मा ज्ञेय है” इसमें प्रपञ्चको मिथ्या
बतानेवाली श्रुतियोंका तात्पर्य है । ‘एकमात्र आत्माका ही ज्ञान मोक्ष
का साधन है” इसमें अद्वैत श्रुतियोंका तात्पर्य है । आत्माको अमना
बतानेवाली श्रुतियोंका तात्पर्य बाह्यसङ्कल्पोंका त्याग करनेमें है । आत्मा
को आनन्दस्वरूप बतानेवाली श्रुतियोंका तात्पर्य “आत्मा ही उपादेय है”
इस अर्थमें है । प्रकृतिको चेतनसंसर्गसे सृष्टिकर्ता बतानेवाली श्रुतियों
तथा तन्मूलक साख्यादि दर्शनोंका तात्पर्य गारुडविद्याके समान अनुष्ठान
में है । अर्थात् गरुडविद्या जाननेवाले जाङ्गलिक साँपके काटनेसे अचेतन
हुए व्यक्तिमें परिश्रमद्वारा चैतन्य उत्पन्न कर देता है । उसी प्रकार
अचेतन भी प्रकृतिमें चैतन्यका उपराग बताया गया है । इसका तात्पर्य
यह है कि शरीरादिसे भिन्न अपने तत्त्वको नहीं जाननेवाले अचेतनतुल्य
आत्माको तत्त्वज्ञानके लिये प्रणिधान ( समाधि ) का उपदेश देनेके लिये
सांख्यमतका प्रतिपादन हुआ है । यदि इसप्रकारका तात्पर्य न हो तो
—यदि वेदज्ञः कपिलो नेति का प्रमा ।
तावुभौ यदि वेदज्ञौ व्याख्याभेदस्तु किं कृतः ? ॥” इति ।
प्रामाण्यं तु तस्य कुत इति चेन्, आप्तोक्तत्वात् । तदसिद्ध-
मिति चेत्, न, विश्वस्य कर्तुरनुमानसिद्धत्वात् । विवादाध्यासित-
र्विश्वं सकर्तृकं कार्यत्वादिति ।
विशेषविरुद्धोऽयं हेतुरिति चेत्, न, विरोधिविशेषाप्रतीतौ
विरोधस्य प्रत्येतुमशक्यत्वात्, तत्प्रतीतौ वा सहोपलम्भनियमेन
[इ]समे क्या प्रमाण है कि जैमिनिमुनि वेदज्ञाता हैं और कपिलमुनि
[न]हीं हैं। यदि दोनों ही महर्षि वेदज्ञाता हैं, तो दोनोंकी व्याख्या
यों भिन्न भिन्न हो जायगी ? अर्थात् तात्पर्यभेदसे दोनोंकी व्याख्या
[स]ङ्गत है ॥
वेदप्रामाण्यका स्थापन
यदि कहो कि—वेदमे अप्रामाण्य भले ही न हो, किन्तु उसमे प्रामाण्य
[की] सिद्धि कैसे होगी ?—तो यही कहूँगा कि आप्तद्वारा उक्त होनेके
[का]रण वेद प्रमाण हैं। यदि कहो कि वेदमे आप्तोक्तत्व असिद्ध है—
[त]ो ऐसा नहीं कह सकते। क्योंकि संसारका कर्ता (ईश्वर) अनुमानसे
सिद्ध है। यहाँ अनुमानका स्वरूप यों है—विवादास्पद है कर्ता जिसका,
[ऐ]सा यह विश्व, कर्तासे उत्पन्न है, क्योंकि यह कार्य (उत्पत्तिमान्)
[है]। जो जो कार्यवस्तु है, उसका अवश्य कोई कर्ता होता है, जैसे
घटरूपकार्यका कर्ता कुम्भकार होता है, इत्यादि ।
यदि कहो कि—ईश्वरको सिद्ध करनेवाला कार्यत्व हेतु पक्षधर्मता-
[ब]लसे सिद्ध होनेवाले अशरीरी कर्तारूप विशेषके विरुद्ध है। अर्थात्
[उ]क्त अनुमानद्वारा जो ईश्वर सिद्ध होता है, वह पक्षधर्मताबलसे
नित्य सर्वज्ञ एव अशरीरी सिद्ध होता है। किन्तु कार्यत्व हेतु उसके
विरुद्ध है। क्योंकि लोकमे जो भी कार्य देखा जाता है जैसे
घटापटादि वह सभी शरीरी कर्तासे उत्पन्न है। अत कार्य होना
अशरीरी कर्ताके विरुद्ध है—तो ऐसा नहीं कह सकते। क्योंकि पक्ष-
[ध]र्मताबलसे अशरीरी कर्तारूप विरोधीभूत विशेषकी प्रतीति है ? या नहीं
२५
३८६ आत्मतत्त्वविवेक
विरोधस्य बाधितत्वात् ।
सर्वथैवाप्रतीतस्याभिप्रायगोचरत्वमपि कथमिति चेत्, न,
स्वार्थानुमानसिद्धत्वात् । ततोऽपि कथं सिद्ध्यतीति चेत्, अप्र-
तीतप्रत्यायकं प्रमाणम्, न त्वप्रतीतेन विरोधः शक्यनिश्चय इत्यतो
विशेषात् ।
का पुनरनुमानस्यैवम्भूतप्रत्यायने शक्तिरस्तीति चेत्,
है ? यदि उसकी प्रतीति ही नहीं है तो विरोधीकी प्रतीतिके अभावमे
विरोधकी प्रतीति ही नहीं हो सकेगी । यदि अशरीरी कर्त्ताकी प्रतीति है
तो अशरीरिकर्त्तृकत्व और कार्यत्वकी साथ-साथ उपलब्धि होनेके कारण
उनका विरोध बाधित है । अर्थात् जिसका साथ साथ उपलम्भ होता है,
उसमे विरोध बताना अग्निको शीत बतानेके बराबर है ।
यदि कहो कि—क्षित्यादिके कर्त्ता ईश्वरके जो नित्यत्व सर्वज्ञत्व-
अशरीरित्व आदि विशेष हैं, वे सर्वथा ही अप्रतीत हैं, अत वे तुम्हारे
तात्पर्यके विषय भी कैसे हो सकते हैं ? तथा अशरीरिकर्त्तृकत्वकी सिद्धि-
के लिये न्यायप्रयोग भी कैसे हो सकेगा ?—तो ऐसा नहीं कह सकते ।
क्योंकि विशेषकी स्वार्थानुमानसे सिद्धि है । अर्थात् स्वार्थानुमानस उसकी
प्रथम प्रतीति करके पश्चात् दूसरेको बतानेके लिये परार्थानुमानका प्रयोग
किया जाता है । यदि पूछो कि—स्वार्थानुमानसे भी उस विशेषकी कैसे
सिद्धि हो सकती है, जो सर्वथा ही अप्रतीत है । क्योंकि पक्षधर्मता
भी व्याप्तिबलसे आनीत अर्थको ही पक्षमे सिद्ध करती है, न कि जो
सर्वथा ही अप्रतीत है उसको । अशरीरी कर्त्ता तो सर्वथा ही अप्रतीत
है—तो यहाँ विशेषकी सिद्धि इसलिये हो सकेगी कि अप्रतीत वस्तुकी
प्रतीति कराना ही तो प्रमाणका काम है । अर्थात् प्रमाणकी महिमासे
उसकी प्रतीति हो जाती है । क्योंकि जबतक प्रतीति नहीं हुई रहती है
तबतक उसका हेतुभूत प्रमाणके साथ विरोधका निश्चय भी कैसे हो
सकता है ? प्रतीतिकी दशामें तो उस विशेष और प्रमाणकी साथ साथ
उपलब्धि होनेसे ही अविरोध सिद्ध हो जाता है ।
अनुमानकी वह कौनसी शक्ति है, जो इस प्रकारकी अप्रतीत वस्तुकी
प्रतीति करा देती है ?—तो इसका उत्तर यह होगा कि आकाङ्क्षा (अन्वय
आकाङ्क्षानुपपत्तिनियमभेदेन त्रिविधः सम्बन्धः। तत्रा-
काङ्क्षानियमाभ्यामन्वयी, अनुपपत्तिनियमाभ्यां व्यतिरेकीति
विभागः।
अस्तु तर्हि सत्प्रतिपक्षत्वं शरीराजन्यत्वादिति चेत्, न,
असमर्थविशेषणत्वेनासिद्धभेदस्यातुल्यबलत्वात्।
सहचार) और अनुपपत्ति (व्यतिरेक-सहचार) से ग्राह्य जो नियम
विशेष अर्थात् अन्वयव्याप्ति, व्यतिरेकव्याप्ति और अन्वय-व्यतिरेक
व्याप्ति है, तत्स्वरूप जो हेतुमें रहनेवाला तीन प्रकारका सम्बन्ध होता
है, वही अनुमानकी शक्ति है। इनमें अन्वयसहचार एव अन्वय-
व्याप्तिसे अन्वयी हेतु है, तथा व्यतिरेकसहचार एव व्यतिरेकव्याप्तिसे
व्यतिरेकी हेतु होता है, तथा अन्वय-व्यतिरेक उभय सहचारसे प्रतीत
होनेवाली व्याप्तिमे अन्वय व्यतिरेकी हेतु होता है। यह त्रिविध
हेतुओंका विभाग है। अर्थात् प्रतीतिके अपर्यवसानरूप आकाङ्क्षा तथा
प्रतीतवस्तुका अपर्यवसानरूप अनुपपत्ति इन दोनोंमेसे कोई एक अनु-
मितिमें अवश्य रहती है। अतः "क्षितिः सकर्तृका, कार्यत्वात् घटवत्"
यह अन्वयी अनुमान तबतक पर्यवसित नहीं हो सकता, जबतक कि
कर्तामे सर्वज्ञत्वका भान उस अनुमितिमे न हो। क्योंकि उपादानभूत
परमाण्वादिविषयक अपरोक्षज्ञानकी सत्ता ही कर्तृत्व है। तथा इसप्रकार-
का कर्तृत्व होनेके लिये कर्ताको परमाणु आदिका प्रत्यक्षज्ञान करनेवाला
सर्वज्ञ होना चाहिये। एवं, वह नित्य और अशरीरी भी इसीसे सिद्ध
हो जाता है।
यदि कहो कि—पूर्वोक्त दोष न होनेपर भी जन्यत्व हेतु शरीरा-
जन्यत्व हेतुके साथ सत्प्रतिपक्षित हो जाय। अर्थात् “क्षित्यादिकं
सकर्तृकं जन्यत्वात्" इस अनुमानका प्रतिपक्षी अनुमान होगा ‘क्षित्या-
दिक न सकर्तृकं, शरीराजन्यत्वात्”। अत शरीरसे उत्पन्न नहीं होनेके
कारण पृथिवी आदिका कोई कर्ता नहीं है—तो ऐसा नहीं कह सकते।
क्योंकि उक्त प्रतिपक्षी अनुमानके शरीराजन्यत्व हेतुमे शरीरविशेषण
असमर्थ है अर्थात् व्यभिचारका निवारक नहीं है। अतः शरीराजन्यत्व
हेतु व्याप्यत्वासिद्ध है। कारण, हेतुमें कोई भी विशेषण देनेका प्रयोजन
३८८ आत्मतत्त्वविवेके
असिद्धिपरिहारे विशेषणं समर्थमिति चेन्, न, एकाम-
सिद्धिं परिहरतो द्वितीयापत्तेः । अन्यथा विवादाध्यासितं
नादृष्टहेतुकं शरीराजन्यत्वादित्यनेनापि जन्यत्वस्य सत्प्रतिपक्ष-
प्रसङ्गानिति ।
तर्कापरिशुद्धिरस्तु दूषणम्, शरीरनिवृत्तौ बुद्धिनिवृत्तेः ।
बुद्धिनित्यत्वे शरीरानुपयोगवत्, प्रयत्ननित्यतायां ज्ञानेच्छा-
नुपयोगादिति चेत्, न, प्रयत्नस्य द्विधर्मकत्वात् । स हि
है व्यभिचारका वारण । किन्तु यहाँका शरीर विशेषण व्यभिचारवारक
नहीं होनेसे व्याप्यत्वासिद्धके अन्तर्गत आ जाता है । अत यह असिद्ध-
हेतु कर्तृसाधक पूर्वोक्त अनुमानके तुल्यबलवाला नहीं है। तुल्यबल
होनेपर ही सत्प्रतिपक्ष होता है ।
यदि कहो कि—केवल अजन्यत्वको हेतु बनानेमें यह हेतु स्वरूपा-
सिद्ध हो जायगा । क्योंकि क्षित्यादिक अजन्य नहीं है किन्तु जन्य है ।
अत स्वरूपासिद्धिका वारण करनेके कारण शरीर-विशेषण समर्थ
( सार्थक ) है । क्योंकि क्षित्यादिक शरीरसे तो अजन्य है ही—तो यह
भी नहीं कह सकते । क्योंकि एक असिद्धिका परिहार करनेमे पुनः
दूसरी असिद्धि ( व्याप्यत्वासिद्धि ) की आपत्ति हो जाती है । यदि
असमर्थ विशेषणकी दशामै भी सत्प्रतिपक्ष हो तो "क्षित्यादिकम् अदृष्ट-
हेतुक, जन्यत्वात्" यह अनुमान भी 'क्षित्यादिक न अदृष्टहेतुकम्,
शरीराजन्यत्वात्" इस प्रतिपक्षी अनुमानके द्वारा सत्प्रतिपक्षित होने
लगेगा ।
यदि कहो कि—ईश्वर साधक अनुमानमे विरुद्धत्वदोष या सत्प्रति-
पक्षत्वदोष भले न हो फिर भी तर्कापरिशुद्धिदोष होगा । अर्थात्
उक्त अनुमान प्रतिकूल तकोंसे उपहत हो जायगा । जैसे—जगतका
कर्ता यदि अशरीरी होगा तो शरीरके बिना उसमें बुद्धि भी नहीं हो
सकेगी । ईश्वरीयज्ञानके नित्य होनेसे उसके लिये यदि शरीरकी कोई
उपयोगिता न हो तो उसी तरह ईश्वरीय प्रयत्नके भी नित्य होनेसे उसके
लिये ज्ञान और इच्छाकी भी उपयोगिता समाप्त हो जायगी और ईश्वर
अनुपलम्भवादः ३८९
ज्ञानकार्यं ज्ञानैकविषयञ्च कर्तृत्वम् । तत्र कार्यत्वनिवृत्तौ कारण-
तया ज्ञानं मा पेक्षिष्ट, विषयार्थं तु तदपेक्षा केन वार्यते ? न
चास्य स्वरूपेणैव विषयप्रवणत्व, ज्ञानत्वप्रसङ्गात् । अयमेव हि
ज्ञानात् प्रयत्नस्य भेदो यदयमर्थाप्रवण इति ।
न च निर्विषय एवास्त्विति वाच्यम्, अकारणत्वप्रस-
ङ्गात् । तथा च सोऽप्येकः कथं सिध्येत् ? मा सैत्सीदिति
चेत्, न, तत्र साधनस्य निर्दोषत्वात् । दोषे वा स एव
ज्ञानरहित भी सिद्ध हो जायगा। अर्थात् जैसे शरीरके बिना भी ईश्वरीय
ज्ञानकी सत्ता मानते हो उसी प्रकार ज्ञान और इच्छाके बिना भी
ईश्वरीय प्रयत्न मानना पडेगा, जो कि "जानाति, इच्छति, यतते" इस
नियमके विरुद्ध है—तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि प्रयत्नके दो धर्म
हैं—एक यह कि वह कर्तृत्वरूप प्रयत्न ज्ञानका कार्य है । दूसरा यह कि
वह प्रयत्न ज्ञानसमानविषयक होता है, अर्थात् यद्विषयक ज्ञान होता
है, तद्विषयक ही प्रयत्न भी होता है । अत ईश्वरीय प्रयत्नमे कार्यत्व-
धर्मका अभाव होनेसे कारणके रूपमे ज्ञानकी अपेक्षा भले ही न हो
फिर भी विषयके लिये प्रयत्नको ज्ञानकी अपेक्षा होगी, इसे कौन रोक
सकता है । अर्थात् ईश्वरके नित्य भी इच्छा और प्रयत्न विषयलाभके
लिये ज्ञानकी अपेक्षा करते हैं । प्रयत्नको बिना ज्ञानकी अपेक्षा किये
ही सीधे विषयोन्मुख नहीं माना जा सकता, क्योंकि तब वह प्रयत्न न
होकर ज्ञान हो जायगा । कारण, ज्ञानसे प्रयत्न का यही भेद है कि
प्रयत्न सीधे विषयोन्मुख नहीं होता किन्तु ज्ञानके द्वारा ही होता है ।
अर्थात् ज्ञानीय विषयमे ही प्रयत्न भी होता है ।
यहाँ यह नही कह सकते कि—प्रयत्नको सविषयक माननेमे
ही ज्ञानकी अपेक्षा होगी, अत प्रयत्न निर्विषयक ही माना जाय–क्योंकि
तब उसमें कारणता भी नहीं हो सकती है । क्योंकि प्रयत्न कारण इसी
लिये कहाता है कि वह विषयमे व्यापार उत्पन्न करता है । अत.
निर्विषयक होनेके कारण प्रयत्न जब कारण ही नहीं हो सकेगा तो केवल
[...]को कैसे सिद्धि हो सकेगा ? अर्थात् कार्यत्वहेतुके बलसे
३९० आत्मतत्त्वविवेके
बाधः। सर्वविषयत्वात्तस्य किं विषयनियमार्थेन ज्ञानेनेति-
चेत्, न, तस्य स्वरूपेणार्थप्रवणत्वाभावात्, भावे वा ज्ञानत्व-
प्रसङ्गादित्युक्तम्।
जीवनयोनिप्रयत्नवद् विषयव्यवस्था भविष्यतीति चेत्,
न, जात्यन्तरत्वात्। एकजातीयत्वे तस्यापीच्छापूर्वकत्वप्रस-
ङ्गात्। इच्छाया वा तत्कारणत्वं न स्यात्, तामन्तरेणापि
ज्ञान-इच्छा आदि भले ही सिद्ध न हो किन्तु प्रयत्नके अकारण हो
जानेसे कार्यत्व हेतुसे प्रयत्न-पूर्वकत्व भी नहीं सिद्ध हो सकेगा। और
ज्ञान इच्छाके साथ साथ प्रयत्न भी जगत्के मूलरूपसे बहिष्कृत
हो जायगा।
यदि कहो कि—प्रयत्न भी मत सिद्ध हो, क्या हानि है?—तो ऐसा
नहीं कह सकते। क्योंकि सृष्टिमे प्रयत्न-पूर्वकत्व सिद्ध करनेवाला
कार्यत्व-हेतु सर्वथा दोषरहित है। यदि उसे भी सदोष मानो तो फिर
वही बाध-दोष आ जाता है। अर्थात् कार्यवस्तुका बिना प्रयत्नके होना
प्रत्यक्षबाधित है। यदि कहो कि—ईश्वरीय प्रयत्नके सर्वविषयक होनेसे
उसमें विषय नियमार्थ ज्ञानकी सत्ता मानना व्यर्थ है—तो ऐसा नहीं
कह सकते। क्योंकि प्रयत्नमें स्वत (सीधे) विषय प्रवणता (विषयो-
न्मुखता) नहीं होती है। यदि हो तो विषयसे सीधा सम्बन्ध
होनेके कारण वह प्रयत्न न होकर ज्ञान हो जायगा। क्योंकि
ज्ञानका ही विषयसे सीधा सम्बन्ध होता है। यह बात पूर्वमे कही
जा चुकी है।
यदि कहो कि—जीवनयोनि प्रयत्नके समान ही अन्य प्रयत्नमें भी
विषयकी व्यवस्था हो जायगी। अर्थात् जीवनयोनि प्रयत्न बिना ज्ञानके
ही प्राणविषयक होता है और अचेतावस्थामें भी प्राणी उसीके कारण
श्वास प्रश्वास क्रिया करता रहता है, वैसे ही अन्य प्रयत्न भी बिना ज्ञान
के ही सविषयक होगा—तो यह नहीं हो सकता। क्योंकि जीवनयोनि-
प्रयत्न एक दूसरी ही जातिका प्रयत्न है। यदि एक ही जातिका हो तो
वह भी अन्य प्रयत्नोंके समान इच्छा पूर्वक होने लगेगा। अर्थात्
इच्छा होने
अनुपलब्धवादः ३९१
तज्जातीयस्योत्पत्तेः । तस्मात् कृतिजातीयस्य ज्ञानेच्छाभ्यामेव
सविषयव्यवस्था । स च साधयितुमिष्ट इति ।
तार्किकगर्ववाहस्त्वाह—ननु सपक्षविपक्षयोर्दर्शनादर्शन-
मात्रस्य शतशः प्रवृत्तावपि व्यभिचारोपलम्भात् , तल्लक्षणस्या-
नुपलब्धव्यभिचारस्यापि तथाभावसम्भावनाक्रान्तत्वात् लक्ष-
णान्तरं प्रतिबन्धस्य वक्तुमुचितम् । तच्चोपाधिविरहो वा
स्यात् , तदुत्पत्तिर्वा, विपक्षे बाधकं वेति संक्षेपः । तत्र न
प्रथमः, अदृश्योपाध्यभावनिश्चयोपायाभावात् । दृश्येनैवोपा-
धिना भवितव्यमिति च नियमानुपपत्तेः ।
प्रयत्न बिना इच्छाके होता है, वैसे ही अन्य प्रयत्नमें भी इच्छाकी
कारणता नहीं हो सकेगी । क्योंकि इच्छाके बिना भी उसी जातिका
दूसरा प्रयत्न ( जीवनयोनि प्रयत्न ) उत्पन्न होता है । इसलिये उस
प्रयत्नमे, जो इच्छाके अधीन उत्पन्न होता है, ज्ञान और इच्छाके
द्वारा ही सविषयत्वकी व्यवस्था होती है । और वही प्रयत्न यहाँ
सिद्ध करनेके लिये मेरा अभीष्ट भी है । अर्थात् कार्यत्व हेतुसे
क्षित्यादिके प्रति उक्त कृति ( प्रयत्न ) मान् कर्ता ही सिद्ध करना मेरा
अभीष्ट है ।
अपनी तार्किकताका अभिमान रखनेवाले बौद्धका पूर्वपक्ष—सपक्षमें
हेतुसत्त्वज्ञान तथा विपक्षमें हेतुव्यावृत्तत्वज्ञानकी सैकड़ों बार प्रवृत्ति
होनेपर भी व्यभिचार देखा जाता है । अत सपक्षसत्त्व-विपक्षव्यावृत्त-
त्त्वरूप व्याप्तिलक्षणमें तत्काल व्यभिचारकी उपलब्धि न होनेपर भी
उसमे व्यभिचारकी संभावना बनी रहती है । इसलिये व्याप्तिका
दूसरा लक्षण करना चाहिये । और वह लक्षण उपाधिका अभावरूप
है, या तदुत्पत्तिरूप है अथवा विपक्षमें बाधकरूप है—यही संक्षेपसे
कहा जाता है । इनमें प्रथम नहीं हो सकता । क्योंकि जो उपाधि
प्रत्यक्ष-योग्य नहीं है, उसके अभावके निश्चयका कोई उपाय नहीं है ।
तथा दृश्य ही उपाधि होगा, ऐसा नियम भी नहीं हो सकता ।
३९२ आत्मतत्त्वविवेके
नापि द्वितीयः, सा ह्यन्वयव्यतिरेकाभ्यां निश्चीयते, तौ
च दृश्यशरीरवच्चेतननिष्ठौ वा स्याताम् ? उपाधिविधुरदृश्या-
दृश्यसाधारणचेतनमात्रनिष्ठौ वा ? न प्रथमः, विटपादौ
व्यभिचारात्, प्रकृतासिद्धेश्च।
न द्वितीय , घटादिकार्यव्यतिरेकममये तत्प्रयोजककुलाल-
व्यतिरेकवद् दृश्य¹चेतनमात्रव्यतिरेकस्य निश्चेतुमशक्यत्वात् ।
दूसरा तदुत्पत्तिपक्ष भी व्याप्तिके लक्षणके रूपमे नहीं माना जा
सकता है । क्योंकि जो जिससे उत्पन्न होता है, वह उसका व्याप्य होता
है—यही तदुत्पत्तिरूप व्याप्तिका अभिप्राय है । किन्तु तदुत्पत्तिका
निश्चय अन्वयव्यतिरेकसे होगा । अर्थात् 'तत्सत्त्वे तत्सत्त्वमन्वय,
तदभावे तदभावो व्यतिरेक " इसके अनुसार अग्निके रहनेपर धूम होता
है और अग्निके अभावमे धूम नही होता है, इसलिये अग्निद्वारा
धूमोत्पत्तिका निर्णय होता है तथा तदुत्पत्तिके कारण धूममें अग्निकी
व्याप्तिका निश्चय होता है । किन्तु प्रकृतमे वे अन्वय और व्यतिरेक
दृश्यशरीरसे युक्त चेतनमें स्थित होंगे ? या उपाधिसे रहित दृश्या
दृश्यसाधारण चेतनमात्रमे स्थित होंगे ? इसमें प्रथमपक्ष नहीं हो
सकता । क्योंकि वृक्षादिमे इसका व्यभिचार पाया जाता है । अर्थात्
शरीरी चेतनके बिना भी अङ्कुरादिकी उत्पत्ति होती है । अतः
अङ्कुरादिके साथ शरीरी चेतनमें अन्वय व्यतिरेक नहीं होनेसे व्यभि-
चार स्पष्ट है । एव अन्वय व्यतिरेकको दृश्यशरीरगत माननेपर
नैयायिकोंका अभीष्ट अशरीरी चेतन कर्ता भी सिद्ध नहीं हा पा रहा है ।
शरीर आदि उपाधिसे रहित दृश्य अदृश्य साधारण चेतन
मात्रवृत्तिरूप द्वितीयपक्ष भी अन्वय व्यतिरेकके लिये नहीं माना जा
सकता है । क्योंकि जैसे घटादिकार्यके अभावकालमें उसे उत्पन्न
करनेवाले कुम्भकारका अभाव माना जाता है वैसे चेतनमात्रके
अभावका निश्चय नहीं किया जा सकता । किन्तु जो दृश्यादृश्य सभी
चेतनके साथ घटादिकार्यका अन्वय व्यतिरेक निश्चय मानता है, उसके
मतानुसार कुम्भकारका अभावनिर्णय होनेपर चेतनमात्रका अभाव माना
१ दृश्यादृश्य इति पाठो युक्तो भाति ।
अनुपलम्भवादः ३९३
न हि कुलालादिदृश्यव्यतिरेके तस्यावश्यं व्यतिरेको, विटपा-
दावपि तथाभावप्रसङ्गात् ।
तर्हि सन्तानान्तरानुमानमपि कथम् ? कुम्भकारव्यतिरेके
दृश्यादृश्यचिन्मात्रव्यतिरेकासिद्धिवत् स्वचित्तव्यतिरेकेऽपि
कम्पं प्रति चिन्मात्रव्यतिरेकासिद्धेरिति चेत्, न, वादान्तर-
त्वात् । यदापि तत्प्रस्तावः, तदापि स्वदेहे स्वपरसन्तानसा-
जाना चाहिये, पर ऐसा नहीं होता । क्योंकि कुम्भकार आदि दृश्यकर्त्ता-
का अभाव होनेपर अदृश्यकर्त्ताका भी अभाव नहीं होता । यदि वैसा
हो तो वृक्षादिमें भी अदृश्यकर्त्ताका अभाव होने लगेगा । अर्थात्
वृक्षादिकी उत्पत्तिकर्त्ताकेरूपमे कुम्भकारका अभाव होनेसे उसके अदृश्य-
कर्त्ता ( ईश्वर ) का भी अभाव नैयायिकको मानना पड़ जायगा । यदि
वैसा माने तो कार्यत्व-हेतु वहींपर सकर्तृकत्वका व्यभिचारी हो जायगा ।
अतः कार्यकारणभावका नियामक जो अन्वय व्यतिरेक है, उसे दृश्या-
दृश्यसाधारणचेतनमात्रमे वर्तमान नहीं मान सकते ।
यहाँ यदि नैयायिक यह प्रश्न करे कि—परचित्तसन्तानोँका अनुमान
बौद्ध कैसे कर सकेगा ? क्योंकि जैसे घटादिकार्यस्थलमे अन्वयके गृहीत
होनेपर भी कुम्भकारका व्यतिरेक होनेपर दृश्यादृश्यचेतन कर्त्तामात्रका
व्यतिरेक सिद्ध नहीं होनेसे व्यतिरेकसहचार नहीं सिद्ध हो पाता, वैसे
ही परशरीरमे होनेवाली चेष्टाके प्रति परचित्तसन्तानकी कारणता कैसे
सिद्ध होगी ? क्योंकि वहाँ अपने चित्तसन्तानका व्यतिरेक सिद्ध होनेपर
भी चिन्मात्रसन्तानका व्यतिरेक नहीं सिद्ध होनेसे चेष्टा और चित्त-
सन्तानमे अन्वय-सहचार होनेपर भी व्यतिरेक-सहचारकी सिद्धि नहीं
हो सकेगी—तो ऐसा प्रश्न नहीं किया जा सकता है । क्योंकि यह
अर्थान्तर हो जायगा । अर्थात् इस प्रश्नके उठानेसे नैयायिकके कार्यत्व
और सकर्तृकत्वके उभयविध सहचारमें कोई लाभ नहीं होता है । फिर
भी यदि इस अर्थान्तरविषयक प्रश्नको नैयायिक उठावे, क्योंकि परचेष्टा-
से परचित्तसन्तानकी अनुमिति करनेके लिये परचेष्टामें तदुत्पत्तिरूप
व्याप्तिका ग्रहण अवश्य अपेक्षित होगा तथा उक्त व्याप्तिग्रहके लिये उन
दोनोंका अन्वय-व्यतिरेकग्रह भी अपेक्षित होगा—तो भी अपने शरीरमें
३९४ आत्मतत्त्वविवेके
धारणचिन्मात्राविनिर्भागवृत्तिदृश्यदेहमात्रस्यैव प्रत्यक्षानुपल-
म्भाभ्यां कम्पं प्रति कारणत्वप्रतीतेः परचित्तस्यापि कारणत्वं
प्रतीयत इति ।
नापि तृतीयः, विपक्षेऽपि बाधकाभावात् । देशकालनिय-
मादीनां स्वकारणापातसन्निधिना कादाचित्केन प्रतिनियत-
शक्तिना कारणेनाचेतनेनाप्युपपत्तेरिति ।
उत्तानोल्लपितमेतत्—विकल्पत्रयस्याप्युपपत्तेः । तथाहि,
ही चेष्टाके प्रति स्वपरसन्तानसाधारण चित्तमात्रसे नियमतः सम्बद्ध
दृश्य देहमात्रकी ही कारणताकी प्रतीति सामान्यतः अन्वय व्यतिरेकग्रह
द्वारा होकर तदनन्तर सामान्यान्तःपाती परचित्तसन्तानमे भी परचेष्टाके
प्रति कारणताकी प्रतीति हो जाती है ।
एव विपक्षमें बाधकरूप तृतीयपक्ष भी नहीं हो सकता । अर्थात्
विपक्षमें बाधक भी व्याप्तिका लक्षण नहीं हो सकता है । क्योंकि विपक्ष
मे भी कोई बाधक नहीं है । अर्थात् क्षित्यादिके चेतनद्वारा निर्मित
नहीं होनेपर भी कार्यत्वमें कोई बाधक नहीं है । क्योंकि “यदि
चेतनकर्त्ता न हो तो यहाँ इस समय क्षिति अङ्कुरआदि कार्य भी नहीं हो
सकेगा” इस विपक्ष बाधकके द्वारा ही चेतनपूर्वकत्व और कार्यत्वमें
व्याप्य व्यापकभावका ग्रहण करना होगा । अर्थात् कार्यमे देशका,
कालका तथा कारणका नियम तबतक नहीं हो सकता जबतक कि कार्यका
कोई स्वतन्त्र बुद्धिमान् कर्त्ता न हो। किन्तु उक्त देश, काल और
कारणका नियम चेतन कर्त्ताको माने बिना ही अपने कारण कलापके
अधीन है उपस्थिति जिसकी, ऐसे कभी कभी होने वाले तथा कार्यके
अनुरूप नियत शक्तिको धारण करनेवाले अचेतन कारणसे भी हो सकता
है । अर्थात् चेतनकर्त्ताके अन्वयसे कार्यका अन्वय तथा उसके व्यतिरेक
से कार्यका व्यतिरेक नहीं होता, किन्तु कारणान्तरके अन्वय व्यतिरेकसे
ही कार्यका अन्वय व्यतिरेक होता है । अतः कार्यत्वहेतुसे चेतनकर्त्ता
(ईश्वर) की सिद्धि नहीं हो सकती है ।
(उत्तरपक्ष) पूर्वोक्त कथन गर्वोक्तिमात्र है। क्योंकि व्याप्तिग्रहके
चत्वारो जगति भावा भवन्ति—विरोधी, बहिर्वृत्तिः, सहवृत्ति-
रन्तर्वृत्तिश्चेति । न च पञ्चमः प्रकारः काङ्क्षितुमपि शक्यते,
विरोधाविरोधयोः साहित्यासाहित्ययोः आधिक्यानाधिक्ययोः
परस्परनिषेधरूपत्वात् । तत्र द्वयमत्र नोपाधित्वेन शङ्कनीयम्,
अकार्यस्यैवाकार्यस्यापि वा सकर्तृकत्वप्रसङ्गात् । न चेद-
मिष्टम्, अकार्यस्य कारणवत्तामात्रेण सहजविरोधे कारक-
विशेषस्य कर्तुरनवकाशात् ।
तीनों ही पक्ष युक्तियुक्त हैं। कारण, जगत्मे चार प्रकारके भाव
(धर्म) होते हैं। १—साधनविरोधी, २—साधनबहिर्वृत्ति (साधन-
व्यापक), ३—साधनसहवृत्ति (साधनसमनियत) तथा ४—साधना-
न्तर्वृत्ति (साधनव्याप्य)। इनसे अतिरिक्त पञ्चम प्रकारकी कामना भी
नहीं की जा सकती है। क्योंकि विरोध अविरोध, साहित्य-असाहित्य
और आधिक्य अनाधिक्य ये परस्परके निषेध स्वरूप हैं। इनमें
आधिक्यानाधिक्यके परस्पर विरोधका प्रदर्शन बहिर्वृत्ति और अन्तर्वृत्ति
पक्षके अभिप्रायसे है तथा शेष दो विरोधी और सहवृत्तिके अभिप्रायसे हैं।
इनमें साधनविरोधी और साधनबहिर्वृत्तिको उपाधिके रूपमे नहीं
माना जा सकता है। क्योंकि साधनका विरोधी यदि उपाधि हो तो
चूँकि प्रकृतमे कार्यत्व साधन (हेतु) है, इसलिये अकार्य ही सकर्तृक
होने लगेगा और कार्यमें अकर्तृकत्वका प्रसङ्ग हो जायगा। यदि साधन-
बहिर्वृत्ति अर्थात् साधनका व्यापक उपाधि हो तो कार्यके साथ साथ
अकार्य भी सकर्तृक होने लगेगा। अर्थात् उपाधि कार्यत्वसमानाधि-
करण होते हुए कार्यत्वाभावसमानाधिकरण भी होगा, तभी वह साधन-
व्यापक होगा। अतः उक्त उपाधिबलसे कार्य भी सकर्तृक होगा और
अकार्य (गगनादि) भी सकर्तृक होने लगेगा। इसमें इष्टापत्ति नहीं
कर सकते। क्योंकि जो अकार्य (नित्य) है, उसे तो कारणमात्रसे
स्वाभाविक विरोध है, अत कारणका ही एकभाग कर्ताका भी अवसर
कैसे आ सकेगा? अर्थात् अकार्यका तो कोई भी कारण नहीं होता, तो
कारणविशेषरूप कर्ता कैसे सिद्ध हो सकेगा? अत अकार्यमे सकर्तृ-
कत्वप्रसङ्गकी इष्टापत्ति नहीं कर सकते।
३९६ आत्मतत्त्वविवेके
नापि तृतीयः, तुल्ययोगक्षेमयोरविशेषाद् व्यभिचार-
शङ्कानापादकत्वाच्च ।
चतुर्थस्तु स्यात् । सोऽपि न शरीरान्तर्भूतवृत्तिः, चेष्टमान-
शरीरहेतुकस्यापि कस्यचिदचेतनपूर्वकत्वप्रसङ्गात् । न चेद-
मिष्टम्, चेष्टाचेतनयोरविनाभावभङ्गप्रसङ्गात् । नापि सहवृत्तिः,
साधनसहवृत्तिरूप तृतीयपक्ष भी नहीं हो सकता । क्योंकि उपाधि
को साधनसमनियत माननेपर दोनोंके तुल्ययोगक्षेम होनेके कारण
साधन और उपाधिमे कोई विशेषता नहीं होगी । ऐसी स्थितिमें कार्यत्व-
हेतुसे सकर्तृकत्वका अनुमान किया जाय या तुम्हारेद्वारा उद्भावित
साधनसमनियत उपाधिसे सकर्तृकत्वका अनुमान किया जाय, इसमें
कोई अन्तर नहीं है। क्योंकि दोनों ही दशाओंमे क्षित्यादिके प्रति
कर्त्ता (ईश्वर) की सिद्धि हो जाती है । एव, इस प्रकारके साधन
समनियत उपाधिकेद्वारा व्यभिचार शङ्काकी उत्पत्ति नहीं होनेके कारण
वह उपाधि ही नहीं हो सकता। क्योकि जो साध्यका व्यापक और
साधनका अव्यापक होता है, वही व्यभिचारशङ्काका उत्पादक होनेके
कारण उपाधि कहाता है ।
साधनान्तर्वृत्ति (साधनव्याप्य) रूप चतुर्थपक्ष तो होगा, किन्तु वह
उपाधि भी शरीरिकर्तृकत्वकी अपेक्षा न्यूनवृत्ति कुलालकर्तृकत्व आदि
हो तो उस कुलालकर्तृकत्व उपाधिको चेतनकर्तृकत्वरूप साध्यका व्यापक
होना होगा । ऐसी स्थितिमे व्यापकका अभाव होनेसे व्याप्यका भी
अभाव हो जाता है, अतः जहाँ कुलालकर्तृकत्वरूप साध्यव्यापकका
अभाव होगा, जैसे पटादिकार्यमे, वहाँ चेतनकर्तृकत्वरूप साध्यका भी
अभाव होने लगेगा । यद्यपि वह पटादिकार्य कुलालकर्तृक न होते
हुए भी चेष्टायुक्त शरीरसे ही उत्पन्न होता है, अत वह वस्तुत चेतनकर्ता
से उत्पन्न होता ही है । यहाँ कुलालकर्तृकत्वका अभाव होनेके कारण
पटादिमे जो अचेतनकर्तृकत्वका (चेतनकर्तृकत्वाभावका) प्रसङ्ग
दिया गया है, उसमे इष्टापत्ति नहीं कह सकते । क्योंकि तब चेष्टा
और चेतनमें परस्पर जो अविनाभाव सम्बन्ध (व्याप्यव्यापकभाव) है,
अनुपलम्भवादः ३९७
देहस्यानुपाधित्वे तस्याप्यनुपाधित्वात्, तयोस्तुल्ययोगक्षेम-
स्यात् । अतथाभावे वा सहवृत्तित्वनियमानुपपत्तेः ।
शरीरस्य च नोपाधित्वम्, कत्र्तृव्यापकत्वात् । तत्कार्य्य-
त्वस्योपाधेर्विद्यमानत्वात् । नाप्यायतनतया तथाभावो,
भोगोपाधित्वात् । नाप्युपकरणप्रापकतया, साक्षात् प्रयत्ना-
नधिष्ठेयतोपाधित्वात् । अन्यथापि तत्प्राप्तेरिति ।
यदि यह उपाधि शरीरिकर्तृकत्वसे न्यूनवृत्ति न हो, किन्तु शरीरसह-
वृत्ति हो तो वह भी नहीं हो सकता है । क्योंकि देहके उपाधि नहीं
होनेके कारण उसका सहवृत्ति भी उपाधि नहीं हो सकेगा । कारण, देह
और यह उपाधि दोनों ही तुल्ययोगक्षेम हैं । यदि वे तुल्ययोगक्षेम न
हों तो उन दोनोंमे सहवृत्तिका नियम नहीं रह जायगा ।
उक्त आपत्तिके भयसे यदि कहो कि—शरीरघटित शरीरजन्यत्व ही
उपाधि होगा—तो वैसा नहीं हो सकता है । क्योकि शरीरजन्यत्व
सकर्तृकत्वरूप साध्यका व्यापक नहीं है । कारण सभी सकर्तृक शरीर-
जन्य ही नहीं होता, जैसे वृक्षादिक ही । यदि कहो कि—कुलाल आदि
कर्ता शरीरसापेक्ष ही घटादि-कार्य करता हुआ पाया जाता है, अतः
अवश्य ही सभी सकर्तृक शरीरजन्य होंगे—तो यह भी नहीं हो सकता ।
क्योंकि शरीरसापेक्षतामे भी शरीरकार्यत्वरूप उपाधि विद्यमान है ।
अर्थात् उसी कार्यके लिये कर्ताको शरीरकी अपेक्षा है, जो कार्य शरीरसे
उत्पन्न होता है । वृक्ष अंकुर आदि कार्य तो शरीरसे उत्पन्न होता नहीं,
अत उसके कर्ता (ईश्वर) को शरीरकी अपेक्षा नहीं है ।
एवं ईश्वर भोगायतनके रूपमे शरीरकी अपेक्षा नहीं करता, क्योंकि
वैसा करनेमे भोग उपाधि है । अर्थात् ईश्वरमें भोग ही नहीं होता है
कि भोगायतन (भोगका माध्यम) रूपमे वह शरीरकी अपेक्षा करेगा ।
उपकरणोंकी प्राप्ति करानेके लिये भी ईश्वरको शरीरकी अपेक्षा नहीं
है । क्योंकि वैसा वहीं होता है, जहाँका उपकरण साक्षात् कर्ताके
प्रयत्नका विषय नहीं होता । जैसे, कुलाल शरीरके बिना दण्डचक्रादिका
सञ्चालन नहीं कर सकता और घटकी उत्पत्ति नहीं हो सकती है । किन्तु
ईश्वर तो शरीररूपमाध्यमके बिना ही सीधे ही अपने प्रयत्नसे पर-
३९८ आत्मतत्त्वविवेके
नाप्यधिकवृत्तिः, शरीरविनाकृतस्य कर्तुः स्वयमनभ्युप-
गमात् । अस्तु पाक्षिकोऽभ्युपगमः । तेन न तत्कार्यत्वमात्रात्
कर्तृमत्त्वसिद्धिः, शङ्कितोपाधित्वात् । न चोपाधेरेव तत्सिद्धिः,
तस्य स्वयं सन्दिग्धासिद्धत्वादिति चेत्, न, उभयथाऽप्यशरी-
रिकर्तृव्यवस्थातिनियमात् ।
माणुओंमे गति उत्पन्न कर सकता है और तदनन्तर पृथिवी जलादिकी
उत्पत्ति कर सकता है ।
शरीरकी अपेक्षा अधिक सीमामे रहनेवाला भी उपाधि नहीं हो
सकता । अर्थात् जो कार्य शरीरकर्तृक नहीं है उसमे रहनेवाला धर्म
भी उपाधि नहीं हो सकता । क्योकि तत्र शरीरके बिना भी कर्तृत्व
सिद्ध हो जायगा जो तुम्हारे लिए अपसिद्धान्त है । इसका यदि यह
समाधान करो कि—शरीररहित कर्तृत्वरूप शरीराधिकवृत्ति उपाधिका
निश्चयात्मक अभ्युपगम होनेपर ही निरीश्वरवादीके लिये अपसिद्धान्त
होता, पर वैसा नहीं है, किन्तु उक्त उपाधिका पाक्षिक (सन्देहात्मक)
अभ्युपगम है । अत कार्यत्व हेतुमात्रसे सकर्तृकत्वकी सिद्धि नहीं
होगी क्योंकि वहाँ शङ्कितोपाधि है अर्थात् सोपाधिकत्वकी आशङ्कासे
हेतुमें व्यभिचारकी आशङ्का हो जाती है और व्याप्तिज्ञानका प्रतिबन्ध
होकर अनुमिति भी रुक जाती है । अत मेरे लिये अपसिद्धान्त नहीं
होता है । यहाँ नैयायिक यह नहीं कह सकता कि-‘शरीराधिकवृत्ति उस
उपाधिके सकर्तृकत्वरूप साध्यका व्यापक होनेके साथ साथ व्याप्य भी
होनेके कारण उस उपाधिसे ही सकर्तृकत्वरूप साध्यकी सिद्धि हो
जायगी’ क्योंकि उक्त उपाधि स्वयं ही सन्दिग्धासिद्ध है । अर्थात्
न्यायमतमें उसका उपाधित्व ही सन्दिग्ध है । अथवा उसमें सकर्तृकत्व
रूप साध्यका व्याप्यत्व ही असिद्ध है । अतः उपाधिबलसे न्यायमतमें
सकर्तृकत्वकी सिद्धि नहीं की जा सकती है—तो ऐसा समाधान नहीं
कर सकते हो । क्योंकि शरीराधिकवृत्ति उपाधि हो या न हो, दोनों
ही दशाओंमे अशरीरी कर्त्ताकी सिद्धि हो जायगी । अर्थात् यदि
शरीरातिरिक्तवृत्ति उपाधि हो तो उस उपाधिके बलसे ही अशरीरी कर्त्ता
(ईश्वर) की सिद्धि हो जाती है । यदि उक्त उपाधि न हो तो उपाधि
[Header] अनुपलब्धवादः ३९९
किन्तु कथञ्चिदुपाधिमादाय स व्यवतिष्ठताम् । यद्वा
कार्यत्वमेवेति सन्देहः परिशिष्यते, गत्यन्तराभावादिति सोऽपि
निवार्यते । न तावद् देहव्यतिरेकेऽनित्यज्ञानसम्भवः,
तयो कार्यकारणभावनियमात् । ततो नित्यं भवेत् ततः
सर्वविषयं च । नियतविषयताया अनित्यत्वेन व्यापनात् ।
विषयनियमस्य सामग्रीशक्तिसमवधानाधीनतया नित्यात्
तस्याः स्वव्याप्यमुपादाय निवर्तमानाया अनित्ये विश्रामात् ।
रहित होनेके कारण कार्यत्व-हेतुसे ही क्षित्यादिके प्रति अशरीरी कर्त्ता
सिद्ध हो जाता है ।
अब यहाँपर केवल यही सन्देह बच जाता है कि उक्त अशरीरि-
कर्तृत्व कथञ्चित् अर्थात् शरीराधिकवृत्ति उपाधिके बलको लेकर सिद्ध
होगा या कार्यत्व हेतुको लेकर सिद्ध होगा । इन दोके अलावे अश-
रीरिकर्तृत्वसिद्धिके लिये कोई तीसरी गति नहीं है । अत इस
सन्देहका भी अब निवारण किया जा रहा है ।
जैसे—यदि क्षित्यादिका कर्त्ता शरीररहित है तो उसका ज्ञान अनित्य
नहीं हो सकता है । क्योंकि अनित्यज्ञान और देहमें कार्यकारणभावका
नियम होनेसे देहरूपकारणके अभावमें अनित्यज्ञानका भी अभाव हो
जायगा । इसलिये उसका ज्ञान नित्य होगा और सर्वविषयक भी
होगा । क्योंकि नियतविषयता अनित्यत्वसे व्याप्त है । अर्थात् अनित्य
ज्ञान ही निर्धारित (सीमित) विषयक होता है । नित्यज्ञान तो अनियत-
विषयक होनेसे सर्वविषयक ही होगा । कारण, ज्ञानमे विषयविशेषका
नियमन ज्ञानसामग्रीशक्तिकी उपस्थितिके अधीन है । अत नित्यज्ञानसे
स्वयं निवृत्त होती हुई ज्ञानोत्पादक सामग्रीशक्ति अपने व्याप्यभूत
विषयनियमको भी निवृत्त करती हुई अनित्यज्ञानमें ही व्यवस्थित होती
है । अर्थात् नित्यज्ञानमे सामग्रीकी अधीनता नहीं रहनेसे विषयका
नियम भी नहीं रहता । प्रत्युत अनित्यज्ञान ही सामग्रीके अधीन उत्पन्न
होता है और नियतविषयक होता है । अत नित्यज्ञान सर्वविषयक
ही होगा ।
| ४०० | आत्मतत्त्वविवेके |
|---|
सर्वगोचरे च ज्ञाने चिकीर्षाप्रयत्नयोरपि तथाभावः,
तदेकविषयत्वात्तयोः । तथा च कश्चिदुपाधिमादायाशरीर-
पूर्वकमपि किञ्चिदेव कार्यं कर्तृपूर्वकं भविष्यतीति शङ्कापिशा-
च्याः क्कावकाशः ।
एवमन्यत्राप्यनया दिशा उपाधिशङ्का निराकरणीयेति
निरुपाधिसम्बन्धसिद्धिः । विपक्षसम्भवे च साधनप्रयुक्तसाध्य-
एव ज्ञानके सर्वविषयक होनेपर चिकीर्षा और प्रयत्न भी सर्वविषयक
होंगे । क्योंकि ज्ञानका जो विषय होता है, वही चिकीर्षा और प्रयत्न-
का भी विषय होता है । अर्थात् यद्विषयक ज्ञान होता है, तद्विषयक
ही चिकीर्षा और प्रयत्न भी होते हैं । अतः सर्वविषयक नित्यज्ञान-
चिकीर्षा तथा प्रयत्नवाला ईश्वररूप अशरीरी कर्त्ता सिद्ध हो जाता है ।
इस तरह—‘किसी शङ्कित उपाधिको लेकर शरीरके बिना भी उत्पन्न
होनेवाला कुछ ही कार्य कर्तृजन्य होगा न कि सभी कार्य’ इस शङ्का
पिशाचीको भी कहा मौका है ? अर्थात् उपाधिकी आशङ्का ‘अशरीर
पूर्वक भी कुछ ही कार्य सकर्तृक होगा’ इस शङ्काका आपादन
नहीं कर सकेगी । क्योंकि बिना शरीरके भी कर्त्ता सिद्ध हो
जानेपर पूर्वोक्त युक्तिसे उस अशरीरी कर्ताके ज्ञान इच्छा और प्रयत्न
नित्य तथा सर्वविषयक मानने होंगे । ऐसी स्थितिमे जिस कार्यमें तुम
अकर्तृकत्वकी आशङ्का करते हो, उसका भी उपादानकारण अवश्य ही
उस नित्य तथा सर्वविषयक ज्ञान इच्छा और प्रयत्नका विषय होगा ।
तथा उपादानविषयक अपरोक्षज्ञान चिकीर्षा कृतिमत्त्व ही तो कर्तृत्व
है । अतः जिस कार्यमे तुम अकर्तृकत्वकी आशङ्का कर रहे हो उसमे भी
अकर्तृकत्वकी आशङ्का कैसे हो सकेगी ? तात्पर्य यह है कि कोई भी कार्य
बिना कर्त्ताके नहीं हो सकेगा । अतः अशरीरिकर्तृक सभी क्षित्यादिकार्य
सकर्तृक सिद्ध होते हुए ईश्वररूप सर्वज्ञ कर्ताको उपस्थित करते हैं ।
इस प्रकार अन्य अनुमानोंमे भी इसी रीतिसे अर्थात् पूर्वोक्त चार
विकल्पोंके द्वारा उपाधिशङ्काका निवारण करना चाहिये । इस तरह
कार्यत्व और सकर्तृकत्वमे निरुपाधिसम्बन्धरूप व्याप्तिकी सिद्धि हो
जाती है ।
अनुपलब्धवादः ४०१
सद्भावसिद्धौ साध्याभावप्रयुक्तसाधनाभावलक्षणस्य व्यतिरेक-
स्यापि सिद्धेः न तदर्थं पृथगपेक्षेति ।
द्वितीयेऽपि श्रवणसम्पुटमवधाय कलकलस्त्यज्यताम् ।
तथा हि दण्डादिषूदासीनेषु दृश्योऽदृश्यो वा (नाना) कारक-
व्यापाराविनिर्भागवृत्तिश्चेतनो निवृत्तो न वेति त्वमेव प्रष्टव्यः ।
न चेत्, कुतः कारणान्युदासते ? निवृत्तश्चेत्, कथमदृश्य-
व्यतिरेकसंशयः ?
तथापि यादृशस्यान्वयस्तादृशस्य व्यतिरेकोऽपि उपयुज्यत
एव जहाँ साध्यका विपक्ष ( निश्चितसाध्याभाववान् ) सम्भव है,
यहाँ, जैसे पक्षमे साधन ( हेतु ) के रहनेके कारण साध्यकी सत्ता सिद्ध
होती है, वैसे ही विपक्षमे साध्यका अभाव होनेसे साधनाभावरूप
व्यतिरेक भी स्वतः सिद्ध हो जाता है । उसकेलिये पृथक् यत्नकी अपेक्षा
नहीं होती है । अर्थात् आकाशादिमें सत्त्व